Saturday, May 21, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 1-20 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 1-20

अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के मुन्तख़ब हुक्म व मवाएज़ का बाब (अक़वाल)

1. फ़ित्ना व फ़साद में उस तरह रहो जिस तरह ऊंट का वह बच्चा जिसने अभी अपनी उम्र के दो साल ख़त्म किये हैं के न तो उसकी पीठ पर सवारी की जा सकती है और न उसके थनों से दूध दोहा जा सकता है।

2. जिसने तमअ को अपना ‘ाोआर बनाया, उसने अपने को सुबुक किया और जिसने अपनी परेशान हाली का इज़हार किया वह ज़िल्लत पर आमादा हो गया, और जिसने अपनी ज़बान को क़ाबू में न रखा उसने ख़ुद अपनी बेवक़अती का सामान कर लिया।

3. बुख़ल नंग व आर है, और बुज़दिली नुक़्स व ऐब है, और ग़ुरबत मर्दे ज़ीरक व दाना की ज़बान को दलाएल की क़ूवत दिखाने से आजिज़ बना देती है और मुफ़लिस अपने ‘ाहर में रह कर भी ग़रीबुल वतन होता है और इज्ज़ व दरमान्दगी मुसीबत है और सब्र व ‘ाकीबाई ‘ाुजाअत है और दुनिया से बेताल्लुक़ बड़ी दौलत है और परहेज़गारी एक बड़ी सिपर है।

4. तस्लीम व रज़ा बेहतरीन मसाहेब और इल्म ‘ारीफ़ तरीन मीरास है और अमली दमली औसाफ़े नौ बनू खि़लअत हैं और फ़िक्र साफ़ व ‘ाफ़्फ़ाफ़ आईना है।

5. अक़्लमन्द का सीना उसके भेदों का मख़ज़न होता है, और कुशादा रूई मोहब्बत व दोस्ती का फन्दा है और तहम्मुल व बुर्दबारी ऐबों का मदफ़न है (या इस फ़िक़रे के बजाए हज़रत ने यह फ़रमाया) सुलह व सफ़ाई ऐबों को ढांपने का ज़रिया है।

6. जो ‘ाख़्स अपने को बहुत पसन्द करता है वह दूसरों को नापसन्द हो जाता है और सदक़ा कामयाब दवा है और दुनिया में बन्दों के जो आमाल हैं वह आख़ेरत में उनकी आंखों के सामने होंगे।
((( क़ुरान में इरशादे इलाही यूं है उस दिन लोग गिरोह गिरोह (क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे ताके वह अपने आमाल को देखें तो जिसने ज़र्रा बराबर भी नेकी की होगी उसे देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर भी बुराई की होगी वह उसे देख लेगाा)))

7. यह इन्सान ताअज्जुब के क़ाबिल है के वह चर्बी से देखता है, और गोश्त के लोथड़े से बोलता है और हड्डी से सुनता है और एक सूराख़ से सांस लेता है।

8. जब दुनिया किसी की तरफ़ मुतवज्जेह हो जाती है तो यह दूसरे के महासिन भी उसके हवाले कर देती है और जब उससे मुंह फिराती है तो उसके महासिन भी सल्ब कर लेती है।

(((-यह इल्मुल इज्तेमाअ का नुक्ता है जहां इस हक़ीक़त की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है के ज़माना ऐबदार को बेऐब भी बना देताा है और बेऐब को ऐबदार भी बना देता है और दोनों का फ़र्क़ दुनिया की तवज्जो है जिसका हुसूल बहरहाल ज़रूरी है।)))

9. लोगों के साथ ऐसा मेल-जोल रखो के मर जाओ तो लोग गिरया करें और ज़िन्दा रहो तो तुम्हारे मुश्ताक़ रहें।

((( यह भी बेहतरीन इज्तेमाई नुक्ता है जिसकी तरफ़ हर इन्सान को मुतवज्जो रहना चाहिये)))
10. जब दुश्मन पर क़ुदरत हासिल हो जाए तो मुआफ़ कर देने ही को इस क़ुदरत का ‘ाुक्रिया क़रार दो।

(((यह एख़लाक़ी तरबीयत है के इन्सान में ताक़त का ग़ुरूर नहीं होना चाहिये )))

11. आजिज़ तरीन इन्सान वह है जो दोस्त बनाने से भी आजिज़ हाो और उससे ज़्यादा आजिज़ वह है जो रहे सहे दोस्तों को भी बरबाद कर दे।

12. जब नेमतों का रूख तुम्हारी तरफ़ हो तो नाशुक्री के ज़रिये उन्हें अपने तक पहुंचने से भगा न दो।

(((परवरदिगारे आलम ने यह एख़तेलाफ़ी निज़ाम बना दिया है के नेमतों की तकमील ‘ाुक्रिया ही के ज़रिये हो सकती है लेहाज़ा जिसे भी इसकी तकमील दरकार है उसे ‘ाुक्रिया का पाबन्द होना चाहिये)))
13. जिसे क़रीबी छोड़ दें उसे बेगाने मिल जाएंगे।

14. हर फ़ित्ने में पड़ जाने वाला क़ाबिले इताब नहीं होता।
(((जब साद बिन अबी वक़ास, मोहम्मद इब्ने मुसल्लेम और अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने असहाबे जमल के मुक़ाबले में आपका साथ देने से इन्कार किया तो इस मौक़े पर यह जुमला फ़रमाया, मतलब यह है के यह लोग मुझसे ऐसे मुनहरिफ़ हो चुके हैं के उन पर न मेरी बात का कुछ असर होता है और न उन पर मेरी इताब व सरज़न्श कारगर साबित होती है)))
15. सब मुआमले तक़दीर के आगे सरनिगूँ हैं यहाँ तक के कभी तदबीर के नतीजे में मौत हो जाती है।
16. पैग़म्बर सल्लल्लाहो अजलैहे वआलेही वसल्लम की हदीस के मुताल्लिक़ के ‘‘बुढ़ापे को (खि़ज़ाब के ज़रिये) बदल दो, और यहूद से मुशाबेहत इख़्तेयार न करो’’ आप (अ0) से सवाल किया गया तो आपने फ़रमाया के पैग़म्बर पैग़म्बर सल्लल्लाहो अजलैहे वआलेही वसल्लम ने यह उस मौक़े के लिये फ़रमाया था जबके दीनन (वाले) कम थे और अब जबके इसका दामन फै़ल चुका है, और सीना टेक कर जम चुका है तो हर ‘ाख़्स को इख़्तेयार है।
(((मक़सद यह है के चूंके इब्तिदाए इस्लाम में मुसलमानों की तादाद कम थी इसलिये ज़रूरत थी के मुसलमानों की जमाअती हैसियत को बरक़रार रखने के लिये उन्हें यहूदियों से मुमताज़ रखना जाए, इसलिये आँहज़रत ने खि़ज़ाब का हुक्म दिया के जो यहूदियों के हाँ मरसूम नहीं है, इसके अलावा यह मक़सद भी था के वह दुश्मन के मुक़ाबले में ज़ईफ़ व सिन रसीदा दिखाई न दें)))

17-उन लोगों के बारे में के जो आपके हमराह होकर लड़ने से किनाराकश रहे, फ़रमाया उन लोगों ने हक़ को छोड़ दिया और बातिल की भी नुसरत नहीं की।
(((यह इरशाद उन लोगों के मुताल्लुक़ है के जो अपने को ग़ैर जानिबदार ज़ाहिर करते थे जैसे अब्दुल्लाह बिन उमर, साद इब्ने अबी वक़ास, अबू मूसा अशअरी, अहनफ़ इब्ने क़ैस, और अन्स इब्ने मालिक वग़ैरह, बेशक इन लोगों ने खुल कर बातिल की हिमायत नहीं की, मगर हक़ की नुसरत से हाथ उठा लेना भी एक तरह से बातिल को तक़वीयत पहुंचाना है इसलिये इनका ‘ाुमार मुख़ालेफ़ीने हक़ के गिरोह ही में होगा।)))
18- जो ‘ाख़्स उम्मीद की राह में बगटूट दौड़ता है वह मौत से ठोकर खाता है।

19- ब-मुरव्वत लोगों की लग्ज़िशों से दरगुज़र करो (क्योंके) इनमें से जो भी लग्ज़िश खाकर गिरता है तो अल्लाह उसके हाथ में हाथ देकर उसे ऊपर उठा लेता है।

20- ख़ौफ़ का नतीजा नाकामी और ‘ार्म का नतीजा महरूमी है और फ़ुर्सत की घड़ियां (तेज़रौ) अब्र की तरह गुज़र जाती हैं, लेहाज़ा भलाई कंे मिले हुए मौक़ों को ग़नीमत जानो।

(((जो बिला वजजह ख़ौफ़ज़दा हाो जाएगा वह मक़सद को हासिल नहीं कर सकता है और जो बिला वजह ‘ार्माता रहेगा वह हमेशा महरूम रहेगा। इन्सान हर मौक़े पर ‘ार्माता ही रहता ताो नस्ले इन्सानी वजूद में न आती।)))
 

Friday, May 20, 2011

Nahjul Balagha Hindi Khat 69-79 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 69-79 ख़त completed

69-आपका मकतूबे गिरामी(हारिस हमदानी के नाम)

क़ुरान की रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहो और उससे नसीहत हासिल करो, उसके हलाल को हलाल क़रार दो और हराम को हराम, हक़ की गुज़िश्ता बातों की तस्दीक़ करो और दुनिया के माज़ी से उसके मुस्तक़बिल के लिये इबरत हासिल करो के इसका एक हिस्सा दूसरे से मुशाबेहत रखता है और आखि़र अव्वल से मुलहक़ होने वाला है और सबका सब ज़ाएल होने वाला और जुदा हो जाने वाला है, नामे ख़ुदा को इस क़द्र अज़ीम क़रार दो के सिवाए हक़ के किसी मौक़े पर इस्तेमाल न करो, मौत और उसके बाद के हालात को बराबर याद करते रहो और उसकी आरज़ू उस वक़्त तक न करो जब तक मुस्तहकम असबाब न फ़राहम हो जाएं, हर उस काम से परहेज़ करो जिसे आदमी अपने लिये पसन्द करता हो और आम मुसलमानों के लिये नापसन्द करता हो और हर उस काम से बचते रहो जो तन्हाई में किया जा सकता हो और अलल एलान अन्जाम देने में ‘ार्म महसूस की जाती हो और इसी तरह हर उस काम से परहेज़ करो जिसके करने वाले से पूछ लिया जाए तो या इन्कार कर दे या माज़ेरत करे, अपनी आबरू का लोगों के तीरे मलामत का निशाना न बनाओ और हर सुनी हुई बात को बयान न कर दो के यह हरकत भी झूठ होने के लिये काफ़ी है और इसी तरह लोगों की हर बात की तरदीद भी न कर दो के यह अम्र जेहालत के लिये काफ़ी है, ग़ुस्से को ज़ब्त करो, ताक़त रखने के बावजूद लोगों को माफ़ करो, ग़ज़ब में हिल्म का मुज़ाहेरा करो, इक़्तेदार पाकर दरगुज़र करना सीखो ताके अन्जामकार तुम्हारे लिये रहे अल्लाह ने जो नेमतें दी हैं उन्हें दुरूस्त रखने की कोशिश करो और उसकी किसी नेमत को बरबाद न करना बल्कि उन नेमतों के आसार तुम्हारी ज़िन्दगी में वाज़ेह तौर पर नज़र आएं।

और याद रखो के तमाम मोमेनीन में सबसे बेहतर इन्सान वह है जो अपने नफ़्स, अपने अहल व अयाल और अपने माल की तरफ़ से ख़ैरात करे के यही पहले जाने वाला ख़ैर वहां जाकर ज़ख़ीरा हो जाता है और तुम हो कुछ छोड़ कर चले जाओगे वह तुम्हारे ग़ैर के काम आएगा, ऐसे ‘ाख़्स की सोहबत इख़्तेयार न करना जिसकी राय कमज़ोर और उसके आमाल नापसन्दीदा हों के हर सााथी का क़यास उसके साथी पर किया जाता है, सुकूनत के लिये बड़े ‘ाहरों का इन्तेख़ाब करो के वहां मुसलमानों का इज्तेमाअ ज़्यादा होता है और उन जगहों से परहेज़ करो जो जो ग़फ़लत, बेवफ़ाई और इताअते ख़ुदा में मददगारों की क़िल्लत के मरकज़ हों, अपनी फ़िक्र को सिर्फ़ काम की बातों में इस्तेमाल करो और ख़बरदार बाज़ारी अड़डों पर मत बैठना के यह ‘ौतान की हाज़िरी की जगहें और फ़ितनों के मरकज़ हैं, ज़्यादा हिस्सा उन अफ़राद पर निगाह रखो जिनसे परवरदिगार ने तुम्हें बेहतर क़रार दिया है के यह भी ‘ाुक्रे ख़ुदा का एक रास्ता है, जुमे के दिन नमाज़ पढ़े बग़ैर सफ़र न करना मगर यह के राहे ख़ुदा में जा रहे हो या किसी ऐसे काम में जो तुम्हारे लिये उज़्र बन जाए और तमाम उमूर में परवरदिगार की इताअत करते रहना के इताअते ख़ुदा दुनिया के तमाम कामों से अफ़ज़ल और बेहतर है।

(((-वाज़ेह रहे के जुमे के दिन तातील कोई इस्लामी क़ानून नहीं है, सिर्फ़ मुसलमानों का एक तरीक़ा है, वरना इस्लाम ने सिर्फ़ बक़द्रे नमाज़ कारोबार बन्द करने का हुक्म दिया है और इसके बाद फ़ौरन यह हुक्म दिया है के ज़मीन में मुन्तशिर हो जाओ और रिज़्क़े ख़ुदा तलाश करो, मगर अफ़सोस के जुमे की तातील के बेहतरीन रोज़े इबादत को भी अय्याशियों और बदकारियों का दिन बना दिया गया और इन्सान सबसे ज़्यादा निकम्मा और नाकारा उसी दिन होता है, इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन-)))
अपने नफ़्स को बहाने करके इबादत की तरफ़ ले आओ और उसके साथ नर्मी बरतो, जब्र न करो और उसी की फ़ुर्सत और फ़ारिग़ुलबाली से फ़ायदा उठाओ, मगर जिन फ़राएज़ को परवरदिगार ने तुम्हारे ज़िम्मे लिख दिया है उन्हें बहरहाल अन्जाम देना है और उनका ख़याल रखना है और देखो ख़बरदार ऐसा न हो के तुम्हे इस हाल में मौत आ जाए के तुम तलबे दुनिया में परवरदिगार से भाग रहे हो, और ख़बरदार फ़ासिक़ों की सोहबत इख़्तेयार न करना के ‘ार बालाआखि़र ‘ार से मिल जाता है, अल्लाह की अज़मत का एतराफ़ करो और उसके महबूब बन्दों से मोहब्बत करो और ग़ुस्से से इजतेनाब करो के यह ‘ौतान के लश्करों में सबसे अज़ीमतर लश्कर है, वस्सलाम।

70-आपका मकतूबे गिरामी(आमिले मदीना सहल बिन हनीफ़ अन्सारी के नाम, जब आपको ख़बर मिली के एक क़ौम माविया से जा मिली है)
अम्माबाद! मुझे यह ख़बर मिली है के तुम्हारे यहाँ के कुछ लोग चुपके से माविया की तरफ़ खिसक गए हैं तो ख़बरदार तुम इस अदद के कम हो जाने और इस ताक़त के चले जाने पर हरगिज़ अफ़सोस न करना के इन लोगांे की गुमराही और तुम्हारे सुकूने नफ़्स के लिये यही काफ़ी है के वह लोग हक़ व हिदायत से भागे हैं और गुमराही और जेहालत की तरफ़ दौड़ पड़े हैं यह अहले दुनिया हैं लेहाज़ा इसी की तरफ़ मुतवज्जेह हैं और दौड़ लगा रहे हैं, हालांके उन्होंने इन्साफ़ को पहचाना भी है, सुना भी है और समझे भी हैं और उन्हें मालूम है के हक़ के मामले में हमारे यहाँ तमाम लोग बराबर की हैसियत रखते हैं इसीलिये यह लोग ख़ुदग़र्ज़ी की तरफ़ भाग निकले, ख़ुदा उन्हें ग़ारत करे और तबाह कर दे।
ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने ज़ुल्म से फ़रार नहीं किया है और न अद्ल से मुलहक़ हुए हैं, और हमारी ख़्वाहिश सिर्फ़ यह है के परवरदिगार इस मामले में दुश्वारियों को आसान बना दे और नाहमवारी को हमवार कर दे।


71-आपका मकतूबे गिरामी
(मन्ज़र बिन जारुद अबदी के नाम जिसने बाज़ आमाल में ख़यानत से काम लिया)

अम्माबाद! तेरे बाप की ‘ाराफ़त ने मुझे तेरे बारे में धोके में रखा और मैं समझा के तू उसी के रास्ते पर चल रहा है और उसी के तरीक़े पर गामज़न है, लेकिन ताज़ा तरीन अख़बार से अन्दाज़ा होता है के तूने ख़्वाहिशात की पैरवी में कोई कसर नहीं उठा रखी है और आख़ेरत के लिये कोई ज़ख़ीरा नहीं किया है, आखे़रत को बरबाद करके दुनिया को आबाद कर रहा है और दीन से रिश्ता तोड़कर क़बीले से रिश्ता जोड़ रहा है। अगर मेरे पास आने वाली ख़बरें सही हैं तो तेरे घरवालों का ऊंट और तेरे जूते का तस्मा भी तुझसे बेहतर है और जो तेरा जैसा हो उसके ज़रिये न रख़्ने को बन्द किया जा सकता है न किसी अम्र को नाफ़िज़ किया जा सकता है और न उसके मरतबे को बलन्द किया जा सकता है न उसे किसी अमानत में ‘ारीक किया जा सकता है, न माल की जमाआवरी पर अमीन समझा जाऐ लेहाज़ा जैसे ही मेरा यह ख़त मिले फ़ौरन मेरी तरफ़ चल पड़ो, इन्शाअल्लाह।

सय्यद रज़ी- मन्ज़र बिन अलजारूदः यह वही ‘ाख़्स है जिसके बारे में अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने फ़रमाया था के यह अपने बाज़ुओं को बराकर देखता रहता है और अपनी चादरों में झूम कर चलता है और जूती के तस्मों को फूंकता रहता है (यानी इन्तेहाई मग़रूर और मुतकब्बिर क़िस्म का आदमी है)

72-आपका मकतूबे गिरामी(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम)

अम्माबाद! न तुम अपनी मुद्दते हयात से आगे बढ़ सकते हो और न अपने रिज़्क़ से ज़्यादा हासिल कर सकते हो, और याद रखो के ज़माने के दो दिन होते हैं, एक तुम्हारे हक़ में और एक तुम्हारे खि़लाफ़ और यह दुनिया हमेशा करवटें बदलती रहती है लेहाज़ा जो तुम्हारे हक़ में है वह कमज़ोरी के बावजूद तुम तक आ जाएगा और जो तुम्हारे खि़लाफ़ है उसे ताक़त के बावजूद तुम नहीं टाल सकते हो।


73-आपका मकतूबे गिरामी(माविया के नाम)

अम्माबाद! मैं तुमसे ख़त व किताबत करने और तुम्हारी बात सुनने में अपनी राय की कमज़ोरी और अपनी दानिशमन्दी की ग़लती का एहसास कर रहा हूँ और तुम बार-बार मुझसे अपनी बात मनवाने और ख़त व किताबत जारी रखने की कोशिश करने में ऐसे ही हो जैसे कोई बिस्तर पर लेटा ख़्वाब देख रहा हो और उसका ख़्वाब ग़लत साबित हो या कोई हैरतज़दा मुंह उठाए खड़ा हो और यह क़याम भी उसे महंगा पड़े और यही न मालूम हो के आने वाली चीज़ इसके हक़ में मुफ़ीद है या मुज़िर, तुम बिलकुल यही ‘ाख़्स नहीं हो लेकिन इसी के जैसे हो और ख़ुदा की क़सम के अगर किसी हद तक बाक़ी रखना मेरी मसलेहत न होता तो तुम तक ऐसे हवादिस आते जो हड्डियों को तोड़ देते और गोश्त का नाम तक न छोड़ते और याद रखो के यह ‘ौतान ने तुम्हें बेहतरीन उमूर की तरफ़ रूजू करने और उमदा तरीन नसीहतों के सुनने से रोक रखा है और सलाम इसके अहल पर।


74- आपका मुआहेदा(जिसे रंबीया और अहले यमन के दरम्यान तहरीर फ़रमाया है और यह हश्शाम की तहरीर से नक़्ल किया गया है)

