Thursday, June 2, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 260-285 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 260-285

260- जब आपको इत्तेला दी गई के माविया के असहाब ने अम्बार पर हमला कर दिया है तो आप ब-नफ़्से नफ़ीस निकल कर नख़ीला तक तशरीफ़ ले गए और कुछ लोग भी आपके साथ पहुंच गए और कहने लगे के आप तशरीफ़ रखें। हम लोग उन दुश्मनों के लिये काफ़ी हैं तो आपने फ़रमाया के तुम लोग अपने लिये काफ़ी नहीं हो दुश्मन के लिये क्या काफ़ी हो सकते हो? तुमसे पहले रिआया हुक्काम के ज़ुल्म से फ़रियादी थी और आज मैं रिआया के ज़ुल्म से फ़रयाद कर रहा हूँ, जैसे के यही लोग क़ाएद हैं और मैं रइयत हूँ। मैं हलक़ाबगोश हूँ और यह फ़रमान रवा।

जिस वक़्त आपने यह कलाम इरशाद फ़रमाया जिसका एक हिस्सा ख़ुत्बे के ज़ैल में नक़्ल किया जा चुका है तो आपके असहाब में से दो अफ़राद आगे बढ़े जिनमें से एक ने कहा के मैं अपना और अपने भाई का ज़िम्मेदार हूँ। आप हुक्म दें हम तामील के लिये तैयार हैं, आपने फ़रमाया के मैं जो कुछ चाहता हूँ तुम्हारा उससे क्या ताल्लुक़ है।

261-कहा जाता है के हारिस बिन जोत ने आपके पास आकर यह कहा के क्या आपका यह ख़्याल है के मैं असहाबे जमल को गुमराह मान लूँगा? तो आपने फ़रमाया के हारिस! तुमने अपने नीचे की तरफ़ देखा है इसलिये हैरान हो गए हो, तुम हक़ ही को नहीं पहचानते हो तो क्या जानो के हक़दार कौन है और बातिल ही को नहीं जानते हो तो क्या जानो के बातिल परस्त कौन है? हारिस ने कहा के मैं सईद बिन मालिक और अब्दुल्लाह बिन उमर के साथ गोशानशीन हो जाऊंगा तो आपने फ़रमाया के सईद और अब्दुल्लाह बिन उमर ने हक़ की मदद की है और न बातिल को नज़रअन्दाज़ किया है (न इधर के हुए न उधर के हुए)

(((यह बात उस शख़्स से कही जाती है जिसकी निगाह इन्तेहाई महदूद होती है और अपने ज़ेरे क़दम अश्याअ से ज़्यादा देखने की सलाहियत नहीं रखता है वरना इन्सान की निगाह बलन्द हो जाए तो बहुत से हक़ाएक़ का इदराक कर सकती है, हारिस का सबसे बड़ा ऐब यह है के उसने सिर्फ़ उम्मुल मोमेनीन की ज़ौजियत पर निगाह की है और तलहा व ज़ुबैर की सहाबियत पर, और ऐसी महदूद निगाह रखने वाला इन्सान हक़ाएक़ का इदराक नहीं कर सकता है। हक़ाएक़ का मेयार क़ुरान व सुन्नत है जिसमें ज़ौजा को घर में बैठने की तलक़ीन की गई है और इन्सान को बैअत शिकनी से मना किया गया है। हक़ाएक़ का मेयार किसी की ज़ौजियत या सहाबियत नहीं है, वरना ज़ौजाए नूह (अ0) और ज़ौजाए लूत (अ0) को क़ाबिले मज़म्मत न क़रार दिया जाता और असहाबे मूसा की सरीही मज़म्मत न की जाती।’’)))

262- बादशाह का मसाहेब शीर का सवार होता है के लोग उसके हालात पर रश्क करते हैं और वह ख़ुद अपनी हालत को बेहतर पहचानता है।

(((हक़ीक़ते अम्र यह है के मसाहेबत की ज़िन्दगी देखने में इन्तेहाई हसीन दिखाई देती है के सारा अम्र व नहीं का निज़ाम बज़ाहिर मसाहेब के हाथ में होता है लेकिन उसकी वाक़ई हैसियत क्या होती है यह उसी का दिल जानता है के न साहेबे इक़्तेदार के मिज़ाज का कोई भरोसा होता है और न मसाहेबत के ओहदए इक़्तेदार का। रब्बे करीम हर इन्सान को ऐसी बलाओं से महफ़ूज़ रखे जिनका ज़ाहिर इन्तेहाई हसीन होता है और वाक़ेई इन्तेहाई संगीन और ख़तरनाक।)))

263- दूसरों के पसमान्दगान से अच्छा बरताव करूं ताके लोग तुम्हारे पसमान्दगान के साथ भी अच्छा बरताव करें।

264- होकमा का कलाम दुरूस्त होता है तो दवा बन जाता है और ग़लत होता है तो बीमारी बन जाता है।