यह वह अहद है जिस पर अहले यमन के ‘ाहरी और देहाती और क़बीलए रंबीया के ‘ाहरी और देहाती सबने इत्तेफ़ाक़ किया है के सबके सब किताबे ख़ुदा पर साबित रहेंगे और उसी की दावत देंगे, जो उसकी तरफ़ दावत देगा और उसके ज़रिये हुक्म देगा उसकी दावत पर लब्बैक कहेंगे, न उसको किसी क़ीमत पर फ़रोख़्त करेंगे और न उसके किसी बदल पर राज़ी होंगे।
(((-अरब के वह क़बाएल जिनका सिलसिलाए नसब क़हतान बिन आमिर तक पहुंचता है उन्हें यमन से ताबीर किया जाता है और जिन का सिलसिला रंबीया बिन नज़ार से मिलता है उन्हें रंबीया के नाम से याद किया जाता है, दौरे जाहेलीयत में दोनों में ‘ादीद इख़्तेलाफ़ात थे लेकिन इस्लाम लाने के बाद दोनों मुत्तहिद हो गए, वलहम्दो लिल्लाह।-)))
इस अम्र के मुख़ालिफ़ और इसके नज़र अन्दाज़ करने वाले के खि़लाफ़ मुत्तहिद रहेंगे और किसी सरज़न्श करने वाले की सरज़न्श पर इस अहद को तोड़ेंगे और न किसी  ग़ैज़ व ग़ज़ब से राह में मुतासिर होंगे, और न किसी क़ौम को ज़लील करने या गाली देने का वसीला क़रार देंगे, इसी बात पर हाज़ेरीन भी क़ायम रहेंगे और ग़ायबीन भी इसी पर कम अक़्ल भी कारबन्द रहेंगे और आलिम भी, इसी की पाबन्दी साहेबाने दानिश भी करेंगे और जाहिल भी, फिर इसके बाद उनके ज़िम्मे अहदे इलाही और मीसाक़े परवरदिगार की पाबन्दी भी लाज़िम हो गई है और अहदे इलाही के बारे में रोज़े क़यामत भी सवाल किया जाएगा- कातिब अली (अ0) बिन अबी तालिब|

75-आपका मकतूबे गिरामी(माविया के नाम, अपनी बैअत के इब्तेदाई दौर में जिसका ज़िक्र वाक़दी ने किताबुल जमल में किया है)

बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से माविया बिन अबी सुफ़ियान के नाम
अम्माबाद! तुम्हें मालूम है के मैंने अपनी तरफ़ से हुज्जत तमाम कर दी है और तुमसे किनारा कशी कर ली है मगर फिर भी वह बात होकर रही जिसे होना था और जिसे टाला नहीं जा सकता था, यह बात बहुत लम्बी है और इसमें गुफ़्तगू बहुत तवील है लेकिन अब जिसे गुज़रना था वह गुज़र गया और जिसे आना था वह आ गया। अब मुनासिब यही है के अपने यहां के लोगों से मेरी बैअत ले लो और सबको लेकर मेरे पास हाज़िर हो जाओ, वस्सलाम।


76-आपकी वसीयत(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के लिये, जब उन्हें बसरा का वाली क़रार दिया)

लोगों से मुलाक़ात करने में उन्हें अपनी बज़्म में जगह देने में और उनके दरम्यान फ़ैसला करने में वुसअत से काम लो और ख़बरदार ग़ैज़ व ग़ज़ब से काम न लेना के यह ‘ौतान की तरफ़ से हलकेपन का नतीजा है और याद रखो के जो चीज़ अल्लाह से क़रीब बनाती है वही जहन्नम से दूर करती है और जो चीज़ अल्लाह से दूर करती है वही जहन्नम से क़रीब बनाती है।


77-आपकी वसीयत(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम- जब उन्हें ख़वारिज के मुक़ाबले में एतमामे हुज्जत के लिये इरसाल फ़रमाया)

देखो उनसे क़ुरान के बारे में बहस न करना के उसके बहुत से वुजूह व एहतेमालात होते हैं और इस तरह तुम अपनी कहते रहोगे और वह अपनी कहते रहेंगे, बल्कि उनसे सुन्नत के ज़रिये बहस करो के इससे बच कर निकल जाने का कोई रास्ता न होगा।


78-आपका मकतूबे गिरामी(अबू मूसा अशअरी के नाम)
-हकमीन के सिलसिले में इसके एक ख़त के जवाब में जिसका तज़़़किरा सईद बिन यहया ने ‘‘मग़ाज़ी’’ में किया है)
कितने ही लोग ऐसे हैं जो आखे़रत की बहुत सी सआदतों से महरूम हो गए हैं, दुनिया की तरफ़ झुक गए हैं और ख़्वाहिशात के मुताबिक़ बोलने लगे हैं मैं उस अम्र की वजह से एक हैरत व इस्तेजाब की मन्ज़िल में हँू जहां ऐसे लोग जमा हो गए हैं जिन्हें अपनी ही बात अच्छी लगती है, मैं उनके ज़ख़्म का मदावा तो कर रहा हूँ लेकिन डर रहा हूँ के कहीं यह मुनजमिद ख़ून की ‘ाक्ल न इख़्तेयार कर ले।
और याद रखो के उम्मते पैग़म्बर (स0) की ‘ाीराज़ाबन्दी और उसके इत्तेहाद के लिये समझ से ज़्यादा ख़्वाहिशमन्द कोई नहीं है जिसके ज़रिये मैं बेहतरीन सवाब और सरफ़राज़ी आखि़रत चाहता हूँ और मैं बहरहाल अपने अहद को पूरा करूंगा चाहे तुम इस बात से पलट जाओ जो आखि़री मुलाक़ात तक तुम्हारी ज़बान पर थी, यक़ीनन बदबख़्त वह है जो अक़्ल व तजुर्बे के होते हुए भी इसके फ़वाएद से महरूम रहे, मैं तो इस बात पर नाराज़ हूँ के कोई ‘ाख़्स हर्फ़े बातिल ज़बान पर जारी करे या किसी ऐसे अम्र को फ़़ासिद कर दे जिसकी ख़ुदा ने इस्लाह कर दी है लेहाज़ा जिस बात को तुम नहीं जानते हो उसको नज़रअन्दाज़ कर दो के ‘ारीर लोग बड़ी बातें तुम तक पहुंचाने के लिये उड़कर पहुंचा करेंगे, वस्सलाम।


79-आपका मकतूबे गिरामी(खि़लाफ़त के बाद, रूसाए लश्कर के नाम)
अम्माबाद! तुमसे पहले वाले सिर्फ़ इस बात से हलाक हो गए के उन्होंने लोगों के हक़ रोक लिये और उन्हें रिश्वत देकर ख़रीद लिया और उन्हें बातिल का पाबन्द बनाया तो सब उन्हीं के रास्तों पर चल पड़े।
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Nahjul Balagha Hindi Khat 54-68 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 54-68 ख़त

54-आपका मकतूबे गिरामी
(तल्हा व ज़ुबैर के नाम जिसे अम्र बिन अलहुसैन अलख़ज़ाई के ज़रिये भेजा था और जिसका ज़िक्र अबूजाफ़र इसकाफ़ी ने किताबुल मक़ामात में किया है)

अम्माबाद! अगरचे तुम दोनों छिपा रहे हो लेकिन तुम्हें बहरहाल मालूम है के मैंने खि़लाफ़त की ख़्वाहिश नहीं की, लोगों ने मुझसे ख़्वाहिश की है और मैंने बैअत के लिये एक़दाम नहीं किया है। जब तक उन्होंने बैअत करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया है तुम दोनों भी उन्हीं अफ़राद में ‘ाामिल हो जिन्होंने मुझे चाहा था और मेरी बैअत की थी और आम लोगाों ने भी मेरी बैअत न किसी सल्तनत के रोब दाब से की है और न किसी माल व दुनिया की लालच में की है।
(((- अबूजाफ़र इसकाफ़ी मोतजे़लह के ‘ाुयूख़ में ‘ाुमार होते थे और उनकी सत्तर तसनीफ़ात थीं जिनमें एक ‘‘किताबुल मक़ामात’’ भी थी, इसी किताब में अमीरूल मोमेनीन (अ0) के इस मकतूबे गिरामी का तज़किरा किया है और यह बताया है के हज़रत ने इसे इमरान के ज़रिये भेजा था जो फ़ोक़हाए सहाबा में ‘ाुमार होते थे और जंगे ख़ैबर के साल इस्लाम लाए थे और अहदे मावियाा में इन्तेक़ाल किया था।-
इसकाफ़ी जाहज़ के मआसिरों में थे और उन्हें इस्काफ़ की निस्बत से इस्काफ़ी कहा जाता है जो नहरवान और बसरा के दरम्यान एक ‘ाहर है)))

पस अगर तुम दोनों ने मेरी बैअत अपनी ख़ुशी से की थी तो अब ख़ुदा की तरफ़ रूजू करो और फ़ौरन तौबा कर लो। और अगर मजबूरन की थी तो तुमने अपने ऊपर मेरा हक़ साबित कर दिया के तुमने इताअत का इज़हार किया था और नाफ़रमानी को दिल में छिपाकर रखा था और मेरी जान की क़सम दोनों इस राज़दारी और दिल की बातों को छिपाने में महाजेरीन से ज़्यादा सज़ावार नहीं थे और तुम्हारे लिये बैअत से निकलने और इसके इक़रार के बाद इन्कार कर देने से ज़्यादा आसान रोज़े अव्वल ही इसका इन्कार कर देना था, तुम लोगों का एक ख़याल यह भी है के मैंने उस्मान को क़त्ल किया है तो मेरे और तुम्हारे दरम्यान वह अहले मदीना मौजूद हैं जिन्होंने हम दोनों से अलाहेदगी इख़्तेयार कर ली है, इसके बाद हर ‘ाख़्स इसी का ज़िम्मेदार है जो उसने ज़िम्मेदारी क़ुबूल की है। बुज़ुर्गवारों! मौक़ा ग़नीमत है अपनी राय से बाज़ आ जाओ के आज तो सिर्फ़ जंग व आर का ख़तरा है लेकिन इसके बाद आर व नार दोनों जमा हो जाएंगे, वस्सलाम।

55-आपका मकतूबे गिरामी(माविया के नाम)

अम्माबाद! ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर ने दुनिया को आखि़रत का मुक़दमा क़रार दिया है और उसे आज़माइश का ज़रिया बनाया है ताके यह वाज़ेह हो जाए के बेहतरीन अमल करने वाला कौन है, हम न इस दुनिया के लिये पैदा किये गये हैं और न हमें इसके लिये दौड़-धूप का हुक्म दिया गया है, हम यहाँ फ़क़त इसलिये रखे गए हैं के हमारा इम्तेहान लिया जाए और अल्लाह ने तुम्हारे ज़रिये हमारा और हमारे ज़रिये तुम्हारा इम्तेहान ले लिया है और एक को दूसरे पर हुज्जत क़रार दे दिया है लेकिन तुमने तावीले क़ुरान का सहारा लेकर दुनिया पर धावा बोल दिया और मुझसे ऐसे जुर्म का मुहासेबा कर दिया जिसका न मेरे हाथ से कोई ताल्लुक़ था और न ज़बान से, सिर्फ़ अहले ‘ााम ने मेरे सर डाल दिया था और तुम्हारे जानने वालों ने जाहिलों को और क़याम करने वालों ने ख़ाना नशीनों को उकसा दिया था लेहाज़ा अब भी ग़नीमत है के अपने नफ़्स के बारे में अल्लाह से डरो और ‘ौतान से अपनी ज़माम छुड़ा लो और आखि़रत की तरफ़ रूख़ कर लो के वही हमारी और तुम्हारी आखि़री मन्ज़िल है, उस वक़्त से डरो के इस दुनिया में परवरदिगार कोई ऐसी मुसीबत नाज़िल कर दे के असल भी ख़त्म हो जाए और नस्ल का भी ख़ात्मा हो जाए, मैं परवरदिगार की ऐसी क़सम खाकर कहता हूं जिसके ग़लत होने का इमकान नहीं है के अगर मुक़द्दर ने मुझे और तुम्हें एक मैदान में जमा कर दिया तो मैं उस वक़्त तक मैदान न छोड़ूंगा जब तक मेरे और तुम्हारे दरम्यान फ़ैसला न हो जाए।


56-आपकी वसीयत
(जो ‘ारीह बिन हानी को उस वक़्त फ़रमाई जब उन्हें ‘ााम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का सरदार मुक़र्रर फ़रमाया)

सुबह व ‘ााम अल्लाह से डरते रहो और अपने नफ़्स को इस धोकेबाज़ दुनिया से बचाए रहो और इस पर किसी हाल में एतबार न करना और यह याद रखना के अगर तुमने किसी नागवारी के ख़ौफ़ से अपने नफ़्स को बहुत सी पसन्दीदा चीज़ों से न रोका तो ख़्वाहिशात तुमको बहुत से नुक़सानदेह उमूर तक पहुंचा देंगी लेहाज़ा अपने नफ़्स को रोकते टोकते रहो और ग़ुस्से में अपने ग़ैज़ व ग़ज़ब को दबाते और कुचलते रहो।

(((-यह अमीरूलमोमेनीन (अ0) के जलीलुलक़द्र सहाबी थे, अबू मिक़दाद कुन्नीयत थी और आपके साथ तमाम मारेकों में ‘ारीक रहे, यहां तक के हज्जाज के ज़माने में ‘ाहीद हुए, हज़रत (अ0) ने उन्हें ‘ााम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का अमीर मुक़र्रर किया तो मज़कूरा हिदायात से सरफ़राज़ फ़रमाया ताके कोई ‘ाख़्स इस्लामी पाबन्दी से आज़ादी का तसव्वुर न कर सके।-)))


57-आपका मकतूबे गिरामी
(अहले कूफ़ा के नाम- मदीने से बसरा रवाना होते वक़्त)

अम्माबाद! मैं क़बीले से निकल रहा हूँ या ज़ालिम की हैसियत से या मज़लूम की हैसियत से, या मैंने बग़ावत की है या मेरे खि़लाफ़ बग़ावत हुई है, मैं तुम्हें ख़ुदा का वास्ता देकर कहता हूँ के जहां तक मेरा यह ख़त पहुंच जाए तुम सब निकल कर आ जाओ, इसके बाद मुझे नेकी पर पाओ तो मेरी इमदाद करो और ग़लती पर देखो तो मुझे रज़ा के रास्ते पर लगा दो।


58-आपका मकतूबे गिरामी(तमाम ‘ाहरों के नाम - जिसमें सिफ़्फ़ीन की हक़ीक़त का इज़हार किया गया है)

हमारे मामले की इब्तिदा यह है के हम ‘ााम के लश्कर के साथ एक मैदान में जमा हुए जब बज़ाहिर दोनों का ख़ुदा एक था, रसूल एक था, पैग़ाम एक था, न हम अपने ईमान व तस्दीक़ में इज़ाफ़े के तलबगार थे, न वह अपने ईमान को बढ़ाना चाहते थे। मामला बिल्कुल एक था सिर्फ़ इख़्तेलाफ़ ख़ूने उस्मान के बारे में था जिससे हम बिलकुल बरी थे और हमने यह हल पेश किया के जो मक़सद आज नहीं हासिल हो सकता है उसका वक़्ती इलाज यह किया जाए के आतिशे जंग को ख़ामोश कर दिया जाए और लोगों के जज़्बात को पुरसूकून बना दिया जाए, इसके बाद जब हुकूमत को इस्तेहकाम हो जाएगा और हालात साज़गार हो जाएंगे तो हम हक़ को उसकी मन्ज़िल तक लाने की ताक़त पैदा कर लेंगे। लेकिन क़ौम का इसरार था के इसका इलाज सिर्फ़ जंग व जेदाल है जिसका नतीजा यह हुआ के जंग ने अपने पांव फेला दिये और जम कर खड़ी हो गई, ‘ाोले भड़क उठे और ठहर गए और क़ौम ने देखा के जंग ने दोनों के दांत काटना ‘ाुरू कर दिया है और फ़रीक़ैन में अपने पन्जे गाड़ दिये हैं तो वह मेरी बात मानने पर आमादा हो गए और मैंने भी उनकी बात को मान लिया और तेज़ी से बढ़ कर उनके मुतालबए सुलह को क़ुबूल कर लिया यहां तक के उन पर हुज्जत वाज़ेह हो गई और हर तरह का उज्ऱ ख़त्म हो गया। अब इसके बाद कोई इस हक़ पर क़ायम रह गया तो गोया अपने नफ़्स को हलाकत से निकाल लिया वरना इसी गुमराही में पड़ा रह गया तो ऐसा अहद शिकन होगा जिसके दिल पर अल्लाह ने मोहर लगा दी है और ज़माने के हवादिस उसके सर पर मण्डला रहे हैं।

(((-यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के हज़रत ने माविया और उसके साथियों के इस्लाम व ईमान का इक़रार नहीं किया है बल्कि सूरतेहाल का तज़किरा किया है।
हक़ीक़ते अम्र यह है के माविया को ख़ूने उस्मान से कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह ‘ााम की हुकूमत और आलमे इस्लाम की खि़लाफ़त का तमाअ था लेहाज़ा कोई सन्जीदा गुफ़्तगू क़ुबूल नहीं कर सकता था, हज़रत ने भी इमामे हुज्जत का हक़ अदा कर दिया और इसके बाद मैदाने जेहाद में क़दम जमा दिये ताके दुनिया पर वाज़ेह हो जाए के जेहादे राहे ख़ुदा फ़रज़न्दे अबूतालिब (अ0) का काम है, अबू सुफ़ियान के बेटे का नहीं है।-)))

59-आपका मकतूबे गिरामी
(असवद बिन क़तबा वालीए हलवान के नाम)

अम्माबाद! देखो अगर वाली के ख़्वाहिशात मुख़्तलिफ़ क़िस्म के होंगे तो यह बात उसे अक्सर औक़ात इन्साफ़ से रोक देगी लेकिन तुम्हारी निगाह में तमाम अफ़राद के मामलात को एक जैसा होना चाहिये के ज़ुल्म कभी अद्ल का बदल नहीं हो सकता है। जिस चीज़ को दूसरों के लिये बुरा समझते हो उससे ख़ुद भी इजतेनाब करो और अपने नफ़्स को उन कामों में लगा दो जिन्हें ख़ुदा ने तुम पर वाजिब किया है और इसके सवाब की उम्मीद रखो और अज़ाब से डरते रहो।
और याद रखो के दुनिया दारे आज़माइश है यहां इन्सान की एक घड़ी भी ख़ाली नहीं जाती है मगर यह के यह बेकारी रोज़े क़यामत हसरत का सबब बन जाती है और तुमको कोई ‘ौ हक़ से बेनियाज़ नहीं बना सकती है और तुम्हारे ऊपर सबसे बड़ा हक़ यह है के अपने नफ़्स को महफ़ूज़ रखो और अपने इमकान भर रिआया का एहतेसाब करते रहो के इस तरह जो फ़ायदा तुम्हें पहुंचेगा वह उससे कहीं ज़्यादा बेहतर होगा जो फ़ायदा लोगांे को तुमसे पहुंचेगा, वस्सलाम।


60-आपका मकतूबे गिरामी(उन अमाल के नाम जिनका इलाक़ा फ़ौज के रास्ते में पड़ता था)

बन्दए ख़ुदा अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से इन ख़ेराज जमा करने वालों और इलाक़ों के वालियों के नाम जिनके इलाक़े से लश्करों का गुज़र होता है।
अम्माबाद! मैंने कुछ फ़ौजें रवाना की हैं जो अनक़रीब तुम्हारे इलाक़े से गुज़रने वाली हैं और मैंने उन्हें उन तमाम बातों की नसीहत कर दी है जो उन पर वाजिब हैं के किसी को अज़ीयत न दें और तकलीफ़ को दूर रखें और मैं तुम्हें और तुम्हारे अहले ज़िम्मा को बता देना चाहता हूँ के फ़ौज वाले कोई दस्त दराज़ी करेंगे, तो मैं उनसे बेज़ार रहूंगा मगर यह के कोई ‘ाख़्स भूक से मुज़तर हो और उसके पास पेट भरने का कोई रास्ता न हो, उसके अलावा कोई ज़ालिमाना अन्दाज़ से हाथ लगाए तो उसको सज़ा देना तुम्हारा फ़र्ज़ है, लेकिन अपने सरफिरों को समझा देना के जिन हालात को मैंने मुस्तशना क़रार दिया है उनमें कोई ‘ाख़्स किसी चीज़ को हाथ लगाना चाहे तो उससे मुक़ाबला न न करें और टोकें नहीं, फिर उसके बाद मैं लश्कर के अन्दर मौजूद हूँ अपने ऊपर होने वाली ज़्यादतियों और सख़्ितयों की फ़रयाद मुझसे करो अगर तुम दिफ़ाअ करने के क़ाबिल नहीं हो जब तक अल्लाह की मदद और मेरी इमदाद ‘ाामिल न हो, मैं इन्शाअल्लाह अल्लाह की मदद से हालात को बदल दूँगा।

(((-इस ख़त में हज़रत ने दो तरह के मसाएल का तज़किरा फ़रमाया है, एक का ताल्लुक़ लश्कर से है और दूसरे का उस इलाक़े से जहां से लश्कर गुज़रने वाला है। लश्करवालों को तवज्जो दिलाई है के ख़बरदार रिआया पर ज़ुल्म न होने पाए के तुम्हारा काम ज़ुल्म व जौर का मुक़ाबला करना है, ज़ुल्म करना नहीं है और रास्ते के अवाम को मुतवज्जो किया है के अगर लश्कर में कोई ‘ाख़्स बर बिनाए इज़तेरार किसी चीज़ को इस्तेमाल कर ले तो ख़बरदार उसे मना न करना के यह उसका ‘ारई हक़ है और इस्लाम में किसी ‘ाख़्स को उसके हक़ से महरूम नहीं किया जा सकता है। इसके बाद लश्कर की ज़िम्मेदारी है के अगर कोई मसला पेश आ जाए तो मेरी तरफ़ रूजू करे और अवाम की भी ज़िम्मेदारी है के अपने मसाएल की फ़रियाद मेरे पस पेश करें और सारे मुआमलात को ख़ुद तय करने की कोशिश न करें।-)))

61-आपका मकतूबे गिरामी
(कुमैल बिन ज़ियाद के नाम जो बैतुलमाल के आमिल थे और उन्होंने फ़ौजे दुश्मन को लूटमार से मना नहीं किया)

अम्माबाद! इन्सान का उस काम को नज़र अन्दाज़ कर देना जिसका ज़िम्मेदार बनाया गया है और उस काम में लग जाना जो उसके फ़राएज़ में ‘ाामिल नहीं है एक वाज़ेह कमज़ोरी और तबाहकुन फ़िक्र है।
और देखो तुम्हारा अहले क़िरक़िसया पर हमला कर देना और ख़ुद अपनी सरहदों को मोअत्तल छोड़ देना जिनका तुमको ज़िम्मेदार बनाया गया था। इस आलम में के उनका कोई दिफ़ाअ करने वाला और उनसे लश्करों को हटाने वाला नहीं था एक इन्तेहाई परागन्दा राय है और इस तरह तुम दोस्तों पर हमला करने वाले दुश्मनों के लिये एक वसीला बन गए जहां न तुम्हारे कान्धे मज़बूत थे और न तुम्हारी कोई हैबत थी, न तुमने दुश्मन का रास्ता रोका और न इसकी ‘ाौकत को तोड़ा, न अहले ‘ाहर के काम आए और न अपने अमीर के फ़र्ज़ को अन्जाम दिया।


62-आपका मकतूबे गिरामी
(अहले मिस्र के नाम, मालिके अश्तर के ज़रिये जब उनको वालीए मिस्र बनाकर रवाना किया)

अम्माबाद! परवरदिगार ने हज़रत मोहम्मद (स0) को आलमीन के लिये अज़ाबे इलाही से डराने वाला और मुरसलीन के लिये गवाह और निगरां बनाकर भेजा था लेकिन उनके जाने के बाद ही मुसलमानों ने उनकी खि़लाफ़त में झगड़ा ‘ाुरू कर दिया, ख़ुदा गवाह है के यह बात मेरे ख़याल में भी न थी और न मेरे दिल से गुज़री थी के अरब इस मन्सब को उनके अहलेबैत (अ0) से इस तरह मोड़ देंगे और मुझसे इस तरह दूर कर देंगे के मैंने अचानक यह देखा के लोग फ़लाँ ‘ाख़्स की बैअत के लिये टूटे पड़े हैं तो मैंने अपने हाथ को रोक लिया यहाँ तक के यह देखा के लोग दीने इस्लाम से वापस जा रहे हैं और पैग़म्बर के क़ानून को बरबाद कर देना चाहते हैं, तो मुझे यह ख़ौफ़ पैदा हो गया के अगर इस रख़्ने और बरबादी को देखने के बाद भी मैंने इस्लाम और मुसलमानों की मदद न की तो इसकी मुसीबत रोज़े क़यामत उससे ज़्यादा अज़ीम होगी जो आज इस हुकूमत के चले जाने से सामने आ रही है जो सिर्फ़ चन्द दिन रहने वाली है और एक दिन उसी तरह ख़त्म हो जाएगी जिस तरह सराब की चमक दमक ख़त्म हो जाती है या आसमान के बादल फट जाते हैं तो मैंने इन हालात में क़याम किया यहां तक के बातिल ज़ाएल हो गया और दीन मुतमइन होकर अपनी जगह पर साबित हो गया।
(((-जनाबे कुमैल मौलाए कायनात के मख़सूस असहाब में थे और बड़े पाये के आलिम व फ़ाज़िल थे लेकिन बहरहाल बशर थे और उन्होंने माविया के मज़ालिम के जवाब में यही मुनासिब समझा के जिस तरह वह हमारे इलाक़े में फ़साद फेला रहा है, हम भी उसके इलाक़े पर हमला कर दें ताके फ़ौजों का रूख़ उधर मुड़ जाए मगर यह बात इमामत के मिज़ाज के खि़लाफ़ थी लेहाज़ा हज़रत ने फ़ौरन तम्बीह कर दी और कुमैल ने भी अपने एक़दाम के नामुनासिब होने का एहसास कर लिया और यही इन्सान का कमाले किरदार है के ग़लती पर इसरार न करे वरना ग़लती न करना ‘ााने इस्मत है ‘ााने इस्लाम व ईमान नहीं है।
जनाबे कुमैल की ग़ैरतदारी का यह आलम था के जब हज्जाज ने उन्हें तलाश करना ‘ाुरू किया और गिरफ़्तार न कर सका तो उनकी क़ौम पर दाना, पानी बन्द कर दिया, कुमैल को इस अम्र की इत्तेलाअ मिली तो फ़ौरन हज्जाज के दरबार में पहुंच गए और फ़रमाया के मैं अपनी ज़ात की हिफ़ाज़त की ख़ातिर सारी क़ौम को ख़तरे में नहीं डाल सकता हूँ और ख़ुद मोहब्बते अहलेबैत (अ0) से दस्तबरदार भी नहीं हो सकता हूँ लेहाज़ा मुनासिब यह है के अपनी सज़ा ख़ुद बरदाश्त करूं जिसके नतीजे में हज्जाज ने उनकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा करा दिया।-)))

ख़ुदा की क़सम अगर मैं तनो तन्हा उनके मुक़ाबले पर निकल पड़ूं और उनसे ज़मीन छलक रही हो तो भी मुझे फ़िक्र और दहशत न होगी के मैं उनकी गुमराही के बारे में भी और अपने हिदायत याफ़्ता होने के बारे में भी बसीरत रखता हूँ और परवरदिगार की तरफ़ से मन्ज़िले यक़ीन पर भी हूं और मैं लक़ाए इलाही का इश्तियाक़ भी रखता हूं और इसके बेहतरीन अज्र व सवाब का मुन्तज़िर और उम्मीदवार हूँ। लेकिन मुझे दुख इस बात का है के उम्मत की ज़माम अहमक़ों और फ़ाजिरों के हाथ में चली जाए और वह माले ख़ुदा को अपनी इमलाक और बन्दगाने ख़ुदा को अपना ग़ुलाम बना लें, नेक किरदारों से जंग करें और फ़ासिक़ों को अपनी जमाअत में ‘ाामिल कर लें, जिनमें वह भी ‘ाामिल हैं जिन्होंने तुम्हारे सामने ‘ाराब पी है और उन पर इस्लाम में हद जारी हो चुकी है और बाज़ वह भी हैं के जो उस वक़्त तक इस्लाम नहीं लाए जब तक उन्हें फ़वाएद नहीं पेश कर दिये गए, अगर ऐसा न होता तो मैं तुम्हें इस तरह जेहाद की दावत न देता और सरज़न्श न करता और क़याम पर आमादा न करता बल्कि तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ देता के तुम सरताबी भी करते हो और सुस्त भी हो।

क्या तुम ख़ुद नहीं देखते हो के तुम्हारे एतराफ़ कम होते जा रहे हैं और तुम्हारे ‘ाहरों पर क़ब्ज़ा हुआ जा रहा है, तुम्हारे मुमालिक को छीना जा रहा है और तुम्हारे इलाक़ों पर धावा बोला जा रहा है। ख़ुदा तुम पर रहम करे अब दुश्मन से जंग के लिये निकल पड़ो और ज़मीन से चिपक कर न रह जाओ वरना यूँ ही ज़िल्लत का शिकार होगे, ज़ुल्म सहते रहोगे और तुम्हारा हिस्सा इन्तेहाई पस्त होगा, और याद रखो के जंग आज़मा इन्सान हमेशा बेदार रहता है और अगर कोई ‘ाख़्स सो जाता है तो उसका दुश्मन हरगिज़ ग़ाफ़िल नहीं होता है, वस्सलाम।


63-आपका मकतूबे गिरामी(कूफ़े के आमिल अबूमूसा अशअरी के नाम, जब यह ख़बर मिली के आप लोगों को जंगे जमल की दावत दे रहे हैं और वह रोक रहा है)
बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) का ख़त अब्दुल्लाह बिन क़ैस के नाम-
अम्माबाद! मुझे एक ऐसे कलाम की ख़बर मिली है जो तुम्हारे हक़ में भी हो सकता है और तुम्हारे खि़लाफ़ भी, लेहाज़ा अब मुनासिब यही है के मेरे क़ासिद के पहुंचते ही दामन समेट लो और कमर कस लो और फ़ौरन बिल से बाहर निकल आओ और अपने साथियों को भी बुला लो।
(((-सूरते हाल यह थी के उम्मत ने पैग़म्बर (स0) के बताए हुए रास्ते को नज़रअन्दाज़ कर दिया और अबू बक्र के हाथ पर बैअत कर ली लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) की मुश्किल यह थी के अगर मुसलमानों में जंग व जेदाल का सिलसिला ‘ाुरू कर देते हैं तो मसीलमा कज़्ज़ाब और तलीहा जैसे बदअयान को मौक़ा मिल जाएगाा और वह लोगों को गुमराह करके इस्लाम से  मुनहरिफ़ कर देंगे इसलिये आपने सुकूत इख़्तेयार फ़रमाया और खि़लाफ़त के बारे में कोई बहस नहीं की लेकिन मुरतदों के हाथों इस्लाम की तबाही का मन्ज़र देख लिया तो मजबूरन बाहर निकल आए के बाला आखि़र अपने हक़ की बरबादी पर सुकूत इख़्तेयार किया जा  सकता है, इस्लाम की बरबादी पर सब्र नहीं किया जा सकता है-)))

इसके बाद हक़ साबित हो जाए तो खड़े हो जाओ और कमज़ोरी दिखलाना है तो नज़रों से दूर हो जाओ, ख़ुदा की क़सम तुम जहां रहोगे घेरकर लाए जाओगे और छोड़े नहीं जाओगे यहां तक के दूध मक्खी के साथ और पिघला हुआ मुनजमिद के साथ मख़लूत हो जाए और तुम्हें इत्मीनान से बैठना नसीब न होगा और सामने से इस तरह डरोगे जिस तरह अपने पीछे से डरते हो, और यह काम इस क़द्र आसान नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो, यह एक मुसीबत कुबरा है जिसके ऊँट पर बहरहाल सवार होना पड़ेगा और इसकी दुश्वारियों को हमवार करना पड़ेगा और इसके पहाड़ को सर करना पड़ेगा लेहाज़ा होश के नाखन लो और हालात पर क़ाबू रखो और अपना हिस्सा हासिल कर लो और अगर यह बात पसन्द नहीं है तो उधर चले जाओ जिधर न कोई आव भगत है और न छुटकारे की सूरत, और अब मुनासिब यही है के तुम्हें बेकार समझकर छोड़ दिया जाए के सोते रहो और कोई यह भी न दरयाफ़्तत करे के फ़लां ‘ाख़्स किधर चला गया, ख़ुदा की क़सम यह हक़ परस्त का वाक़ई इक़दाम है और मुझे बेदीनों के आमाल की कोई परवाह नहीं  है, वस्सलाम।

64-आपका मकतूबे गिरामी(माविया के जवाब में)

अम्माबाद! यक़ीनन हम और तुम इस्लाम से पहले एक साथ ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे लेकिन कल यह तफ़रिक़ा पैदा हो गया के हमने ईमान का रास्ता इख़्तेयार कर लिया और तुम काफ़िर रह गए और आज यह इख़्तेलाफ़ है के हम राहे हक़ पर क़ायम हैं और तुम फ़ित्ना में मुब्तिला हो, तुम्हारा मुसलमान भी उस वक़्त मुसलमान हुआ है जब मजबूरी पेश आ गई और सारे अशराफ़े अरब इस्लाम में दाखि़ल होकर रसूले अकरम (स0) की जमाअत में ‘ाामिल हो गए।
तुम्हारा यह कहना के मैंने तल्हा व ज़ुबैर को क़त्ल किया है और आइशा को घर से बाहर निकाल दिया है और मदीना छोड़कर कूफ़े और बसरा में क़याम किया है तो इसका तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है, न तुम पर कोई ज़ुल्म हुआ है और न तुमसे माज़ेरत की कोई ज़रूरत है।
और तुम्हारा यह कहना के  तुम महाजेरीन व अन्सार के साथ मेरे मुक़ाबले पर आ रहे हो तो हिजरत तो उसी दिन ख़त्म हो गई जब तुम्हाारा भाई गिरफ़्तार हुआ था और अगर कोई जल्दी है तो ज़रा इन्तेज़ार कर लो के मैं तुमसे ख़ुद मुलाक़ात कर लूं और यही ज़्यादा मुनासिब भी है के इस तरह परवरदिगार मुझे  तुम्हें सज़ा देने के लिये भेजेगा और अगर तुम ख़ुद भी आ गए तो इसका अन्जाम वैसा ही होगा जैसा के बनी असद के ‘ााएर ने कहा थाः
‘‘वह मौसमे गरमा की ऐसी हवाओं का सामना करने वाले हैं जो नशेबों और चट्टानों पर संगरेज़ों की बारिश कर रही हैं’’
(((-माविया ने हस्बे आदत अपने इस ख़त में चन्द मसाएल उठाए थे, एक मसला यह था के हम दोनों एक ख़ानदान के हैं तो इख़्तेलाफ़ की क्या वजह है? हज़रत ने इसका जवाब यह दिया यह इख़्तेलााफ़ उसी दिन ‘ाुरू हो गया था जब हम दाएराए इस्लााम में थे और तुम कुफ्ऱ की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।
दूसरा मसला यह था के जंगे जमल की सारी ज़िम्मेदारी अमीरूल मोमेनीन (अ0) पर है? इसका जवाब यह है के इस मसले का तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है लेहाज़ा इसके उठाने की ज़रूरत नहीं है।
तीसरा मसला अपने लश्कर के मुहाजेरीन व अन्सार में होने का था? इसका जवाब यह दिया गया के हिजरत फ़तहे मक्का के बाद ख़त्म हाो गई और फ़तहे मक्का में तेरा भाई गिरफ़्तार हो चुका है जिसके बाद तेरे साथी औलााद तलक़ा तो हाो सकते हैं महाजेरीन कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं।-)))
और मेरे पास वही तलवार है जिससे तुम्हारे नाना, मामू और भाई को एक ठिकाने तक पहुंचा चुका हूँ और तुम ख़ुदा की क़सम मेरे इल्म के मुताबिक़ वह ‘ाख़्स जिसके दिल पर ग़िलाफ़ चढ़ा हुआ है और जिसकी अक़्ल कमज़ोर है और तुम्हारे हक़ में मुनासिब यह है के इस तरह कहा जाए के तुम ऐसी सीढ़ी चढ़ गए हो जहां से बदतरीन मन्ज़र ही नज़र आताा है के तुमने दूसरे के गुमशुदा की जुस्तजू की है और दूसरे के जानवर को चराना चाहा है और ऐसे अम्र को तलब किया है जिसके न अहल हो और न उससे तुम्हारा कोई बुनियादी लगाव है। तुम्हारे क़ौल व फ़ेल में किस क़द्र फ़ासला  पाया जाता है और तुम अपने चचा और मामूं से किस क़द्र  मुशाबेह हो जिनको बदबख़्ती और बातिल की तमन्ना ने पैग़म्बर (स0) के इनकार पर आमादा किया और उसके नतीजे में अपने अपने मक़तल में मर-मरकर गिरे जैसा के तुम्हें मालूम है, न किसी मुसीबत को दिफ़ाअ कर सके और न किसी हरीम की हिफ़ाज़त कर सके, उन तलवारों की मार की बिना पर जिनसे कोई मैदाने जंग ख़ाली नहीं होता और जिनमें सुस्ती का गुज़र नहीं है।
और तुमने जो बार बार उस्मान के क़ातिलों का ज़िक्र किया है तो उसका आसान हल यह है के जिस तरह सबने बैअत की है पहले मेरी बैअत करो उसके बाद मेरे पास मुक़दमा लेकर आओ, मैं तुम्हें और ततुम्हारे मुद्दआ अलैहम को किताबे ख़ुदा के फ़ैसले पर आमादा करूंगा लेकिन इसके अलावा जो तुम्हारा मुद्दआ है वह एक धोका है जो बच्चे को दूध छुड़ाते वक़्त दिया जाता है, और सलाम हो उसके अहल पर।

65-आपका मकतूबे गिरामी(माविया ही के नाम)

अम्माबाद! अब वक़्त आ गया है के तुम उमूर का मुशाहेदा करने के बाद उनसे फ़ायदा उठा लो के तुमने बातिल दावा करने, झूठ और ग़लत बयानी के फ़रेब में कूद पड़ने, जो चीज़ तुम्हारी औक़ात से बलन्द है उसे इख़्तेयार करने और जो तुम्हारे लिये ममनूअ है उसको हथिया लेने में अपने इस्लाफ़ का रास्ता इख़्तेयार कर लिया है और इस तरह हक़ से फ़रार और जो चीज़ गोश्त व ख़ून से ज़्यादा तुमसे चिमटी हुई है उसका इनकार करना चाहते हो जिसे तुम्हारे कानों से  सुना है और तुम्हारे सीने में भरी हुई है, तो अब हक़ के बाद खुली हुई गुमराही के अलावा क्या बाक़ी रह जाता है। और वज़ाहत के बाद धोका के अलावा क्या है?

(((-इब्ने अबी अल हदीद का बयान है के माविया रोज़े ग़दीर मौजूद था जब सरकारे दो आलम (स0) ने हज़रत अली (अ0) के मौलाए कायनात होने का एलान किया था और उसने अपने कानों से सुना था और इसी तरह रोज़े तबूक भी मौजूद था जब हज़रत ने ऐलान किया था के अली (अ0) का मरतबा वही है जो हारून का मूसा के साथ है और उसे मालूम था के हुज़ूर ने अली (अ0) की सुलह को अपनी सुलह और उनकी जंग को अपनी जंग क़रार दिया है, मगर इसके बावजूद उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ के इसका रास्ता उसकी फूफी उम्मे हबील और उसके मामू ख़ालिद बिन वलीद जैसे अफ़राद का था जिनके दिल व दिमाग़ में न इस्लाम दाखि़ल हुआ था और न दाखि़ल होने का कोई इमकान था।-)))

लेहाज़ा ‘ाुबह और उसके दसीसेकारी पर मुश्तमिल होने से डरो के फ़ित्ना एक मुद्दत से अपने दामन फैलाए हुए है और उसकी तारीकी ने आंखों को अन्धा बना रखा है।
मेरे पास तुम्हारा वह ख़त आया है जिसमें तरह-तरह की बेजोड़ बातें पाई जाती हैं और उनसे किसी सुलह व आश्ती को तक़वीयत नहीं मिल सकती है और इसमें वह ख़ुराफ़ात हैं जिनके ताने-बाने न इल्म से तैयार हुए हैं और न हिल्म से, इस सिलसिले में तुम्हारी मिसाल उस ‘ाख़्स की है जिसका हुसूल मुश्किल है और जिसके निशानात गुम हो गए हैं और जहां तक उक़ाब परवाज़ नहीं कर सकता है और उसकी बलन्दी सिताराए उयूक़ से टक्कर ले रही है।

हाशा वकला यह कहां मुमकिन है के तुम मेरे इक़तेदार के बाद मुसलमानों के हल व उक़द के मालिक बन जाओ या मैं तुम्हें किसी एक ‘ाख़्स पर भी हुकूमत करने का परवाना या दस्तावेज़ दे दूं लेहाज़ा अभी ग़नीमत है के अपने नफ़्स का तदारूक करो और उसके बारे में ग़ौरो फ़िक्र करो के अगर तुमने उस वक़्त तक कोताही से काम लिया जब अल्लाह के बन्दे उठ खड़े हों तो ततुम्हारे सारे रास्ते बन्द हो जाएंगे और फिर इस बात का भी मौक़ा न दिया जाएगा जो आज क़ाबिले क़ुबूल है, वस्सलाम।

(((-माविया ने हज़रत से मुतालबा किया था के अगर उसे वलीअहदी का ओहदा दे दिया जाए तो वह बैअत करने के लिये तैयार है और फ़िर ख़ूने उस्मान कोई मसला न रह जाएगा। आपने बिलकुल वाज़ेह तौर पर इस मुतालबे को ठुकरा दिया है और माविया पर रौशन कर दिया है के मेरी हुकूमत में तेरे जैसे अफ़राद की कोई जगह नहीं है और तूने जिस मक़ाम का इरादा किया है वह तेरी परवाज़ से बहुत बलन्द है और वहां तक जाना तेरे इमकान में नहीं है। बेहतर यह है के अपनी औक़ात का इदराक कर ले और राहे रास्त पर आ जाए।-)))


66-आपका मकतूबे गिरामी(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम, जिसका तज़किरा पहले भी दूसरे अलफ़ाज़ में हो चुका है)

अम्माबाद! इन्सान कभी-कभी ऐसी चीज़ को पाकर भी ख़ुश नहीं होता है जो जाने वाली नहीं थी और ऐसी चीज़ को खोकर भी रन्जीदा हो जाता है जो मिलने वाली नहीं थी लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हारे लिये दुनिया की सबसे बड़ी नेमत किसी लज़्ज़त का हुसूल या जज़्बाए इन्तेक़ाम ही न बन जाए बल्कि बेहतरीन नेमत बातिल के मिटाने और हक़ के ज़िन्दा करने को समझो और  तुम्हारा सुरूर उन आमाल से हो जिन्हें पहले भेज दिया है और तुम्हारा अफ़सोस उन उमूर पर हो जिसे छोड़कर चले गए हो और तमामतर फ़िक्र मौत के बाद के मरहले के बारे में होनी चाहिये।


67-आपका मकतूबे गिरामी
(मक्के के आमिल क़ुसम बिन अलअबास के नाम)

अम्माबाद! लोगों के लिये हज के क़याम का इन्तेज़ार करो और उन्हें अल्लाह के यादगार दिनों को याद दिलाओ, सुबह व ‘ााम उमूमी जलसे रखो, सवाल करने वालों के सवालात के जवाबात दो, जाहिल को इल्म दो और ओलमा से तज़किरा करो, लोगों तक तुम्हारा कोई तर्जुमान तुम्हारी ज़बान के अलावा न हो और तुम्हारा काई दरबान तुम्हारे चेहरे के अलावा न हो, किसी ज़रूरतमन्द को मुलाक़ात से मत रोकना के अगर पहली ही मरतबा उसे वापस कर दिया गया तो उसके बाद काम कर भी दोगे तो तुम्हारी तारीफ़ न होगी, जो अमवाल  तुम्हारे पास जमा हो जाएं उन पर नज़र रखो और तुम्हारे यहां जो अयालदार और भूके प्यासे लोग हैं उन पर सर्फ़ कर दो बशर्ते के उन्हें वाक़ई मोहताजों और ज़रूरतमन्दों तक पहुंचा दो और उसके बाद जो बच जाए वह मेरे पास भेज दो ताके यहाँ के मोहताजों पर तक़सीम कर दिया जाए।
अहले मक्का से कहो के ख़बरदार मकानात का किराया न लें के परवरदिगार ने मक्के को मुक़ीम और मुसाफ़िर दोनों के लिये बराबर क़रार दिया है। (आकिफ़ मुक़ीम को कहा जाता है और यादी जो बाहर से हज करने के लिये आता है) अल्लाह हमें और तुम्हें अपपने पसन्दीदा आमाल की तौफ़ीक़ दे, वस्सलाम।
(((-खुली हुई बात है के यह अम्रे वजूबी नहीं है और सिर्फ़ इस्तेहबाबी और एहतेरामी है वरना हज़रत (अ0) ने जिस आयते करीमा से इस्तेदलाल फ़रमाया है उसका ताल्लुक़ मस्जिदुल हराम से है, सारे मक्के से नहीं है और मक्के को मस्जिदुल हरामम मिजाज़न कहा जाता है जिस तरह के आयते मेराज में जनाबे उम हानी के मकान को मस्जिदुल हराम क़रार दिया गया है वैसे यह मसला ओलमाए इस्लाम में इख़्तेलाफ़ी हैसियत रखता है और अबू हनीफ़ा ने सारे मक्के के मकानात को किराये पर देने को हराम क़रार दिया है और इसकी दलील अब्दुल्लाह बिन अम्रो बिनअल आस की रिवायत को क़रार दिया गया है जो ओलमाए शिया के नज़दीक क़तअन मोतबर नहीं है और हैरत अंगेज़ बात यह है के जो अहले मक्का अपने को हनफ़ी कहने में फ़ख़्र महसूस करते हैं वह भी अय्यामे हज के दौरान दुगना चैगना बल्कि दस गुना किरायाा वसूल करने ही को इस्लाम व हरमे इलाही की खि़दमत तसव्वुर करते हैं, और हज्जाजे कराम को ‘‘ज़यूफ़ल रहमान’’ क़रार देकर उन्हें ‘‘अर्ज़ुल रहमान’’ पर क़याम करने का हक़ नहीं देते हैं।-)))


68-आपका मकतूबे गिरामी(जनाबे सलमान फ़ारसी के नाम-अपने दौरे खि़लाफ़त से पहले)

अम्माबाद! इस दुनिया की मिसाल सिर्फ़ सांप जैसी है जो छूने में इन्तेहाई नर्म होता है लेकिन इसका ज़हर इन्तेहाई क़ातिल होता है, इसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे भी किनाराकशी करो के इसमें से साथ जाने वाला बहुत कम है, इसके हम्म व ग़म को अपने से दूर रखो के इससे जुदा होना यक़ीनी है और इसके हालात बदलते ही रहते हैं। इससे जिस वक़्त ज़्यादा इन्स महसूस करो उस वक़्त ज़्यादा होशियार रहो के इसका साथी जब भी किसी ख़ुशी की तरफ़ से मुतमईन होता है यह उसे किसी नाख़ुशगवार के हवाले कर देती है और उन्स से निकाल कर वहशत के हालात तक पहुंचा देती है, वस्सलाम।

Thursday, May 19, 2011

Nahjul Balagha Hindi Khat 53 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 53 ख़त


53-आपका मकतूबे गिरामी(जिसे मालिक बिन अश्तर नग़मी के नाम तहरीर फ़रमाया है, उस वक़्त जब उन्हें मोहम्मद बिन अबीबक्र के हालात के ख़राब हो जाने के बाद मिस्र और उसके एतराफ़ का आमिल मुक़र्रर फ़रमाया और यह अहदनामा हज़रत के तमाम सरकारी ख़ुतूत में सबसे ज़्यादा मुफ़स्सिल और महासिन कलाम का जामा है)
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम
    यह वह क़ुरान है जो बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) ने मालिक बिन अश्तर नग़मी के नाम लिखा है जब उन्हें ख़ेराज जमाा करने, दुश्मन से जेहाद करने, हालात की इस्लाह करने और ‘ाहरों की आबादकारी के लिये मिस्र का आमिल क़रार देकर रवाना किया।
    सबसे पहला अम्र यह है के अल्लाह से डरो, उसकी इताअत को इख़्तेयार करो और जिन फ़राएज़ व सुन्ना का अपनी किताब में हुक्म दिया गया है उनका इत्तेबाअ करो के कोई ‘ाख़्स उनके इत्तेबाअ के बग़ैर नेक बख़्त नहीं हो सकता है और कोई ‘ाख़्स उनके इन्कार और बरबादी के बग़ैर बदबख़्त नहीं क़रार दिया जा सकता है, अपने दिल, हाथ और ज़बान से दीने ख़ुदा की मदद करते रहना के ख़ुदाए ‘‘इज़्ज़्ाासमहू’’ ने यह ज़िम्मेदारी ली है के अपने मददगारों की मदद करेगाा और अपने दीन की हिमायत करने वालों को इज़्ज़त व ‘ारफ़ इनायत करेगा।
    दूसरा हुक्म यह है के अपने नफ़्स के ख़्वाहिशात को कुचल दो और उसे मुंह ज़ोरियों से रोके रहो के नफ़्स बुराइयों का हुक्म देने वाला है जब तक परवरदिगार का रहम ‘ाामिल न हो जाए इसके बाद मालिक यह याद रखना के मैंने तुमको ऐसे इलाक़े की तरफ़ भेजा है जहां अद्ल व ज़ुल्म की मुख़्तलिफ़ हुकूमतें गुज़र चुकी हैं और लोग तुम्हारे मामलात को इस नज़र से देख रहे हैं जिस नज़र से तुम उनके आमाल को देख रहे थे और तुम्हारे बारे में वही कहेंगे जो तुम दूसरों के बारे में कह रहे थे, नेक किरदार बन्दों की शिनाख़्त इस ज़िक्रे ख़ैर से होती है जो उनके लिये लोगों की ज़बानों पर जारी होता है लेहाज़ा तुम्हारा महबूबतरीन ज़ख़ीराए अमले स्वालेह को होना चाहिये, ख़्वाहिशात को रोक कर रखो और जो चीज़ हलाल न हो उसके बारे में नफ़्स को सर्फ़ करने से बुख़ल करो के यही बुख़ल इसके हक़ में इन्साफ़ है चाहे उसे अच्छा लगे या बुरा, रिआया के साथ मेहरबानी और मोहब्बतत व रहमत को अपने दिल का ‘ाोआर बना लो और ख़बरदार इनके हक़ में फाड़ खाने वाले दरिन्दे के मिस्ल न हो जाना के उन्हें खा जाने ही को ग़नीमत समझने लगो। के मख़लूक़ाते ख़ुदा की दो क़िस्में हैं, बाज़ तुम्हारे दीनी भाई हैं और बाज़ खि़लक़त में तुम्हारे जैसे बशर हैं जिनसे लग़्ज़िशें भी हो जाती हैं और उन्हें ख़ताओं का सामना भी करना पड़ता है और जान बूझकर या धोके से उनसे ग़लतियां भी हो जाती हैं। लेहाज़ा उन्हें वैसे ही माफ़ कर देना जिस तरह तुम चाहते हो के परवरदिगार तुम्हारी ग़लतियों से दरगुज़र करे के तुम उनसे बालातर हो और तुम्हारा वलीए अम्र तुमसे बालातर है और परवरदिगार तुम्हारे वाली से भी बालातर है और उसने तुमसे उनके मामलात की अन्जामदही का मुतालबा किया है और उसे तुम्हारे लिये ज़रियाए आज़माइश बना दिया है और ख़बरदार अपने नफ़्स को अल्लाह के मुक़ाबले पर न उतार देना।
(((-यह इस्लामी निज़ाम का इम्तेयाज़ी नुक्ता है के इस निज़ाम में मज़हबी तास्सुब से काम नहीं लिया जाता है बल्कि हर ‘ाख़्स को बराबर के हुक़ूक़ दिये जाते हैं। मुसलमान का एहतेराम उसके इस्लाम की बिना पर होता है और ग़ैर मुस्लिम के बारे में इन्सानी हुक़ूक़ का तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है और उन हुक़ूक़ में बुनियादी नुक्ता यह है के हााकिम हर ग़लती का मवाख़ेज़ा न करे बल्कि उन्हें इन्सान समझ कर उनकी ग़लतियों को बरदाश्त करे और उनकी ख़ताओं से दरगुज़र करे और यह ख़याल रखे के मज़हब का एक मुस्तक़िल निज़ाम है ‘‘रहम करो ताके तुम पर रहम किया जाए’’ अगर इन्सान अपने से कमज़ोर अफ़राद पर रहम नहीं करता है तो उसे जब्बार समावात व अर्ज़ से तवक़्क़ो नहीं करनी चाहिये, क़ुदरत का अटल क़ानून है के तुम अपने से कमज़ोर पर रहम करो ताके परवरदिगार तुम पर रहम करे और तुम्हारी ख़ताओं को माफ़ कर दे जिस पर तुम्हारी आक़ेबत और बख़्िशश का दारोमदार है-)))
इसलिये के लोगों में बहरहाल कमज़ोरियां पाई जाती हैं और उनकी परदापोशी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी वाली पर है लेहाज़ा ख़बरदार जो ऐब तुम्हारे सामने नहीं है उसका इन्केशाफ़ न करना, तुम्हारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उयूब की इस्लाह कर देना है और ग़ायबात का फ़ैसला करने वाला परवरदिगार है जहां तक मुमकिन हो लोगों के उन तमाम उयूब की परदा पोशी करते रहो जिन अपने उयूब की परदापोशी की परवरदिगार से तमन्ना करते हो, लोगों की तरफ़ से कीना की कर गिरह को खोल दो और दुश्मनी की हर रस्सी को काट दो और जो बात तुम्हारे लिये वाज़ेह न हो उससे अन्जान बन जाओ और हर चुग़लख़ोर की तस्दीक़ में उजलत से काम न लो के चुग़लख़ोर हमेशा ख़यानततकार होता है चाहे वह मुख़लेसीन ही के भेस में क्यों न आए।
(मशावेरत)ः देखो अपने मशविरे में किसी बुख़ल को ‘ाामिल न करना के वह तुमको फ़ज़्ल व करम के रास्ते से हटा देगा और फ़क़्र व फ़ाक़े का ख़ौफ़ दिलाता रहेगा और इसी तरह बुज़दिल से मशविरा न करना के वसह हर मामले में कमज़ोर बना देगा, और हरीस से भी मशविरा न करना के वह ज़ालिमाना तरीक़े से माल जमा करने को भी तुम्हारी निगाहों में आरास्ता कर देगा, यह बुख़ल, बुज़दिली और तमअ अगरचे अलग-अलग जज़्बात व ख़साएल हैं लेकिन इन सबका क़द्रे मुश्तर्क परवरदिगार से सूए ज़न है जिसके बाद इन ख़सलतों का ज़हूर होता है।
(वोज़रात)ः और देखो तुम्हारे वोज़रा में सबसे ज़्यादा बदतर वह है जो तुमसे पहले इशरार का वज़ीर रह चुका हो और उनके गुनाहों में ‘ारीक रह चुका हो, लेहाज़ा ख़बरदार! ऐसे अफ़राद को अपने ख़्वास में ‘ाामिल न करना के यह ज़ालिमों के मददगार और ख़यानत कारों के भाई बन्द हैं और तुम्हें इनके बदले बेहतरीन अफ़राद मिल सकते हैं जिनके पास उन्हीं की जैसी अक़्ल और कारकर्दगी हो और उनके जैसे गुनाहों के बोझ और ख़ताओं के अम्बार न हों, न उन्होंने किसी ज़ालिम की उसके ज़ुल्म में मदद की हो और न किसी गुनाहगार का उसके गुनाह में साथ दिया हो, यह वह लोग हैं जिनका बोझ तुम्हारे लिये हल्का होगा और यह तुम्हारे बेहतरीन मददगार होंगे और तुम्हारी तरफ़ मोहब्बत का झुकाव भी रखते होंगे और अग़यार से इन्स व उलफ़त भी न रखते होंगे। उन्हीं को अपने मख़सूस इजतेमाआत में अपना मुसाहब क़रार देना और फिर उनमें भी सबसें ज़्यादा हैसियत उसे देना जो हक़ के हफेऱ् तल्ख़ को कहने की ज़्यादा हिम्मत रखता हो और तुम्हारे किसी ऐसे अमल में तुम्हारा साथ न दे जिसे परवरदिगार अपने औलिया के लिये न पसन्द करता हो चाहे वह तुम्हारी ख़्वाहिशात से कितनी ज़्यादा मेल क्यों न खाती हो।
(मसाहेबत) ः अपना क़रीबी राबेता अहले तक़वा और अहले सदाक़त से रखना और उन्हें भी इस अम्र की तरबीयत देना के बिलाा सबब तुम्हारी तारीफ़ र करें और किसी ऐसे बेबुनियाद अमल का ग़ुरूर न पैदा कराएं जो तुमने अन्जाम न दिया हो के ज़्यादा तारीफ़ से ग़ुरूर पैदा होता है औश्र ग़ूरूरे इन्सान को सरकशी से क़रीबतर बना देता है।
 देखो ख़बरदार! नेक किरदार और बदकिरदार तुम्हारे नज़दीक यकसां न होने पाएं के इस तरह नेक किरदारों में नेकी से बददिली पैदा होगी और बदकिरदारों में बदकिरदारी का हौसला पैदा होगा। हर ‘ाख़्स के साथ वैसा ही बरताव करना जिसके क़ाबिल उसने अपने को बनाया है और याद रखना के हाकिम में रिआया से हुस्ने जज़न की उसी क़द्र तवक़्क़ो करनी चाहिये जिस क़द्र उनके साथ एहसान किया है और उनके बोझ को हलका बनाया है और उनको किसी ऐसे काम पर मजबूर नहीं किया है जो उनके इमकान में न हो, लेहाज़ा तुम्हारा बरताव इस सिलसिले में ऐसा ही होना चाहिये जिससे तुम रिआया से ज़्यादा से ज़्यादा हुस्ने ज़न पैदा कर सको के यह हुस्ने ज़न बहुत सी अन्दरूनी ज़हमतों को क़ता कर देता है और तुम्हारे हुस्ने ज़न का भी सबसे ज़्यादा हक़दार वह है जिसके साथ तुमने बेहतरीन सलूक किया है।
(((-इन फ़िक़रात में ज़िन्दगी के मुख़तलिफ़ ‘ाोबों के बारे में हिदायत का ज़िक्र किया गया है और इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है के हाकिम को किसी ‘ाोबए हयात से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिये और किसी महाज़ पर भी कोई ऐसा एक़दाम नहीं करना चाहिये जो हुकूमत को तबाह व बरबाद कर दे और अवामी मफ़ादात को नज़रे तग़ाफ़िल करके उन्हें ज़ुल्म व सितम काा निशाना बना दे-)))
सबसे ज़्यादा बदज़नी का हक़दार वह है जिस का बरताव तुम्हारे साथ ख़राब रहा हो, देखो किसी ऐसी नेक सुन्नत को मत तोड़़ देना जिस पर इस उम्मत के बुज़ुर्गों ने अमल किया है और उसी के ज़रिये समाज में उलफ़त क़ायम होती है और रिआया के हालात की इस्लाह हुई है और किसी ऐसी सुन्नत को ईजाद न करना जो गुज़िश्ता सुन्नतों के हक़ में नुक़सानदेह हाो के इस तरह अज्र उसके लिये होगा जिसने सुन्नत को ईजाद किया है और गुुनाह तुम्हारी गर्दन पर होगा के तुमने उसे तोड़ दिया है।
ओलमा के साथ इल्मी मुबाहेसे और हुकमा के साथ सन्जीदा बहस जारी रखना उन मसाएल के बारे में जिनसे इलाक़े के उमूर की इस्लाह होती है और उमूर क़ायम रहते हैं जिनसे गुज़िश्ता अफ़राद के हालात की इस्लाह हुई है।
और याद रखो के रिआया के बहुत से तबक़ात होते हैं जिनमें किसी की इस्लाह दूसरे के बग़ैर नहीं हो सकती है और कोई दूसरे से मुस्तग़नी नहीं हो सकता है। उन्हीं में अल्लाह के लश्कर के सिपाही हैंं और उन्हीं में आम व ख़ास उमूर के कातिब हैं उन्हीं में अदालत से फ़ैसले करने वाले हैं और उन्हीं में इन्साफ़ और नर्मी क़ायम करने वाले अमाल हैं उन्हीं में मुसलमान अहले ख़ेराज और काफ़िर अहले ज़िम्मा हैं और उन्हीं में तिजारत और सनअत (तिजारत पेशा व अहले हरफ़ा) वाले अफ़राद हैं और फिर उन्हीं में फ़ोक़रा और मसाकीन का पस्त तरीन तबक़ा भी ‘ाामिल है और सबके लिये परवरदिगार ने एक हिस्सा मुअय्यन कर दिया है। और अपनी किताब के फ़राएज़ या अपने पैग़म्बर की सुन्नत में इसकी हदें क़ायम कर दी हैं और यह वह अहद है जो हमारे पास महफ़ूज़ है।
फ़ौजी दस्ते बहुक्मे ख़ुदा से रिआया के मुहाफ़िज़ और वालियों की ज़ीनत हैं, उन्हीं से दीन की इज़्ज़त है और यही अम्न व अमान के वसाएल हैं। रईयत का (नज़्म व नस्क़) उमूर का क़याम उनके बग़ैर नहीं हो सकता है और यह दस्ते भी क़ायम नहीं रह सकते हैं। जब ततक वह ख़ेराज न निकाल दिया जाए जिसके ज़रिये से दुश्मन से जेहाद की ताक़त फ़राहम होती है और जिसपर हालात की इस्लाह में एतमाद किया जाता है और वही इनके हालात के दुरूस्त करने का ज़रिया है और इसके बाद इन दोनों सनफ़ों (तबक़ों) का क़याम काज़ियों आमिलों और कातिबों के तबक़े के बग़ैर नहीं हो सकता है के यह सब अहद व पैमान को मुस्तहकम बनाते हैं मामूली और ग़ैर मामूली मामलात में उनपपर एतमाद किया जाता है, इसके बाद उन सबका क़याम सौदागरों और सनअतकारों पर होता है के वह वसाएले हयात को फ़राहम करते हैं, बाज़ारों को क़ायम रखते हैं और लोगों की ज़रूरत का सामान उनकी ज़हमत के बग़ैर फ़राहम कर देते हैं। इसके बाद फ़ोक़रा व मसाकीन का पस्त तबक़ा है जो अआनत व इमदाद का हक़दार है और अल्लाह के यहां हर एक के लिये सामाने हयात मुक़र्रर है और हर तबक़े का वाली पर इतनी मिकदार में हक़ है जिससे इसके अम्र की इस्लाह हो सके और वाली इस फ़रीज़े से ओहदा बरआ नहीं हो सकता है जब तक इन मसाएल का एहतेमाम न करे और अल्लाह से मदद तलब न करे और अपने नफ़्स को हुक़क़ की अदाएगी और इस राह के ख़फ़ीफ़ व सक़ील पर सब्र करने के लिये आमादा न करे लेहाज़ा लश्कर का सरदार उसे क़रार देना जो अल्लाह, रसूल और इमाम का सबसे ज़्यादा मुख़लिस, सबसे ज़्यादा पाकदामन और सबसे ज़्यादा बरदाश्त करने वाला हो।
(((-इस मुक़ाम पर अमीरूलमोमेनीन (अ0) ने समाज को 9 हिस्सों पर तक़सीम किया है और सबके ख़ुसूसियात, फ़राएज़, अहमियत और ज़िम्मेदारियों काा तज़किरा फ़रमाया है और यह वाज़ेह कर दिया है के एक काम दूसरे के बग़ैर नहीं हो सकता है लेहाज़ा हर एक का फ़र्ज़ है के दूसरे की मदद करे ताके समाज की मुकम्मल इस्लाह हो सके और मुआशरा चैन और सुकून की ज़िन्दगी जी सके वरना इसके बगै़र समाज तबाह व बरबाद हो जाएगा और इसकी ज़िम्मेदारी तमाम तबक़ात पर यकसां तौर पर आयद होगी।-)))
फ़ौज का सरदार उसको बनाना जो अपने अल्लाह का और अपने रसूल (स0) का और तुम्हारे इमाम का सबसे ज़्यादा ख़ैरख़्वाह हो सबसे ज़्यादा पाक दामन हो, और बुर्दबारी में नुमायां हो, जल्द ग़ुस्से में न आ जाता हो, उज़्र माज़ेरत पर मुतमइन हो जाता हो, कमज़ोरों पर रहम खाता हो और ताक़तवरों के सामने अकड़ जाता हो न बदख़ोई उसे जोश में ले आती हो और न पस्त हिम्मती उसे बिठा देती हो, फिर ऐसा होना चाहिये के तुम बलन्द ख़ानदान, नेक घराने और उमदा रिवायात रखने वालों और हिम्मत व ‘ाुजाअत और जूद व सख़ावत के मालिकों से अपना रब्त व ज़ब्त बढ़ाओ क्योंके यही लोग बुज़ुर्गियों का सरमाया और नेकियों का सरचश्मा होते हैं फिर उनके हालात की इस तरह देख भाल करना, जिस तरह माँ बाप अपनी औलाद की देखभाल करते हैं, अगर उनके साथ कोई ऐसा सलूक करो के जो उनकी तक़वीयत का सबब हो तो उसे बड़ा न समझना और अपने किसी मामूली सुलूक को भी ग़ैर अहम न समझ लेना (के उसे छोड़ बैठो) क्योंके इस हुस्ने सुलूक से उनकी ख़ैरख़्वाही का जज़्बा उभरेगा और हुस्ने एतमाद में इज़ाफ़ा होगा और इस ख़याल से के तुमने उनकी बड़ी ज़रूरतों को पूरा कर दिया है, कहीं उनकी छोटी ज़रूरतों से आंख बन्द न कर लेना, क्योंके यह छोटी क़िस्म की मेहरबानी की बात भी अपनी जगह फ़ायदाबख़्श होती है और वह बड़ी ज़रूरतें अपनी जगह अहमियत रखती हैं और फ़ौजी सरदारों में तुम्हारे यहां वह बुलन्द मन्ज़िलत समझा जाए, जो फ़ौजियों की एआनत में बराबर का हिस्सा लेता हो और अपने रूप्ये पैसे से इतना सलूक करता हो जिससे उनका और उनके पीछे रह जाने वाले बाल-बच्चों का बख़ूबी गुज़ारा हो सकता हो। ताके वह सारी फ़िक्रों से बेफ़िक्र होकर पूरी यकसूई के साथ दुश्मन से जेहाद करें इसलिये के फ़ौजी सरदारों के साथ तुम्हारा मेहरबानी से पेश आना इनके दिलों को तुम्हारी तरफ़ मोड़ देगा।
हुक्मरानों के लिये सबसे बड़ी आंखों की ठण्डक इसमें है के ‘ाहरों में अद्ल व इन्साफ़ बरक़रार रहे और रिआया की मोहब्बत ज़ाहिर होती रहे और उनकी मोहब्बत उसी वक़्त ज़ाहिर हुआ करती है के जब उनके दिलों में मैल न हो, और उनकी ख़ैर ख़्वाही उसी सूरत में साबित होती है के ववह अपने हुक्मरानों के गिर्द हिफ़ाज़त के  लिये घेरा डाले रहें। इनका इक़्तेदार सर पड़ा बोझ न समझें और न उनकी हुकूमत के ख़ात्मे के लिये घड़ियां गिनें, लेहाज़ा उनकी उम्मीदों में वुसअत व कशाइश रखना, उन्हें अच्छे लफ़्ज़ों से सराहते रहना और उनमें के अच्छी कारकर्दगी दिखाने वालों के कारनामों का तज़किरा करते रहना, इसलिये के इनके अच्छे कारनामों का ज़िक्र बहादुरों को जोश में ले आता है और पस्त हिम्मतों को उभारता है, इन्शाअल्लाह जो ‘ाख़्स जिस कारनामे को अन्जाम दे उसे पहचानते रहना और एक का कारनामा दूसरे की तरफ़ मन्सूब न कर देना और उसकी हुस्ने कारकर्दगी का सिला देने में कमी न करना और कभी ऐसा न करना के किसी ‘ाख़्स की बलन्दी व रफ़अत की वजह से उसके मामूली काम को बढ़ा समझ लो और किसी के बड़े काम को उसके ख़ुद पस्त  होने की वजह से मामूली क़रार दे लो।
जब ऐसी मुश्किलें तुम्हें पेश आएं के जिनका हल न हो सके और ऐसे मुआमलात के जो मुश्तबा हो जाएं तो उनमें अल्लाह और रसूल (स0) की  तरफ़ रूजू करो क्योंके ख़ुदा ने जिन लोगों को हिदायत करना चाही है उनके लिये फ़रमाया है - ‘‘ऐ ईमान दारों अल्लाह की इताअत करो, और उसके रसूल (स0) की और उनकी जो तुम में साहेबाने अम्र हों’’ तो अल्लाह की तरफ़ रूजू करने का मतलब यह है के उसकी किताब की मोहकम आयतों पर अमल किया जाए और रसूल की तरफ़ रूजु करने का मतलब यह है कि आपके उन मुत्तफ़िक़ अलिया इरशादात पर अमल किया जाए जिनमें कोई इख़्तेलाफ़ नहीं (मक़सद उनकी सुन्नत की तरफ़ पलटाना है, जो उम्मत को जमा करने वाली हो तफ़रिक़ा डालने वाली न हो)।
क़ज़ावतः
फिर उसके बाद तुम ख़ुद भी उनके फ़ैसलों की निगरानी करते रहना और उनके अताया में इतनी वुसअत पैदा कर देना के उनकी ज़रूरत ख़त्म हो जाए और फिर लोगों के मोहताज न रह जाएं उन्हें अपने पास ऐसा मरतबा और मुक़ाम अता करना जिसकी तुम्हारे ख़्वास भी तमअ न करते हों के इस तरह वह लोगों के ज़रर पहुंचाने से महफ़ूज़ हो जाएंगे। मगर इस मामले पर भी गहरी निगाह रखना के यह दीन बहुत दिनों अशरार के हाथों में क़ैदी रह चुका है जहां ख़्वाहिशात की बुनियाद पर काम होता था और मक़सद सिर्फ़ दुनिया तलबी था।
उम्मालः
इसके बाद अपने आमिलों के मामलात पर भी निगाह रखना और उन्हें इम्तेहान के बाद काम सिपुर्द करना और ख़बरदार ताल्लुक़ात या जानिबदारी की बिना पर ओहदा न दे देना के यह बातें ज़ुल्म और ख़यानत के असरात में ‘ाामिल हैं और देखो इनमें भी जो मुख़लिस और ग़ैरतमन्द हों उनको तलाश करना जो अच्छे घराने के अफ़राद हों और उनके इस्लाम में साबिक़ जज़्बात रह चुके हों के ऐसे लोग ख़ुश इख़लाक़ और बेदाग़ इज़्ज़त वाले होते हैं, इनके अन्दर फ़िज़ूल ख़र्ची की लालच कम होती है और यह अन्जामकार पर ज़्यादा नज़र रखते हैं। इसके बाद इनके भी तमाम एख़राजात का इन्तेज़ाम कर देना के इससे उन्हें अपने नफ़्स की इस्लाह का भी मौक़ा मिलता है और दूसरों के अमवाल पर क़ब्ज़ा करने से भी बेनियाज़ हो जाते हैं और फिर तुम्हारे अम्र की मुख़ालेफ़त करें या अमानत में रख़ना पैदा करें तो उन पर हुज्जत तमाम हो जाती है।
इसके बाद उन अमाल के आमाल की भी तफ़तीश करते रहना और निहायत मोतबर क़िस्म के अहले सिद्क़ व सफ़ा को उन पर जासूसी के लिये मुक़र्रर कर देना के यह तर्ज़े अमल
(((-इस मुक़ाम पर क़ाज़ियों के हस्बेज़ैल सिफ़ात का तज़किरा किया गया है-
1. ख़ुद हाकिम की निगाह में क़ज़ावत करने के क़ाबिल हो 2- तमाम रिआया से अफ़ज़लीयत की बुनियाद पर मुन्तख़ब किया गया हो 3- मसाएल में उलझ न जाता हो बल्कि साहेबे नज़र व स्तनबात हो 4- फ़रीक़ैन के झगड़ों पर ग़ुस्सा न करता हो 5- ग़लती हो जाए तो उस पर अकड़ता न हो 6- लालची न हो 7- मुआमलात की मुकम्मल तहक़ीक़ करता हो और काहेली का शिकार न हो 8- ‘ाुबहात के मौक़े पर जल्दबाज़ी से काम न लेता हो बल्कि दीगर मुक़र्ररा क़वानीन की बुनियाद पर फ़ैसला करता हो 9- दलाएल को क़ुबूल करने वाला हो 10- फ़रीक़ैन की तरफ़ मराजअ करने से उकताता न हो बल्कि पूरी बहस सुनने की सलाहियत रखता हो 11- तहक़ीक़ातत में बेपनाह क़ूवते सब्र व तहम्मुल का मालिक हो 12- बात वाज़ेह हो जाए तो क़तई फ़ैसलाा करने में तकल्लुफ़ न करता हो 13- तारीफ़ से मग़रूर न होता हो 14- लोगों के उभारने से किसी तरफ़ झुकाव न पैदा करता हो।-)))
उन्हें अमानतदारी के इस्तेमाल पर और रिआया के साथ नर्मी के बरताव पर आमादा करेगा और देखो अपने मददगारों से भी अपने को बचाकर रखना के अगर उनमें कोई एक भी ख़यानत की तरफ़ हाथ बढ़ाए और तुम्हारे जासूस मुत्तफ़िक़ा तौर पर यह ख़बर दे ंतो इस ‘ाहादत को काफ़ी समझ लेना और इसे जिस्मानी एतबार से भी सज़ा देना और जो माल हासिल किया है उसे छीन भी लेना और समाज में ज़िल्लत के मक़ाम पर रख कर ख़यानतकारी के मुजरिम की हैसियत से रू शिनास कराना और ज़ंग व रूसवाई काा तौक़ उसके गले में डाल देना।

ख़ेराजः
ख़ेराज और मालगुज़ारी के बारे में वह तरीक़ा इख़्तेयार करो जो मालगुज़ारों के हक़ में ज़्यादा मुनासिब हो के ख़ेराज और अहले ख़ेराज के सलाह ही में सारे तुम्हारे सारे मुआशरे की सलाह है और किसी के हालात की इस्लाह ख़ेराज की इस्लाह के बग़ैर नहीं हो सकती है, लोग सबके सब इसी ख़ेराज के भरोसे ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, ख़ेराज में तुम्हारी नज़र माल जमा करने से ज़्यादा ज़मीन की आबादकारी पर होनी चाहिये के माल की जमाआवरी ज़मीन की आबादकारी के बग़ैर मुमकिन नहीं है और जिसने आबादकारी के बग़ैर मालगुज़ारी का मुतालेबा किया उसने ‘ाहरों को बरबाद कर दिया और बन्दों को तबाह कर दिया और उसकी हुकूमत चन्द दिनों से ज़्यादा क़ायम नहीं रह सकती है। इसके बाद अगर लोग गरांबारी, आफ़ते नागहानी, नहरों की ख़ुश्की, बारिश की कमी, ज़मीन की ग़रक़ाबी की बिना पर तबाही और ख़ुश्की  की बिना पर बरबादी की कोई फ़रियाद करें तो उनके ख़ेराज  में इस क़द्र तख़फ़ीफ़ कर देना के उनके उमूर की  इस्लाह हो सके और हख़बरदार यह तख़फ़ीफ़ तुम्हारे नफ़्स पर गरां न गुज़रे इसलिये के तख़फ़ीफ़ और सहूलत एक ज़ख़ीरा है  जिसका असर ‘ाहरों की आबादी और हुक्काम की ज़ेब व ज़ीनत की ‘ाक्ल में तुम्हारी ही तरफ़ वापस आएगा और इसके  अलावा तुम्हें बेहतरीन तारीफ़ भी हासिल  होगी और अद्ल  व इन्साफ़ के फैल जाने से मसर्रत भी हासिल  होगी, फिर उनकी राहत व रफ़ाहियत और अद्ल व इन्साफ़, नरमी व सहूलत की बिना पर जो एतमाद हासिल किया है उससे एक इन्सानी ताक़त भी हासिल होगी जो बवक़्ते ज़रूरत काम आ सकती है। इसलिये के बसा औक़ात  ऐसे हालात पेश आ जाते हैं के जिसमें  एतमाद व हुस्ने ज़न के क़द्रदान पर एतमाद करो तो निहायत  ख़ुशी से मुसीबत को बरदाश्त कर लेते हैं और इसका सबब ज़मीनों की आबादकारी ही होता है। ज़मीनों की बरबादी अहले ज़मीन की तंगदस्ती से पैदा होती है और तंगदस्ती का सबब हुक्काम के नफ़्स का जमाआवरी की तरफ़ रूझान होता है  और उनकी यह बदज़नी होती है के हुकूमत बाक़ी रहने वाली नहीं है और वह दूसरे लोगों के हालात से इबरत हासिल नहीं करते हैं।
कातिबः
 इसके बाद अपने मुन्शियों  केहालात पर नज़र रखना और अपने उमूर को बेहतरीन अफ़राद के हवाले करना और फिर वह ख़ुतूत जिनमें रमूज़े सलतनत और इसरारे ममलेकत हों उन अफ़राद के हवाले करना जो बेहतरीन एख़लाक़ व किरदार के मालिक हों और इज़्ज़त पाकर अकड़ न जाते हों के एक दिन लोगों के सामने तुम्हारी मुख़ालेफ़त की जराअत पैदा कर लें और ग़फ़लत की बिना पर लेन-देन के मामलात में तुम्हारे अमाल के ख़ुतूत के पेश करने
(((‘-यह इस्लामी निज़ाम का नुक्तए इम्तेयाज़ है के इसने ज़मीनों पर टैक्स ज़रूर रखा है के पैदावार में अगर एक हिस्सा मालिके ज़मीन की मेहनत और आबादकारी का है तो एक हिस्सा मालिके कायनातत के करम का भी है जिसने ज़मीन में पैदावार की सलाहियत दी है और वह पूरी कायनात का मालिक है वह अपने हिस्से को पूरे समाज पर तक़सीम करना चाहता है और उसे निज़ाम की तकमील का बुनियादी अनासिर क़रार देना चाहता है, लेकिन इस टैक्स को हाकिम की सवाबदीदा और उसकी ख़्वाहिश पर नहीं रखा है जो दुनिया के तमाम ज़ालिम और अय्याश हुक्काम का तरीक़ाए कार है बल्कि उसे ज़मीन के हालात से वाबस्तता कर दिया है ताके टैक्स और पैदावार में राबेता रहे और मालिकाने ज़मीन के दिलों में हाकिम से हमदर्दी पैदा हो, पुरसूकून हालात में जी लगाकर काश्त करें और हादसाती मवाक़े पर ममलेकत के काम आ सकें वरना अगर अवाम में बददिली और बदज़नी पैदा हो गई तो निज़ाम और समाज को बरबादी से बचाने वाला कोई न होगा।-)))
और उनके जवाबात देने में कोताही से काम लेने लगें और तुम्हारे लिये जो अहद व पैमान बान्धें उसे कमज़ोर कर दें और तुम्हारे खि़लाफ़ साज़बाज़ के तोड़ने में आजिज़ी का मुज़ाहिरा करने लगे देखो यह लोग मामलात में अपने सही मक़ाम से नावाक़िफ़ न हांे के अपनी क़द्र व मन्ज़िलत का न पहचानने वाला दूसरे के मुक़ाम व मरतबे से यक़ीनन ज़्यादा नावाक़िफ़ होगा।
इसके बाद उनका तक़र्रूर भी सिर्फ़ ज़ाती होशियारी, ख़ुश एतमादी और हुस्ने ज़न की बिना पर न करना के अकसर लोग हुक्काम के सामने बनावटी किरदार और बेहतरीन खि़दमात के ज़रिये अपने को बेहतरीन बनाकर पेश करने की सलाहियत रखते हैं। जबके इसके पसे पुश्त न कोई इख़लास होता है और न अमानतदारी पहले इनका इम्तेहान लेना के तुमसे पहले वाले नेक किरदार हुक्काम के साथ इनका बरताव क्या रहा है फिर जो अवाम में अच्छे असरात रखते हों और अमानतदारी की बुनियाद पर पहचाने जाते हों उन्हीं का तक़र्रूर कर देना के यह इस अम्र की दलील होगा के तुम अपने परवरदिगार के बन्दए मुख़लिस और अपने इमाम के वफ़ादार हो अपने जुमला ‘ाोबों के लिये एक-एक अफ़सर मुक़र्रर कर देना जो बड़े से बड़े काम से मक़हूर न होता हो और कामों की ज़्यादती पर परागन्दा हवास न हो जाता हो, और यह याद रखना के इन मुन्शियों में जो भी ऐब होगा और तुम उससे चश्मपोशी करोगे इसका मवाख़ेज़ा तुम्हीं से  किया जाएगा।
इसके बाद ताजिरों और सनअतकारों के बारे में नसीहत हासिल करो और दूसरों को उनके साथ नेक बरताव की नसीहत करो चाहे वह एक मुक़ाम पर काम करने वाले हों या जाबजा गर्दिश करने वाले हों और जिस्मानी मेहनत से रोज़ी कमाने वाले हों। इसलिये के यही अफ़राद मुनाफ़े का मरकबज़ और ज़रूरियाते ज़िन्दगी के मुहैया करने का वसीला होते हैं। यही दूर दराज़ मुक़ामात बर्रो बहर कोह व मैदान हर जगह से इन ज़ुरूरियात के फ़राहम करने वाले होते हैं जहां लोगों की रसाई नहीं होती है और जहांतक जाने की लोग हिम्मत नहीं करते हैं, यह वह अमन पसन्द लोग हैं जिनसे फ़साद का ख़तरा नहीं होता है और वह सुलह व आश्ती वाले होते हैं जिनसे किसी ‘ाोरिश का अन्देशा नहीं होता है।
अपने सामने और दूसरे ‘ाहरों में फैले हुए इनके मुआमलात की निगरानी करते रहना और यह ख़याल रखना के मैं बहुत से लोगों में इन्तेहाई तंग नज़री और बदतरीन क़िस्म की कन्जूसी पाई जाती है, यह मुनाफ़े की ज़खी़राअन्दोज़ी करते हैं और ऊंचे ऊंचे दाम ख़ुद ही मुअय्यन कर देते हैं जिससे अवाम को नुक़सान होता है और हुक्काम की बदनामी होती है, लोगों को ज़ख़ीराअन्दोज़ी से ममना करो के रसूले अकरम (स0) ने इससे मना फ़रमाया है। ख़रीद व फ़रोख़्त में सहूलत ज़रूरी है जहां आदिलाना मीज़ान हो और वह क़ीमत मुअय्यन हो जिससे ख़रीदार या बेचने वाले किसी फ़रीक़ पर ज़ुल्म न हो, इसके बाद तुम्हारे मना करने के बावजूद अगर कोई ‘ाख़्स ज़ख़ीराअन्दोज़ी करे तो उसे सज़ा दो लेकिन इसमें भी हद से तजावुज़ न होने पाए।
(((-बाज़ ‘ाारेहीन की नज़र में इस हिस्से का ताल्लुक़ सिर्फ़ किताबत और अनशाए से नहीं है बल्कि हर ‘ाोबाए हयात से है जिसकी निगरानी के लिये एक ज़िम्मेदार का होना ज़रूरी है और जिसका इदराक अहले सियासत को सैकड़ों साल के बाद हुआ है और हकीमे उम्मत ने चैदह सदी क़ब्ल इसस नुक्ताए जहाानबानी की तरफ़ इशारा कर दिया था।
इसमें कोई ‘ाक नहीं है के तिजारत और सनअत का मुआसेरे की ज़िन्दगी में रीढ़ की हड्डी का काम करते हैं और उन्हीं के ज़रिये मुआशरे की ज़िन्दगी में इस्तेक़रार पैदा होता है, यही वजह है के मौलाए कायनात ने इनके बारे में ख़ुसूसी नसीहत फ़रमाई है और उनके मुफ़सेदीन  की इस्लाह पर ख़ुसूसी ज़ोर दिया है। ताजिर में बाज़ इम्तेयाज़ी ख़ुसूसियात होते हैं जो दूसरी क़ौमों में नहीं पाए जाते हैं- 1. यह लोग फ़ितरन सुलह पसन्द होते हैं के फ़साद और हंगामे में दुकान के बन्द हो जाने का ख़तरा होताा है 2. इनकी निगाह किसी मालिक और अरबाब पर नहीं होती है बल्कि परवरदिगार से रिज़्क़ के तलबगार होते हैं 3. दूर दराज़ के ख़तरनाक मेवारिद तक सफ़र करने की बिना पर इनसे तबलीग़े मज़हब का काम भी लिया जा सकता है जिसके ‘ावाहिद आज सारी दुनिया में पाए जा रहे हैं।-)))
इसके बाद अल्लाह से डरो उस पसमान्दा तबक़े के बारे में जो मसाकीन, मोहताज, फ़ोक़रा और माज़ूर अफ़राद का तबक़ा है जिनका कोई सहारा नहीं है इस तबक़े में मांगने वाले भी हैं और ग़ैरतदार भी हैं जिनकी सूरत सवाल है उनके जिस हक़ का अल्लाह ने तुम्हें मुहाफ़िज़ बनाया है उसकी हिफ़ाज़त करो और उनके लिये बैतुलमाल और अर्जे ग़नीमत के ग़ल्लात में से एक हिस्सा मख़सूस कर दो के उनके दूर इक़्तादा का भी वही हक़ है जो क़रीब वालों को है और तुम्हें सबका निगरां बनाया गया है लेहाज़ा ख़बरदार कहीं ग़ुरूर व तकब्बुर तुम्हें इनकी तरफ़ से ग़ाफ़िल न बना दे के तुम्हें  बड़े कामों के मुस्तहकम कर देने से छोटे कामों की बरबादी से माफ़ न किया जाएगा लेहाज़ा न अपनी तवज्जो को इनकी तरफ़ से हटाना और न ग़ुरूर की बिना पर अपना मुंह मोड़ लेना जिन लोगों  की रसाई तुम ततक नहीं है और उन्हें निगाहों न गिरा दिया है और ‘ाख़्सियतों ने हक़ीर बना दिया है उनके हालात की देखभाल भी तुम्हारा ही फ़रीज़ा है लेहाज़ा इनके लिये मुतवाज़ेह और ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वाले मोतबर अफ़राद को मख़सूस कर दो जो तुम तक उनके मामलात को पहुंचाते रहें और तुम ऐसे आमाल अन्जाम देते रहो जिनकी बिना पर रोज़े क़यामत पेशे परवरदिगार माज़ेर कहे जा सको के यही लोग सबसे ज़्यादा इन्साफ़ के मोहताज हैं और फिर हर एक के हुक़ूक़ को अदा करने में पेशे परवरदिगार अपने को माज़ूर साबित करो।
और यतीमों और कबीरा सिन बूढ़ों के हालात की भी निगरानी करते रहना के इनका कोई वसीला नहीं है और यह सवाल करने के लिये खड़े भी नहीं होते हैं ज़ाहिर है के इनका ख़याल रखना हुक्काम के लिये बड़ा संगीन मसला होता है लेकिन क्या किया जाए हक़ तो सबका सब सक़ील ही है, अलबत्ता कभी कभी परवरदिगार इसे हल्का क़रार दे देता है इन अक़वाम के लिये जो आाक़ेबत की तलबगार होती हैं और इस राह में अपने नफ़्स को सब्र का ख़ूगर बनाती हैं और ख़ुदा के वादे पर एतमाद का मुज़ाहिरा करती हैं।
और देखो साहेबाने ज़रूरत के लिये एक वक़्त मुअय्यन कर दो जिसमें अपने को उनके लिये ख़ाली कर लो और एक उमूमी मजलिस में बैठो उस ख़ुदा के सामने मुतवाज़ेह रहो जिसने पैदा किया है और अपने तमाम निगेहबान पोलिस, फ़ौज ऐवान व अन्सार सबको दूर बैठा दो ताके बोलने वाला आज़ादी से बोल सके और किसी तरह की लुकनत का शिकार न हो के मैंने रसूले अकरम (स0) से ख़ुद सुना है के आपने बार-बार फ़रमाया है के वह उम्मत पाकीज़ा किरदार नहीं हो सकती है जिसमें कमज़ोर को आज़ादी के साथ ताक़तवर से अपना हक़ लेने का मौक़ा न दिया जाए।’’
इसके बाद उनसे बदकलामी या आजिज़ी कलाम का मुज़ाहिरा हो तो उसे बरदाश्त करो और दिले तंगी और ग़ुरूर को दूर रखो ताके ख़ुदा तुम्हारे लिये रहमत के एतराफ़ कुशादा कर दे और इताअत के सवाब को लाज़िम क़रार दे दे, जिसे जो कुछ दो ख़ुशगवारी के साथ दो और जिसे मना करो उसे ख़ूबसूरती के साथ टाल दो।
(((-मक़सद यह नहीं है के हाकिम जलसए आम में लावारिस होकर बैठ जाए और कोई भी मुफ़सिद, ज़ालिम फ़क़ीर के भेस में आकर उसका ख़ात्मा कर दे, मक़सद सिर्फ़ यह है के पोलिस, फ़ौज मुहाफ़िज़ दरबान लोगों के ज़रूरियात की राह में हाएल न होने पाएं के न उन्हें तुम्हारे पास आने दें और न खुलकर बात करने का मौक़ा दें, चाहे इससे पहले पचास मक़ामात पर तलाशी ली जाए के  ग़ोरबा की हााजत रवाई के नाम पर हुक्काम की ज़िन्दगीयों को क़ुरबान नहीं किया जा सकता है और न मुफ़सेदीन को बेलगाम छोड़ा जाा सकता है हाकिम के लिये बुनियादी मसले इसकी ‘ाराफ़त, दयानत, अमानतदारी का  है इसके बाद इसका मरतबा आम मशविरे से बहरहाल बलन्दतर है और इसकी ज़िन्दगी अवामुन्नास से यक़ीनन ज़्यादा क़ीमती है और इसका तहफ़्फ़ुज़ अवामुन्नास पर उसी तरह वाजिब है जिस तरह वह ख़ुद इनके मफ़ादात का तहफ़्फ़ुज़ कर रहा है।-)))
इसके बाद तुम्हारे मामलात में बाज़ ऐसे मामलात भी हैं जिन्हें ख़ुद बराहे रास्त अन्जाम देना है जैसे हुक्काम के उन मसाएल के जवाबात जिनके जवाबात मोहर्रिर अफ़राद न दे सकें या लोगों के उन ज़रूििरयात को पूरा करना जिनके पूरा करने से तुम्हारे मददगार अफ़राद जी चुराते हों और देखो हर काम को उसी के दिन मुकम्मल कर देना के हर दिन का अपना एक काम होता है इसके बाद अपने और परवरदिगार के रवाबित के लिये बेहतरीन वक़्त का इन्तेख़ाब करना जो तमाम औक़ात से अफ़ज़ल और बेहतर हो अगरचे तमाम ही औक़ात अल्लाह के लिये ‘ाुमार हो सकते हैं अगर इन्सान की नीयत सालिम रहे और रिआया इसके तुफ़ैल ख़ुशहाल  हो जाए।
और तुम्हारे वह आमाल जिन्हें सिर्फ़ अल्लाह के लिये अन्जाम देते हो उनमें से सबसे अहम काम इन फ़राएज़ का क़याम हो जो सिर्फ़ परवरदिगार के लिये होते हैं अपनी जिस्मानी ताक़त में से रात और दिन दोनों वक़्त एक हिस्सा अल्लाह के लिये क़रार देना और जिस काम के ज़रिये इसकी क़ुरबत चाहते हो उसे मुकम्मल तौर से अन्जाम देना न कोई रख़ना पड़ने पाए और न कोई नुक़्स पैदा हो चाहे बदन काो किसी क़द्र ज़हमत क्यों न हो जाए, और जब लोगों के साथ जमाअत की नमाज़ अदा करो तो न इस तरह पढ़ो के लोग बेज़ार हो जाएं और न इस तरह के नमाज़ बरबाद हो जाए इसलिये के लोगों में बीमार और ज़रूरतमन्द अफ़राद भी होते हैं और मैंने यमन की मुहिम पर जाते हुए हुज़ूरे अकरम (स0) से दरयाफ़्त किया था के नमाज़े जमाअत का अन्दाज़ क्या होना चाहिये तो आपने फ़रमायाा था के अपनी रिआया से देर तक अलग न रहना के हुक्काम का रिआया से पसे पर्दा रहना एक तरह की तंग दिली पैदा करता है और उनके मामलात की इत्तेलाअ नहीं हाो पाती है और यह पर्दादारी उन्हंे भी उन चीज़ों के जानने से रोक देती है जिनके सामने यह हेजाजात क़ायम हो गए हैं और इस तरह बड़ी चीज़ छोटी हो जाती  है और छोटी चीज़ बड़ी हो जाती है। अच्छा बुरा बन जाता है और बुरा अच्छा बन जाता है और हक़ बातिल से मख़लूत हो जाता है और हाकिम भी बाला आखि़र एक बशर है वह पसे पर्दा उमूर की इत्तेलाअ नहीं रखता है और न हक़ की पेशानी पर ऐसे निशानात होते हैं जिनके ज़रिये सिदाक़त के इक़साम को ग़लत बयानी से अलग करके पहचाना जा सके।
और फिर तुम दो में से एक क़िस्म के ज़रूर होगे, या वह ‘ाख़्स होगे जिसका नफ़स हक़ की राह में बज़ल व अता पर माएल है तो फिर तुम्हें वाजिब हक़ अता करने की राह में परवरदिगार हाएल करने की क्या ज़रूरत है और करीमों जैसा अमल क्यों नहीं अन्जाम देते हो, या तुम बुख़ल की बीमारी में मुब्तिला हो गे तो बहुत जल्दी लोग तुमसे मायूस होकर ख़ुद ही अपने हाथ खींच लेंगे और तुम्हें परदा डालने की ज़रूरत ही न पड़ेगी। हालांके लोगों के अकसर ज़रूरियात वह हैं जिनमें तुम्हें किसी तरह की ज़हमत नहीं है जैसे किसी ज़ुल्म की फ़रयाद या किसी मामले में इन्साफ़ का मुतालेबा।
(((-यह ‘ाायद उस अम्र की तरफ़ इशारा है के समाज और अवाम से अलग रहना वाली और हाकिम के ज़रूरियाते ज़िन्दगी में ‘ाामिल है वरना इसकी ज़िन्दगी 24 घन्टे अवामुन्नास की नज़र हो गई तो न तन्हाइयों में अपने मालिक से मुनाजात कर सकता है और न ख़लवतों में अपने अहल व अयाल के हुक़ूक़ अदा कर सकता है। परदादारी एक इन्सानी ज़रूरत है जिससे कोई बेनियाज़ नहीं हो सकता है। असल मसला यह है के इस परदादारी को तूल न होने पाए के अवामुन्नास हाकिम की ज़ियारत से महरूम हो जाएं आौर इसका दीदार सिर्फ़ टेलीवीशन के  पर्दे पर नसीब हो जिससे न को ई फ़रयाद की जा सकती है और न किसी दर्दे दिल का इज़हार किया जा सकता है, ऐसे ‘ाख़्स को हाकिम बनने का क्या हक़ है जो अवाम के दुख दर्द में ‘ारीक न हो सके और इनकी ज़िन्दगी की तलखियों को महसूस न कर सके, ऐसे ‘ाख़्स को दरबारे हुकूमत में बैठ कर ‘‘अना रब्बोकुमुल आला’’ का नारा लगाना चाहिये और आखि़र में किसी दरया में डूब मरना चाहिये  इस्लामी हुकूमत इस तरह की लापरवाही को बरदाश्त नहीं कर सकती है। इसके लिये कूफ़े में बैठकर  हज्जाज और यमामा के फ़ोक़रा को देखना पड़ता है और इनकी हालत के पेशे नज़र सूखी रोटी खाना पड़ती है-)))
इसके बाद भी ख़याल रहे के हर वाली के कुछ मख़सूस और राज़दार क़िस्म के अफ़राद होते हैं जिनमें ख़ुदग़र्ज़ी दस्ते दराज़ी और मुआमलात में बेइन्साफ़ी पाई जाती है लेहाज़ा ख़बरदार ऐसे अफ़राद के फ़साद काा इलाज इन असबाब के ख़ातमे से करना जिनसे यह हालात पैदा होते हैं। अपने किसी भी हाशियानशीन और क़राबतदार को कोई जागीर मत बख़्श देना और उसे तुमसे कोई ऐसी तवक़्क़ो न होनी चाहिये के तुम किसी ऐसी ज़मीन पर क़ब्ज़ा दे दोगे, जिसके सबब आबपाशी या किसी मुशतर्क मामले में शिरकत रखने वाले अफ़राद को नुक़सान पहुंच जाए के अपनेे मसारिफ़ भी दूसरे के सर डाल दे और इस तरह इस मामले का मज़ा इसके हिस्से में आए और उसकी ज़िम्मेदारी दुनिया और आखि़रत में तुम्हारे ज़िम्मे रहे। और जिस पर कोई हक़ आएद हो उस  पर इसके नाफ़िज़ करने की ज़िम्मेदारी डालो चाहे वह तुमसे नज़दीक हो या दूर और इस मसले में अल्लाह की राह में सब्र व तहम्मुल से काम लेना चाहिये इसकी ज़द तुम्हारे क़राबतदारों और ख़ास अफ़राद ही पर क्यों न पड़ती हो और इस सिलसिले में तुम्हारे मिज़ाज पर जो बार हो उसे आखि़रत की उम्मीद में बरदाश्त कर लेना के इसका अन्जाम बेहतर होगा।
और अगर कभी रिआया को यह ख़याल हो जाए के तुमने उन पर ज़ुल्म किया है तो उनके लिये अपने उज़्र का इज़हार करो और उसी ज़रिये से उनकी बदगुमानी का इलाज करो के इसमें तुम्हारे नफ़्स की तरबीयत भी है और रिआया पर नर्मी का इज़हार भी है और वह उज्ऱख़्वाही भी है जिसके ज़रिये तुम रिआया को राहे हक़ पर चलाने का मक़सद भी हासिल कर सकते हो।
और ख़बरदार किसी ऐसी दावते सुलह का इन्कार न करना जिसकी तहरीक दुश्मन की तरफ़ से हो और जिसमें मालिक की रज़ामन्दी पाई जाती हो के सुलह के ज़रिये फ़ौजों को क़द्रे सुकून मिल जाता है और तुम्हारे नफ़्स को को भी उफ़्कार से निजात मिल जाएगी और ‘ाहरों में भी अम्न व अमान की फ़िज़ा क़ायम हो जाएगी, अलबत्ता सुलह के बाद दुश्मन की तरफ़ से मुकम्मल तौर पर होशियार रहना के कभी कभी वह तुम्हें ग़ाफ़िल बनाने के लिये तुमसे क़ुरबत इख़्तेयार करना चाहता है लेहाज़ा इस सिलसिले में मुकम्मल होशियारी से काम लेना और किसी हुस्ने ज़न से काम न लेना और अगर अपने और उसके दरम्यान कोई मुआहेदा करना या उसे किसी तरह की पनाह देना तो अपने अहद की पासदारी व वफ़ादारी के ज़रिये करना और अपने ज़िम्मे को अमानतदारी के ज़रिये महफ़ूज़ बनाना और अपने क़ौल व क़रार की राह में अपने नफ़्स को सिपर बना देना के अल्लाह के फ़राएज़ में ईफ़ाए अहद जैसा कोई फ़रीज़ा नहीं है जिस पर तमाम लोग ख़्वाहिशात के इख़्तेलाफ़ और उफ़कार के तज़ाद के बावजूद मुत्तहिद हैं और इसका मुशरेकीन ने भी अपने मुआमलात में लेहाज़ रखा है के अहद शिकनी के नतीजे में तबाहियों का अन्दाज़ा कर लिया है तो ख़बरदार तुम अपने अहद व पैमान से ग़द्दारी न करना और अपने क़ौल व क़रार में ख़यानत से काम न लेना और अपने दुश्मन पर अचानक हमला न कर देना।
(((-इसमें कोई ‘ाक नहीं है के सुलह एक बेहतरीन तरीक़ाए कार है और क़ुरान मजीद ने इसे ख़ैर से ताबीर किया है लेकिन इसके मानी यहय नहीं हैं के जो ‘ाख़्स जिन हालात में जिस तरह की सुलह की दावत दे तुम क़ुबूल कर लो और उसके बाद मुतमईन होकर बैठ जाओ के ऐसे निज़ाम में हर ज़ालिम अपनी ज़ालिमाना हरकतों ही पर सुलह करना चाहेगा और तुम्हें उसे तस्लीम करना होगा, सुलह की बुनियादी ‘ार्त यह है के उसे रिज़ाए  इलाही के मुताबिक़ होना चाहिये और उसकी किसी दिफ़ा को भी मरज़ीए परवरदिगार के खि़लाफ़ नहीं होना चाहिये जिस तरह के सरकारे दो आलम (स0) की सुलह में देखा गया है के आपने जिस जिस लफ़्ज़ और जिस जिस दिफ़ाअ पर सुलह की है सब की  सब मुताबिक़े हक़ीक़त और ऐन मर्ज़ीए परवरदिगार थीं और कोई हर्फ़ ग़लत दरमियान में नहीं था ‘‘बिस्मेका अल्लाहुम’’ भी एक कलमाए सही था, मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह भी एक हर्फ़े हक़ था और दुश्मन के अफ़राद का वापस कर देना भी कोई ग़लत एक़दाम नहीं था, इमामे हसन (अ0) मुज्तबा की सुलह में भी यही तमाम ख़ुसूसियात पाई जाती हैं जिनका मुशाहिदा सरकारे दो आलम (स0) की सुलह में किया जा चुका है। और यही मौलाए कायनात (अ0) की बुनियादी तालीम और इस्लाम का वाक़ई हदफ़ और मक़सद है-)))
इसलिये के अल्लाह के मुक़ाबले में जाहिल व बदबख़्त के अलावा कोई जराअत नहीं कर सकता है और अल्लाह ने अहद व पैमान को अम्न व अमान का वसीला क़रार दिया है जिसे अपनी रहमत से तमाम बन्दों के दरम्यान आम कर दिया है और ऐसी पनाहगाह बना दिया है जिसके दामने हिफ़ाज़त में पनाह लेने वाले पनाह लेते हैं और इसके जवार में मन्ज़िल करने के लिये तेज़ी से क़दम आगे बढ़ाते हैं लेहाज़ा इसमें कोई जालसाज़ी, फ़रेबकारी और मक्कारी न होनी चाहिये और कोई ऐसा मुआहेदा न करना जिसमें तावील की ज़रूरत पड़े और मुआहेदा के पुख़्ता हो जाने के बाद उसके किसी मुबहम लफ़्ज़ से फ़ायदा उठाने की कोशिश न करना और अहदे इलाही में तंगी का एहसास ग़ैर हक़ के साथ वुसअत की जुस्तजू पर आमादा न कर दे के किसी अम्र की तंगी पर सब्र कर लेना और कशाइश हाल और बेहतरीन आक़ेबत का इन्तेज़ार करना इस ग़द्दारी से बेहतर है जिसके असरात ख़तरनाक हों और तुम्हें अल्लाह की तरफ़ से जवाबदेही की मुसीबत घेर ले और दुनिया व आखि़रत दोनों तबाह हो जाएं।
देखो ख़बरदार! नाहक़ ख़ून बहाने से परहेज़ करना के इससे ज़्यादा अज़ाबे इलाही से क़रीबतर और पादाश के एतबार से ‘ादीदतर और नेमतों के ज़वाल, ज़िन्दगी के ख़ात्मे के लिये मुनासिबतर कोई सबब नहीं है और परवरदिगार रोज़े क़यामत अपने फ़ैसले का आग़ाज़ ख़ूंरेज़ियों के मामले से करेगा, लेहाज़ा ख़बरदार अपनी हुकूमत का इस्तेहकाम नाहक़ ख़ूंरेज़ी के ज़रिये न पैदा करना के यह बात हुकूमत को कमज़ोर और बेजान बना देती है बल्के तबाह करके दूसरों की तरफ़ मुन्तक़िल कर देती है और तुम्हारे पास न ख़ुदा के सामने और न मेरे सामने अमदन क़त्ल करने का कोई उज़्र नहीं है और इसमें ज़िन्दगी का क़सास भी साबित है अलबत्ता अगर धोके से इस ग़लती में मुब्तिला हाो जाओ और तुम्हारा ताज़ियाना तलवार या हाथ सज़ा देने में अपनी हद से आगे बढ़ जाए के कभी कभी घूंसा वग़ैरा भी क़त्ल का सबब बन जाता है, तो ख़बरदार तुम्हें सलतनत का ग़ुरूर इतना ऊंचा न बना दे के तुम ख़ून के वारिसों को उनका हक़्क़े ख़ूं बहा भी अदा न करो।
और देखो अपने नफ़्स को ख़ुद पसन्दी से भी महफ़ूज़ रखना और अपनी पसन्द पर भरोसा भी न करना और ज़्यादा तारीफ़ का ‘ाौक़ भी न पैदा हो जाए के यह सब बातें ‘ौतान की फ़ुरसत के बेहतरीन वसाएल हैं जिनके ज़रिये वह नेक किरदारों के अमल को ज़ाया और बरबाद कर दिया करता है।
और ख़बरदार रिआया पर एहसान भी न जताना और जो सलूक किया है उसे ज़्यादा समझने की कोशिश भी न करना या उनसे कोई वादा करके उसके बाद वादा खि़लाफ़ी भी न करना के यह तर्ज़े अमल एहसान को बरबाद कर देता है और ज़्यादती अमल का ग़ुरूर हक़ की नूरानियत को फ़ना कर देता है और वादा खि़लाफ़ी ख़ुदा और बन्दगाने ख़ुदा दोनों के नज़दीक नाराज़गी का बाएस होती है जैसा के उसने इरशाद फ़रमाया है के ‘‘अल्लाह के नज़दीक यह बड़ी नराज़गी की बात है के  तुम कोई बात कहो और फिर उसके मुताबिक़ अमल न करो।’’
(((-वाज़ेह रहे के दुनिया में हुकूमतों का क़याम तो विरासत, जमहूरियत, असकरी इन्क़ेलाब और ज़ेहानत व फ़रासत तमाम असबाब से हो सकता है लेकिन हुकूमतों में इस्तेहकाम अवाम की ख़ुशी और मुल्क की ख़ुशहाली के बग़ैर मुमकिन नहीं है और जिन अफ़राद ने यह ख़याल किया के वह अपनी हुकूमतों को ख़ूँरेज़ी के ज़रिये मुस्तहकम बना सकते हैं उन्होंने जीतेजी अपनी ग़लत फ़हमी का अन्जााम देख लिया और हिटलर जैसे ‘ाख़्स को भी ख़ुदकुशी पर आमादा न होना पड़ा, इसीलिये कहा गया है के मुल्क कुफ्ऱ के साथ तो बाक़ी रह सकता है लेकिन ज़ुल्म के साथ बाक़ी नहीं रह सकता है और इन्सानियत का ख़ून बहाने से बड़ा कोई जुर्म क़ाबिले तसव्वुर नहीं है लेहाज़ा इससे परहेज़ हर साहबे इक़्तेदार और साहबे अक़्ल व होश का फ़रीज़ा है और ज़माने की गर्दिश के पलटते देर नहीं लगती है-)))
और ख़बरदार वक़्त से पहले कामों जल्दी न करना और वक़्त आजाने के बाद सुस्ती का मुज़ाहेरा न करना अैर बात समझ में न आए तो झगड़ा न करना और वाज़ेह हो जाए तो कमज़ोरी का इज़हार न करना हर बात को इसकी जगह रखो और हर अम्र  को उसके महल पर क़रार दो।
देखो  जिस चीज़ में तमाम लोग बराबर के ‘ारीक हैं उसे अपने साथ मख़सूस न कर लेना और जो हक़ निगाहों के सामने वाज़ेह हो जाए उसके ग़फ़लत न बरतना के दूसरों के लिये यही तुम्हारी ज़िम्मादारी है और अनक़रीब तमाम उमूर से परदे उठ जाएंगे और तुमसे मज़लूम का बदला ले लिया जाएगा अपने ग़ज़ब की तेज़ी अपनी सरकशी के जोश अपने हाथ की जुम्बिश और अपनी ज़बान की काट पर क़ाबू रखना और उन तमाम चीज़ों से  अपने को इस तरह महफ़ूज़ रखना के जल्दबाज़ी से काम न लेना और सज़ा देने में जल्दी न करना यहांतक के ग़ुस्सा ठहर जाए और अपने ऊपर क़ाबू हासिल हो जाए, और इस अम्र पर भी इख़्तेयार उस वक़्त तक हासिल नहीं हो सकता है जब तक परवरदिगार की बारगाह में वापसी का ख़याल ज़्यादा से ज़्यादा न हो जाए।
तुम्हारा फ़रीज़ा यह है के माज़ी में गुज़र जाने वाली आदिलाना हुकूमत और फ़ाज़िलाना सीरत को याद रखो रसूले अकरम (अ0) के आसार और किताबे ख़ुदा के एहकाम को निगाह में रखो और जिस तरह हमें अमल करते देखा है उसी तरह हमारे नक़्शे क़दम पर चलो और जो कुछ इस इस अहदनामे में हमने बताया है उस पर अमल करने की कोशिश करो के मैंने तुम्हारे ऊपर अपनी हुज्जत को मुस्तहकम कर दिया है ताके जब तुम्हारा नफ़्स ख़्वाहिशात की तरफ़ तेज़ी से बढ़े तो तुम्हारे पास कोई उज़्र न रहे, और मैं परवरदिगार की वसीअ रहमत और हर मक़सद के अता करने की अज़ीम क़ुदरत के वसीले से यह सवाल करता हूँ के मुझे और तुम्हें इन कामों की तौफ़ीक़ दे जिनमें इसकी मर्ज़ी हो और हम दोनों इसकी बारगाह में और बन्दों के सामने उज़्र पेश करने के क़ाबिल हो जाएं, बन्दों की बेहतरीन तारीफ़ के हक़दार हों और इलाक़ों में बेहतरीन आसार छोड़ कर जाएं, नेमत की फ़रावानी और इज़्ज़त के रोजाफ़ज़ों इज़ाफ़े को बरक़रार रख सकें और हम दोनों का ख़ात्मा सआदत और ‘ाहादत पर हो के हमस ब अल्लाह के लिये हैं और उसी की बारगाह में पलट कर जाने वाले हैं। सलाम हो रसूले ख़ुदा (स0) पर और उनकी तय्यब व ताहिर आल पर और सब पर सलाम बेहिसाब। वस्सलाम

Wednesday, May 18, 2011

Nahjul Balagha Hindi Khat 45-52 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 45-52 ख़त haider

45-आपका मकतूबे गिरामी(अपने बसरा के आमिल उस्मान बिन हुनैफ़ के नाम जब आपको इत्तेलाअ मिली के वह एक बड़ी दावत में ‘ारीक हुए हैं)

अम्माबाद! इब्ने हुनैफ़! मुझे यह ख़बर मिली है के बसरा के बाज़ जवानों ने तुमको एक दावत में मदओ किया था जिसमें तरह-तरह के ख़ुशगवार खाने थे और तुम्हारी तरफ़ बड़े-बड़े प्याले बढ़ाए जा रहे थे और तुम तेज़ी से वहां पहुंच गए थे। मुझे तो यह गुमान भी नहीं था के तुम ऐसी क़ौम की दावत में शिरकत करोगे जिसके ग़रीबों पर ज़ुल्म हो रहा हो और जिसके दौलतमन्द मदओ किये जाते हों, देखो जो लुक़मे चबाते हो उसे देख लिया करो और अगर उसकी हक़ीक़त मुश्तबा हो तो उसे फेंक दिया करो और जिसके बारे में यक़ीन हो के पाकीज़ा है उसी को इस्तेमाल किया करो।
याद रखो! के हर मामूम का एक इमाम होता है जिसकी वह इक़्तेदा करता है और उसी को नूरे इल्म से कस्बे ज़िया करता है और तुम्हारे इमाम ने तो इस दुनिया में सिर्फ़ दो बोसीदा कपड़ों और दो रोटियों पर गुज़ारा किया है। मुझे मालूम है के तुम लोग ऐसा नहीं कर सकते हो लेकिन कम से कम अपनी एहतियात, कोशिश, उफ़्फ़त और सलामत रवी से मेरी मदद करो, ख़ुदा की क़सम मैंने तुम्हारी दुनिया से न कोई सोना जमा किया है और न उस माल व मताअ में से कोई ज़ख़ीरा इकट्ठा किया है और न इन बोसीदा कपड़ों के बदले कोई और मामूली कपड़ा मुहय्या किया है।
(((-उस्मान बिन हुनैफ़ अनसार के क़बीलए औस की एक नुमायां ‘ाख़्िसयत थे और यही वजह है के जब खि़लाफ़ते दोम में ईराक़ के वाली की तलाश हुई तो सबने बिलाइत्तेफ़ाक़ उस्मान बिन हुनैफ़ का नाम लिया और उन्हें अर्ज़े इराक़ की पैमाइश और इसके ख़ेराज की तअय्युन का ज़िम्मेदार बना दिया गया। अमीरूलमोमेनीन (अ0) ने अपने दौरे हुकूमत में उन्हें बसरा का वाली बना दिया था और वह तल्हा व ज़ुबैर के वारिद होने तक बराबर मसरूफ़े अमल रहे और इसके बाद उन लोगों ने सारे हालात ख़राब कर दिये और बाला आखि़र हज़रत की ‘ाहादत के बाद कूफ़े मुन्तक़िल हो गए और वहीं इन्तेक़ाल फ़रमाया।
उस्मान के किरदार मेंे किसी तरह के ‘ाक व ‘ाुब्हे की गुन्जाइश नहीं है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) का इस्लामी निज़ामे अमल यह था के हुक्काम को अवाम के हालात को निगाह में रख कर ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिये और किसी हाकिम की ज़िन्दगी को अवाम के हालात से बालातर नहीं होनी चाहिये जिस तरह के हज़रत ने ख़ुद अपनी ज़िन्दगी गुज़ारी है और मामूली लिबास व ग़िज़ा पर पूरा दौरे हुकूमत गुज़ार दिया है।-)))
और न एक बालिश्त पर क़ब्ज़ा किया है और न एक बीमार जानवर से ज़्यादा ग़िज़ा हासिल किया है। यह दुनिया मेरी निगाह में कड़वी छाल से भी ज़्यादा हक़ीर और बेक़ीमत है, हां हमारे हाथों में उस आसमान के नीचे सिर्फ़ एक फ़िदक था मगर उस पर भी एक क़ौम ने अपनी लालच का मुज़ाहिरा किया और दूसरी क़ौम ने उसके जाने की परवाह न की और बहरहाल बेहतरीन फ़ैसला करने वाला परवरदिगार है और वैसे भी मुझे फ़िदक या ग़ैरे फ़िदक से क्या लेना देना है जबके नफ़्स की मन्ज़िल असली कल के दिन क़ब्र है जहां की तारीकी में तमाम आसार मुन्क़ता हो जाएंगे और कोई ख़बर न आअएगी, यह एक ऐसा गढ़ा है जिसकी वुसअत ज़्यादा भी कर दी जाए और खोदने वाला उसे वसीअ भी बना दे तो बाला आखि़र पत्थर और ढेले उसे तंग बना देंगे और तह ब तह मिट्टी उसके शिगाफ़ को बन्द कर देगी। मैं तो अपने नफ़्स को तक़वा की तरबियत दे रहा हूँ ताके अज़ीम तरीन ख़ौफ़ के दिन मुतमइन होकर मैदान में आए और फिसलने के मुक़ामात पर साबित क़दम रहे।
मैं अगर चाहता तो इस ख़ालिस ‘ाहद, बेहतरीन साफ़ ‘ाुदा गन्दुम और रेशमी कपड़ों के रास्ते भी पैदा कर सकता था लेकिन ख़ुदा न करे के मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए और मुझे हिर्स व तमअ अच्छे खानों के इख़्तेयार करने की तरफ़ खींच कर ले जाएं जबके मुमकिन है के हेजाज़ या यमामा में ऐसे अफ़राद भी हों जिनके लिये एक रोटी का सहारा न हुआ और शिकम सेरी का कोई सामान न हो। भला यह कैसे हो सकता है के मैं शिकम सेर होकर सो जाऊं और मेरी इतराफ़ भूके पेट और प्यासे जिगर तड़प् रहे हों। क्या मैं ‘ााएर के ‘ोर का मिस्दाक़ हो सकता हूं -
‘‘तेरी बीमारी के लिये यही काफ़ी है के तू पेट भर कर सो जाए और तेरे इतराफ़
वह जिगर भी हों जो सूखे चमड़े को भी तरस रहे हों’’
के न मेरा नफ़्स इस बात से मुतमईन हो सकता है के मुझे ‘‘अमीरूल मोमेनीन’’ कहा जाए और मैं ज़माने के नाख़ुशगवार हालात में मोमेनीन का ‘ारीके हाल न बनूं और मामूली ग़िज़ा के इस्तेमाल में उनके वास्ते नमूना न पेश कर सकूं। मैं इसलिये तो नहीं पैदा किया गया हूं के मुझे बेहतरीन ग़िज़ाओं का खाना मशग़ूल कर ले और मैं जानवरों के मानिन्द हो जाऊं के वह बन्धे होते हैं तो उनका कुल मक़सद चारा होता है और आज़ाद होते हैं तो कुल मशग़ला इधर-उधर चरना होता है जहां घास फूस से अपना पेट भर लेते हैं और उन्हें इस बात की फ़िक्र भी नहीं होती है के उनका मक़सद क्या है, क्या मैं आज़ाद छोड़ दिया गया हूँ, या मुझे बेकार आज़ाद कर दिया गया है या मक़सद यह है के मैं गुमराही की रस्सी में आन्ध कर खींचा जाऊं।

(((-आज दुनिया के ज़ोहद व तक़वा का बेशतर हिस्सा मजबूरियों की पैदावार है और इन्सान को जब दुनिया हासिल नहीं होती  है तो वह दीन के ज़ेरे साया पनाह ले लेता है और ज़िक्रे आखि़रतत से अपने नफ़्स को बहलाता है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) का किरदार इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ है, आपके हाथों में दुनिया व आखि़रत का इख़्तेयार था, आपके बाज़ुओं में ज़ोरे ख़ैबर शिकमी और आपकी उंगलियों में क़ूवते रद्दे ‘ाम्स थी लेकिन इसके बावजूद फ़ाक़े कर रहे थे ताके इस्लाम में रियासत और हुकूमत ऐश परस्ती का ज़रिया न बन जाए और एहकाम अपनी सहूलियत का एहसास करें और अपनी ज़िन्दगी को ग़ुरबा के मेयार पर गुज़ारें ताके इनका दिल न टूटने पाए और इनके नफ़्स में ग़ुरूर न पैदा होने पाए, मगर अफ़सोस के दुनिया से यह तसव्वुर यकसर ग़ायब हो गया और रियासत व हुकूमत सिर्फ़ राहत व आराम और अय्याशी व ऐश परस्ती का वसीला बन कर रह गई।
इन हालात की जुज़ी इस्लाह ग़ुलामाने अली (अ0) के इस्लामी निज़ाम से हो सकती है और कुल इस्लाह फ़रज़न्दग अली (अ0) के ज़ुहूर से हो सकती है। इसके अलावा बनी उमय्या और बनी अब्बास पर नाज़ करने वाले सलातीन इन हालात की इस्लाह नहीं कर सकते हैं।
इन्सान और जानवर का नुक़्तए इम्म्तेयाज़ यही है के जानवर के यहाँ खाना और चारा मक़सदे हयात है और इन्सान के यहाँ यह अशया वसीलाए हयात हैं, लेहाज़ा इन्सान जब तक मक़सदे हयात और बन्दगीए परवरदिगार का तहफ़्फ़ुज़ करता रहेगा इन्सान रहेगा और जिस दिन इस नुक्ते से ग़ाफ़िल हो जाएगा उसका ‘ाुमार हैवानात में हो जाएगा।-)))
या भटकने की जगह पर मुंह उठाए फिरता रहूँ, गोया मैं देख रहा हूँ के तुम में से बाज़ लोग यह कह रहे हैं के जब अबूतालिब के फ़रज़न्द की ग़िज़ा ऐसी मामूली है तो उन्हें ज़ोफ़ ने दुश्मनों से जंग करने और बहादुरों के साथ मैदान में उतरने से बिठा दिया होगा। तो यह याद रखना के जंगल के दरख़्तों की लकड़ी ज़्यादा मज़बूत होती है और तरो ताज़ा दरख़्तों की छाल कमज़ोर होती है। सहराई झाड़ का ईन्धन ज़्यादा भड़कता भी है और इसके ‘ाोले देर में बुझते भी हैं। मेरा रिश्ता रसूले अकरम (स0) से वही है जो नूर का रिश्ता नूर से होता है या हाथ का रिश्ता बाज़ुओं से होता है।
ख़ुदा की क़सम अगर तमाम अरब मुझसे जंग करने पर इत्तेफ़ाक़ कर लें तो भी मैं मैदान से मुंह नहीं फेर सकता और अगर मुझे ज़रा भी मौक़ा मिल जाए तो मैं इनकी गर्दनें उड़ा दूंगा और इस बात की कोशिश करूंगा के ज़मीन को इस उलटी खोपड़ी और बेहंगम डील-डौल वाले से पाक कर दूँ ताके खलियान के दानों में से कंकर पत्थर निकल जाएं।
(इस ख़ुत्बे का आखि़री हिस्सा) ऐ दुनिया मुझसे दूर हो जा, मैंने तेरी बागडोर तेरे ही कान्धे पर डाल दी है और तेरे चंगुल से बाहर आ चुका हूँ और तेरे जाल से निकल चुका हूं और तेरे फिसलने के मुक़ामात की तरफ़ जाने से भी परहेज़ करता हूँ। कहाँ हैं वह लोग जिनको तूने अपनी हंसी मज़ाक़ की बातों से लुभा लिया था और कहां हैं वह क़ौमें जिनको अपनी ज़ीनत व आराइश से मुब्तिलाए फ़ितना कर दिया था, देखो अब वह सब क़ब्रों में रहन हो चुके हैं और लहद में दुबके पड़े हुए हैं। ख़ुदा की क़सम अगर तू कोई देखने वाली ‘ौ और महसूस होने वाला ढांचा होती तो मैं तेरे ऊपर ज़रूर हद जारी करता के तूने अल्लाह के बन्दों को आरज़ूओं के सहारे धोका दिया है और क़ौमों को गुमराही के गढ़े में डाल दिया है, बादशाहों को बरबादी के हवाले कर दिया है और उन्हें बलाओं की मन्ज़िल पर उतार दिया है जहां न कोई वारिद होने वाला है और न सादिर होने वाला।
अफ़सोस! जिसने भी तेरी लग़्िज़शगाहों पर क़दम रखा वह फिसल गया और जो तेरी मौजों पर सवार हुआ वह ग़र्क़ हो गया, बस जिसने तेरे फन्दों से किनाराकशी इख़्तेयार की उसको तौफ़ीक़ हासिल हो गई, तुझसे बचने वाला इस बात की परवाह नहीं करता है के मन्ज़िल किस क़द्र तंग हो गई है। इसलिये के दुनिया इसकी निगाह में सिर्फ़ एक दिन के बराबर है जिसके एख़्तेताम का वक़्त हो चुका है।
(((-बाज़ अफ़राद का ख़याल है के इन्सानी ज़िन्दगी में ताक़त का सरचश्मा इसकी ग़िज़ा होती है और इन्सान की ग़िज़ा जिस क़द्र लज़ीज़ और ख़ुश ज़ायक़ा होगी इन्सान उसी क़द्र हिम्मत और ताक़त वाला होगा हालांके यह बात बिल्कुल ग़लत और महमिल है। ताक़त का ताल्लुक़ लज़्ज़त व ज़ायक़े से नहीं है, क़ूवते नफ़्स और हिम्मते क़ल्ब से और इससे बालातर ताईदे परवरदिगार से के दस्ते क़ुदरत से सेराब होने वाला सहराई दरख़्त ज़्यादा मज़बूत होता है और इमकानात के अन्दर तरबियत पाने वाले अशजार इन्तेहाई कमज़ोर होते हैं के दस्ते बशर वह ताक़त नहीं पैदा कर सकता है जो दस्ते क़ुदरत से पैदा होती है। लफ़्ज़ों में यह बात बहुत आसान है लेकिन सजी सजाई दुनिया को तीन मरतबा तलाक़ देकर अपने से जुदा कर देना सिर्फ़ नफ़्से पैग़म्बर (स0) का कारनामा है और उम्मत के बस का काम नहीं है। यह काम वही अन्जाम दे सकता है जो नफ़्स के चंगुल से आज़ाद हो, ख़्वाहिशात के फन्दों में गिरफ़्तार न हो और हर तरह की ज़ीनत व आराइश को अपनी निगाहों से गिरा चुका हो।-)))
तू मुझसे दूर हो जा, मैं तेरे क़ब्ज़े में आने वाला नहीं हूँ के तू मुझे ज़लील कर सके और न अपनी ज़माम तेरे हाथ में देने वाला हूँ के जिधर चाहे खींच सके, मैं ख़ुदा की क़सम खाकर कहता हूँ, और इस क़सम में मशीयते ख़ुदा के अलावा किसी सूरत को मुस्तशना नहीं करता। मैं इस नफ़्स को ऐसी तरबीयत दूंगा के एक रोटी पर भी ख़ुश रहे अगर वह बतौरे तआम और नमक बतौरे अदाम मिल जाए और मैं अपनी आंखों के सोने को ऐसा बना दूंगा जैसे वह चश्मा जिसका पानी तक़रीबन ख़ुश्क होे चुका हो और सारे आंसू बह गए हों, क्या यह मुमकिन है जिस तरह जानवर चारा खाकर बैठ जाते हैं और बकरियां घास से सेर होकर अपने बाड़े में लेट जाती हैं उसी तरह अली (अ0) भी अपने पास का खाना खाकर सो जाए, उसकी आंखें फूट जाएं जो एक तवील ज़माना गुज़ारने के बाद आवारा जानवर और चराए हुए हैवानात की पैरवी करने लगे।

खुशा नसीब उस नफ़्स के लिये जो अपने रब के फ़र्ज़ को अदा कर दे और सख़्ितयों के आलम में सब्र से काम ले, रातों को अपनी आंखों को खुला रखे यहां तक के नीन्द का ग़लबा होने लगे तो ज़मीन को बिस्तर बना ले और हाथों को तकिया, इन लोगों के दरम्यान जिनकी आंखों को ख़ौफ़े महशर ने बेदार रखा है और जिन के पहलू बिस्तरों से अलग रहे हैं उनके होंटों पर ज़िक्रे ख़ुदा के ज़मज़मे रहे हैं और उनके तूले अस्तग़फ़ार से गुनाहों के बादल छट गए हैं यही वह लोग हैं जो अल्लाह के गिरोह में हैं और याद रखो के अल्लाह का गिरोह ही कामयाब होने वाला है।
इब्ने हनीफ़! अल्लाह से डरो, और तुम्हारी यह रोटियां तुम्हें हिर्स व तमअ से रोके रहें ताके आतिशे जहन्नमसे आज़ादी हासिल कर सको।
(((-कहां दुनिया में ऐसा कोई इन्सान है जो साहबे जाहो जलाल, इक़्तेदार व बैतुलमाल हो, दुनिया में उसका सिक्का चल रहा हो और आलमे इस्लाम के ज़ेरे नगीं हो और इसके बाद या तो रातों को बेदारी और इबादते इलाही में गुज़ार दे या सोने का इरादा करे तो ख़ाक का बिस्तर और हाथ का तकिया बना ले, सलातीने ज़माना और हुक्कामे मुस्लेमीन तो इस सूरते हाल का तसव्वुर भी नहीं कर सकते हैं। इस किरदार के पैदा करने का क्या सवाल पैदा होता है।
वाज़ेह रहे के यह मौलाए कायनात की ‘ाख़्सी ज़िन्दगी का नक़्शा नहीं है, यह हाकिमे इस्लामी और ख़लीफ़तुल्लाह का मन्सबी किरदार है जिसे अवामी मफ़ादात आौर इस्लामी मुक़द्देरात का ज़िम्मेदार बनाया जाता है। इसके किरदार को ऐसा होना चाहिये और इसकी ज़िन्दगी में इसी क़िस्म की सादगी दरकार है, इन्सान के नफ़्से क़ुद्सी के पैदा करने का अज़म मोहकम करे वरना न इस्लामी तख़्त व इक़तेदार को छोड़कर ज़ुल्म व सितम की बिसात पर ज़िन्दगी गुज़ार दे और अपने को आलमे इस्लाम का हाकिम कहने और इरादा न करे वमा तौफ़ीक़ी इल्ला बिल्लाह-)))

46-आपका मकतूबे गिरामी
(बाज़ अमाल के नाम)

अम्माबाद! तुम उन लोगों में हो जिनसे मैं दीन के क़याम के लिये मदद लेता हूँ और गुनहगारों की नख़वत को तोड़ देता हूँ और सरहदों के ख़तरात की हिफ़ाज़त करता हूँ लेहाज़ा अपने अहम उमूर में अल्लाह से मदद तलब करना और अपनी शिद्दत में थोड़ी नर्मी भी ‘ाामिल कर लेना, जहां तक नर्मी मुनासिब हो नर्मी ही से काम लेना और जहां सख़्ती के अलावा कोई चाराए कार न हो वहां सख़्ती ही करना, रिआया के साथ तवाज़ो से पेश आना और कुशादारवी का बरताव करना, अपना रवैया नर्म रखना और नज़र भर के देखने या कनखियों से देखने में भी बराबर का सुलूक करना और इशारा व सलाम में भी मसावात से काम लेना ताके बड़े लोग तुम्हारी नाइन्साफ़ी से उम्मीद न लगा बैठंें और कमज़ोर अफ़राद तुम्हारे इन्साफ़ से मायूस न हो जाएं। वस्सलाम

47- आपकी वसीयत
(इमाम हसन (अ0) और इमाम हुसैन (अ0) से- इब्ने मुलजिम की तलवार से ज़ख़्मी होने के बाद)
मैं तुम दोनों को यह वसीयत करता हूं के तक़वाए इलाही इख़्तेयार किये रहना और ख़बरदार दुनिया लाख तुम्हें चाहे उससे दिल न लगाना और न उसकी किसी ‘ौ से महरूम हो जाने पर अफ़सोस करना, हमेशा हर्फ़े हक़ कहना और हमेशा आखि़रत के लिये अमल करना और देखो ज़ालिम के दुश्मन रहना और मज़लूम के साथ रहना।

मैं तुम दोनों को और अपने तमाम अहल व अयाल को और जहां तक मेरा यह पैग़ाम पहुंचे, सब को वसीयत करता हूं के तक़वाए इलाही इख़्तेयार करें, अपने उमूर को मुनज़्ज़म रखें, अपने दरम्यान ताल्लुक़ात को सुधारे रखें के मैंने अपने जद्दंे बुज़ुर्गवार से सुना है के आपस के मामलात को सुलझाकर रखना आम नमाज़ और रोज़े से भी बेहतर है।
देखो यतीमों के बारे में अल्लाह से डरते रहना और उनके फ़ाक़ों की नौबत न आजाए और वह तुम्हारी निगाहों के सामने बरबाद न हो जाएं और देखो हमसाये के बारे में अल्लाह से डरते रहना के उनके बारे में तुम्हारे पैग़म्बर (स0) की वसीयत है और आप (स0) बराबर उनके बारे में नसीहत फ़रमाते रहते थे यहां तक के हमने ख़याल किया के ‘ाायद आप वारिस भी बनाने वाले हैं।
(((- यह इस बात की अलामत है के इस्लाम का बुनियादी मक़सद मुआशरे की इस्लाह समाज की तन्ज़ीम और उम्मत के मामलात की तरतीब है और नमाज़ रोज़े को भी दर हक़ीक़त इसका एक ज़रिया बनाया गया है वरना परवरदिगार किसी की इबादत और बन्दगी का मोहताज नहीं है और इसका तमामतर मक़सद यह है के इन्सान पेश परवरदिगार अपने को हक़ीर व फ़क़ीर समझे और इसमें यह एहसास पैदा हो के मैं भी तमाम बन्दगाने ख़ुदा में से एक बन्दा हूँ और जब सब एक ही ख़ुदा के बन्दे हैं और उसी की बारगाह में जाने वाले हैं तो आपस के तफ़रिक़े का जवाज़ क्या है और यह तफ़रिक़ा कब तक बरक़रार रहेगा। बालाआखि़र को एक दिन उसकी बारगाह में एक दूसरे का सामना करना है।
इसके बाद अगर कोई ‘ाख़्स इस जज़्बे से महरूम हो जाए और ‘ौतान उसके दिल व दिमाग़ पर मुसल्लत हो जाए तो दूसरे अफ़राद का फ़र्ज़ है के इस्लामी क़दम उठाएं और मुआशरे में इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ की फ़िज़ा क़ायम करें के यह मक़सदे इलाही की तकमील और इरतेक़ाए बशरीयत की बेहतरीन अलामत है, नमाज़ रोज़ा इन्सान के ज़ाती आमाल हैं, और समाज के फ़साद से आंखें बन्द करके ज़ाती आमाल की कोई हैसियत नहीं रह जाती है। वरना अल्लाह के मासूम बन्दे कभी घर से बाहर ही न निकलते और हमेशा सजदए परवरदिगार ही में पड़े रहते।-)))
देखो!् अल्लाह से डरो क़ुरआन के बारे में के इस पर अमल करने में दूसरे लोग तुमसे आगे न निकल जाएं और अल्लाह से डरो नमाज़ के बारे में के वह तुम्हारी दीन का सुतून है।
और अल्लाह से डरो अपने परवरदिगार के घर के बारे में के जब तक ज़िन्दा रहो उसे ख़ाली न होने दो के अगर उसे छोड़ दिया गया तो तुम देखने के लाएक़ भी न रह जाओगे।
और अल्लाह से डरो अपने जान और माल और ज़बान से जेहाद के बारे में और आपस में एक दूसरे से ताल्लुक़ात रखो। एक दूसरे की इमदाद करते रहो और ख़बरदार एक दूसरे से मुंह न फे़र लेना, और ताल्लुक़ात तोड़ न लेना और अम्रे बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकिर को नज़र अन्दाज़ न कर देना के तुम पर इशरार की हुकूमत क़ाएम हो जाए और तुम फ़रयाद भी करो तो उसकी समाअत न हो।
ऐ औलादे अब्दुल मुत्तलिब! ख़बरदार मैं यह न देखूं के तुम मुसलमानों का ख़ून बहाना ‘ाुरू कर दो सिर्फ़ इस नारे पर के ‘‘अमीरूल मोमेनीन (अ0) मारे गए हैं’’ मेरे बदले में मेरे क़ातिल के अलावा किसी को क़त्ल नहीं किया जा सकता है।

देखो अगर मैं इस ज़रबत से जानबर न हो सका तो एक ज़रबत का जवाब एक ही ज़रबत है और देखो मेरे क़ातिल के जिस्म के टुकड़े न करना के मैंने ख़ुद सरकारे दो आलम (स0) से सुना है के ख़बरदार काटने वाले कुत्ते के भी हाथ पैर न काटना।
(((- कौन दुनिया में ऐसा ‘ारीफ़ुन्नफ़्स और बलन्द किरदार है जो क़ानून की सरबलन्दी के लिये अपने नफ़्स का मवाज़ना अपने दुश्मन से करे और यह एलान कर दे के अगरचे मुझे मालिक ने नफ़्सुल्लाह और नफ़्से पैग़़म्बर (स0) क़रार दिया है और मेरे नफ़्स के मुक़ाबले में कायनात के जुमला नफ़्सों की कोई हैसियत नहीं है लेकिन जहां तक इस दुनिया में क़सास का ताल्लुक़ है मेरा नफ़्स भी एक ही नफ्स ‘ाुमार किया जाएगा और मेरे दुश्मन को भी एक ही ज़र्ब लगाई जाएगी ताके दुनिया को यह एहसास पैदा हो जाए के मज़हब की तरजुमानी के लिये बलन्द किरदार की ज़रूरत होती है और समाज में ख़ूरेज़ी और फ़साद के रोकने का वाक़ई रास्ता क्या होता है, यही वह अफ़राद हैं जो खि़लाफ़ते इलाहिया के हक़दार हैं और उन्हीं के किरदार से इस हक़ीक़त की वज़ाहत होती है के इन्सानियत का काम फ़साद और ख़ूरेज़ी नहीं है बल्कि इन्सान इस सरज़मीन पर फ़साद और ख़ूरेज़ी की रोक थाम के लिये पैदा किया गया है और इसका मन्सब वाक़ेई खि़लाफ़ते इलाहिया है।)))

48- आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के नाम)
बेशक बग़ावत और दरोग़ गोई इन्सान को दीन और दुनिया दोनों में ज़लील कर देती है और इसके ऐब को नुक्ताए चीनी करने वाले के सामने वाज़ेह कर देती है। मुझे मालूम है के तू इस चीज़ को हासिल नहीं कर सकता है जिसके न मिलने का फ़ैसला किया जा चुका है के बहुत सी क़ौमों ने हक़ के बग़ैर मक़सद को हासिल करना चाहा और अल्लाह को गवाह बनाया तो अल्लाह ने उनके झूठ को वाज़ेह कर दिया
(((-आपने माविया को होशियार करना चाहा है के यह ख़ूने उस्मान का मुतालबा कोई नया नहीं है, तुझसे पहले अहले जमल यह काम कर चुके हैं और उनका झूठ वाज़ह हो चुकाा है, और वह दुनिया व आखि़रत की रूसवाई मोल ले चुके हैं, अब तुझे दोबारा ज़लील व ख़्वार होने का ‘ाौक़ क्यों पैदा हुआ है, तेरा रास्ता रूसवाई और ज़िल्लत के सिवा कुछ नहीं है-)))

उस दिन से डरो जिस दिन ख़ुशी सिर्फ़ उसी का हिस्सा होगी जिसने अपने अमल के अन्जाम को बेहतर बना लिया है और निदामत उसके लिये होगी जिसने अपनी मेहार ‘ौतान के इख़्तेयार में दे दी और उसे खींचकर नहीं रखा। तुमने मुझे क़ुरानी फ़ैसले की दावत दी है हालांके तुम उसके अहल नहीं थी और मैंने भी तुम्हारी आवाज़ पर लब्बैक नहीं कही है बल्कि क़ुरान के हुक्म पर लब्बैक कही है।


49- आपका मकतूबे गिरामी(माविया ही के नाम)

अम्माबाद! दुनिया आखि़रत से रूगरदानी कर देने वाली है और इसका साथी जब भी कोई चीज़ पा लेता है तो इसके लिये हिर्स के दूसरे दरवाज़े खोल देती है और वह कभी कोई चीज़ हासिल करके उससे बेनियाज़ नहीं हो सकता है जिसको हासिल नहीं कर सका है, हालांके उन सबके बाद जो कुछ जमा किया है उससे अलग होना है और जो कुछ बन्दोबस्त किया है उसे तोड़ देना है और तू अगर गुज़िश्ता लोगों से ज़रा भी इबरत हासिल करता तो बाक़ी ज़िन्दगी को महफ़ूज़ कर सकता था। वस्सलाम


50- आपका मकतूबे गिरामी
(रूसाए लश्कर के नाम)

बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली बिन अबीतालिब (अ0) की तरफ़ से सरहदों के मुहाफ़िज़ों के नाम, याद रखना के वाली पर क़ौम का हक़ यह है के उसने जिस बरतरी को पा लिया है या जिस फ़ारिग़ुल बाली की मन्ज़िल तक पहुंच गया है उसकी बिना पर क़ौम के साथ अपने रवैये में तबदीली न पैदा करे और अल्लाह ने जो नेमत उसे अता की है उसकी बिना पर बन्दगाने ख़ुदा से ज़्यादा क़रीबतर हो जाए और अपने भाइयों पर ज़्यादा ही मेहरबानी करे।
याद रखो मुझ पर तुम्हारा एक हक़ यह भी है के जंग के अलावा किसी मौक़े पर किसी राज़ को छिपाकर न रखूं और हुक्मे ‘ारीअत के अलावा किसी मसले में तुम से मशविरा करने से पहलूतही न करूं, न तुम्हाारे किसी हक़ को उसकी जगह से पीछे हटाऊँ और न किसी मामले को आखि़री हद तक पहुंचाए बग़ैर दम लूँ और तुम सब मेरे नज़दीक हक़ के मामले में बराबर हो, इसके बाद जब मैं इन हुक़ूक़ को अदा करूंगा तो तुम पर अल्लाह के लिये ‘ाुक्र और मेरे लिये इताअत वाजिब हो जाएगी और यह लाज़िम हाोगाा के मेरी दावत से पीछे न हटो और किसी इस्लाह में कोताही न करो, हक़ तक पहुंचने के लिये सख़्ितयों में कूद पड़ो के तुम इन मामलात में सीधे न रहे तो मेरी नज़र में तुम से टेढ़े हो जाने वाले से ज़्यादा कोई हक़ीर व ज़लील न होगा उसके बाद मैं उसे सख़्त सज़ा दूंगा और मेरे पास कोई रिआयतत न पाएगाा, तो अपने ज़ेरे निगरानी अम्रा से यही अहद व पैमान लो और अपनी तरफ़ से उन्हें वह हुक़ूक़ अता करो जिनसे परवरदिगार तुम्हारे उमूर की इस्लाह कर सके, वस्सलाम।
(((-यह इस्लामी क़ानून का सबसे बड़ा इम्तियाज़ है के इस्लाम हक़ लेने से पहले हक़ अदा करने की बात करता है और किसी ‘ाख़्स को उस वक़्त तक साहबे हक़ नहीं क़रार देताा है जब तक वह दूसरों के हुक़ूक़ अदा न कर दे और यह साबित न कर दे के वह ख़ुद भी बन्दए ख़ुदा है और एहकामे इलाहिया का एहतेराम करना जानता है, इसके बग़ैर हुक़ूक़ का मुतालेबा करना बशर को मालिक से आगे बढ़ाा देने के मुरादिफ़ है के अपने वास्ते मालिके कायनात भी क़ाबिले इताअत नहीं है और दूसरों के वास्ते अपनी ज़ात भी क़ाबिले इताअत है, यह फ़िरऔनियत और नमरूदियत की वह क़िस्म है जो दौरे क़दीम के फ़राअना में भी नहीं देखी गई और आज के हर फ़िरऔन में पाई जा रही है, कल फ़िरऔन अपने को फ़राएज़ से बालातर समझता था और आज वाले फ़राएज़ को फ़राएज़ समझते हैं और इसके बाद भी अदा करने की फ़िक्र नहीं करते हैं।-)))


51-आपका मकतूबे गिरामी(ख़ेराज वसूल करने वालों के नाम)
बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से ख़ेराज वसूल करने वालों की तरफ़
अम्माबाद! जो ‘ाख़्स अपने अन्जामकार से नहीं डरता है वह अपने नफ़्स की हिफ़ाज़त का सामान भी फ़राहम नहीं करता है, याद रखो तुम्हारे फ़राएज़ बहुत मुख़्तसर हैं और उनका सवाब बहुत ज़्यादा है और अगर परवरदिगार ने बग़ावत और ज़ुल्म से रोकने के बाद उस पर अज़ाब भी न रखा होता तो उससे परहेज़ करने का सवाब ही इतना ज़्यादा था के उसके तर्क करने में कोई ‘ाख़्स माज़ूर नहीं हो सकता था, लेहाज़ा लोगों के साथ इन्साफ़ करो, उनके ज़रूरियात के लिये सब्र व तहम्मुल से काम लो के तुम रिआया के ख़ज़ानेदार, उम्मत के नुमाइन्दे और आइम्मा के सफ़ीर हो, ख़बरदार किसी ‘ाख़्स को उसकी ज़रूरत से रोक न देना और उसके मतलूब की राह में रूकावट न पैदा करना और ख़ेराज वसूल करने के लिये उसके सरदी या गर्मी के कपड़े न बेच डालना और न उस जानवर या ग़ुलाम पर क़ब्ज़ा कर लेना जो उसके काम आता है और किसी को पैसे की ख़ातिर मारने न लगना और किसी मुसलमान या काफ़िर ज़मी के माल को हाथ न लगाना मगर यह के उसके पास कोई ऐसा घोड़ा या असलहा हो जिसे दुश्मनाने इस्लाम को देना चाहता है तो किसी मुसलमान के लिये यह मुनासिब नहीं है के यह अशयाअ दुश्मनाने इस्लाम के हाथों में छोड़ दे और वह इस्लाम पर ग़ालिब आ जाएं। देखो किसी नसीहत को बचाकर न रखना, न लश्कर के साथ अच्छे बरताव में कमी करना और न रिआया की इमदाद में और न दीने ख़ुदा को क़ौत पहुंचाने में, अल्लाह की राह में उसके तमाम फ़राएज़ को अदा कर देना के उसने हमारे और तुम्हारे साथ जो एहसान किया है उसका तक़ाज़ा यह है के हम उसके ‘ाुक्र की कोशिश करें और जहां तक मुमकिन हो उसके दीन की मदद करें के क़ौत भी तो बालाआखि़र ख़ुदाए अज़ीम का अतिया है।

52-आपका मकतूबे गिरामी
(अम्राए बलाद के नाम- नमाज़ के बारे में)

अम्माबाद- ज़ोहर की नमाज़ उस वक़्त तक अदा कर देना जब आफ़ताब का साया बकरियों के बाड़े की दीवार के बराबर हो जाए और अस्र की नमाज़ उस वक़्त तक पढ़ा देना जब आफ़ताब रौशन और सफ़ेद रहे और दिन में इतना वक़्त बाक़ी रह जाए जब मुसाफ़िर दो फ़रसख़ जा सकता हो। मग़रिब उस वक़्त अदा करना जब रोज़ेदार इफ़्तार करता है और हाजी अरफ़ात से कूच करता है और इशा उस वक़्त पढ़ना जब ‘ा़फ़क़ छिप जाए और एक तिहाई रात न गुज़रने पाए, सुबह की नमाज़ उस वक़्त अदा करना जब आदमी अपने साथी के चेहरे को पहचान सके। इनके साथ नमाज़़ पढ़ो कमज़ोरतरीन आदमी का लेहाज़ रखकर, और ख़बरदार इनके लिये सब्र आज़मा न बन जाओ।

(((-वाज़ेह रहे के यह ख़त रूसा ‘ाहर के नाम लिखा गया है और उनके लिये नमाज़े जमाअत के औक़ात मुअय्यन किये गये हैं, इसका असल नमाज़ से कोई ताल्लुक़ नहीं है, अस्ल नमाज़ के औक़ात सूरए इसरा में बयान कर दिये गये हैं यानी ज़वाले आफ़ताब, तारीकीए ‘ाब और फ़ज्र और उन्हीं तीन औक़ात में पांच नमाज़ों को अदा हो जाना है।, जिसमें तक़दीम देना ख़ैर नमााज़ी के इख़्तेयार में है के फ़ज्र के एक डेढ़ घन्टे में दो रकअत कब अदा करेगा या ज़ोहर व अस्र के छः घण्टे में आठ रकअत किस वक़्त अदा करेगाा या तारीकीए ‘ाब के बाद सात रकत मग़रिब व इशा कब पढ़ेगा, सरकारी जमाअत में इस तरह की आज़ादी मुमकिन नहीं है, इसका वक़्त मुअय्यन होना ज़रूरी है ताके लोग नमाज़ में शिरकत कर सकें, लेहाज़ा हज़रत ने इस दौर के हालात पेशे नज़र एक वक़्त मुअय्यन कर दिया, वरना आज के ज़माने में दो फ़रसख़ रास्ता पांच मिनट में तय होता है जो क़तअन इस मकतूबे गिरामी में मक़सूद नहीं है-)))