265- एक शख़्स ने आपके मुतालबा किया के ईमान की तारीफ़ फ़रमाएं, तो फ़रमाया के कल आना तो मैं मजमए आम में बयान करूंगा ताके तुम भूल जाओ तो दूसरे लोग महफ़ूज़ रख सकें इसलिये के कलाम भड़के हुए शिकार के मानिन्द होता है के एक पकड़ लेता है और एक के हाथ से निकल जाता है
(मुफ़स्सल जवाब इससे पहले ईमान के शोबों के ज़ैल में नक़्ल किया जा चुका है।)

266-फ़रज़न्दे आदम! उस दिन का ग़म जो अभी नहीं आया है उस दिन पर मत डालो जो आ चुका है के अगर वह तुम्हारी उम्र में शामिल होगा तो उसका रिज़्क़ भी उसके साथ ही आएगा।

267- अपने दोस्त से एक महदूद हद तक दोस्ती करो, कहीं ऐसा न हो के एक दिन दुश्मन हो जाए और दुश्मन से भी एक हद तक दुश्मनी करो शायद एक दिन दोस्त बन जाए (तो शर्मिन्दगी न हो)।

(((यह एक इन्तेहाई अज़ीम मुआशेरती नुक्ता है जिसका अन्दाज़ा हर उस इन्सान को है जिसने मुआशरे में आंख खोल कर ज़िन्दगी गुज़ारी है और अन्धों जैसी ज़िन्दगी नहीं गुज़ारी है। इस दुनिया के सर्द व गर्म का तक़ाज़ा यही है के यहाँ अफ़राद से मिलना भी पड़ता है और कभी अलग भी होना पड़ता है लेहाज़ा तक़ाज़ाए अक़्लमन्दी यही है के ज़िन्दगी में ऐसा एतदाल रखे के अगर अलग होना पड़े तो सारे इसरार दूसरे के क़ब्ज़े में न हों के उसका ग़ुलाम बन कर रह जाए और अगर मिलना पड़े तो ऐसे हालात न हों के शर्मिन्दगी के अलावा और कुछ हाथ न आए।)))

268- दुनिया में दो तरह के अमल करने वाले पाए जाते हैं, एक वह है जो दुनिया ही के लिये काम करता है और उसे दुनिया ने आख़ेरत से ग़ाफ़िल बना दिया है। वह अपने बाद वालों के फ़क्ऱ से ख़ौफ़ज़दा रहता है और अपने बारे में बिल्कुल मुतमईन रहता है, नतीजा यह होता है के सारी ज़िन्दगी दूसरों के फ़ायदे के लिये फ़ना कर देता है और एक शख़्स वह होता है जो दुनिया में उसके बाद के लिये अमल करता है और उसे दुनिया बग़ैर अमल के मिल जाती है। वह दुनिया व आख़ेरत दोनों को पा लेता है और दोनों घरों का मालिक हो जाता है। ख़ुदा की बारगाह में सुरख़ुरू हो जाता है और किसी भी हाजत का सवाल करता है तो परवरदिगार उसे पूरा कर देता है।

(((दौरे क़दीम में इसका नाम दूर अन्देशी रखा जाता था जहां इन्सान सुबह व शाम मेहनत करने के बावजूद न माल अपनी दुनिया पर सर्फ़ करता था और न आख़ेरत पर। बल्कि अपने वारिसों के लिये ज़ख़ीरा बनाकर चला जाता था, इस ग़रीब को यह एहसास भी नहीं था के जब उसे ख़ुद अपनी आक़ेबत बनाने की फ़िक्र नहीं है तो वोरसा को उसकी आक़ेबत से क्या दिलचस्पी हो सकती है, वह तो एक माले ग़नीमत के मालिक हो गए हैं और जिस तरह चाहेंगे उसी तरह सर्फ़ करेंगे।)))

269- रिवायत में वारिद हुआ है के अम्र बिन अलख़ताब के सामने एक दौरे हुकूमत में ख़ानाए काबा के ज़ेवरात की कसरत का ज़िक्र किया गया और एक क़ौम ने यह तक़ाज़ा किया के अगर आप उन ज़ेवरात को मुसलमानों के लश्कर पर सर्फ़ कर दे ंतो बहुत बड़ा अज्र व सवाब मिलेगा, काबे को उन ज़ेवरात की क्या ज़रूरत है? तो उन्होंने इस राय को पसन्द करते हुए हज़रत अमीर (अ0) से दरयाफ़्त कर लिया। आपने फ़रमाया के यह क़ुरान पैग़म्बरे इस्लाम पर नाज़िल हुा है और आपके दौर में अमवाल की चार क़िस्में थीं। एक मुसलमान का ज़ाती माल था जिसे हस्बे फ़राएज़ वोरसा में तक़सीम कर दिया करते थे। एक बैतुलमाल का माल था जिसे मुस्तहक़ीन में तक़सीम करते थे। एक ख़ुम्स था जिसे उसके हक़दारों के हवाले कर देते थे और कुछ सदक़ात थे जिन्हें के महल पर सर्फ़ किया करते थे। काबे के ज़ेवरात उस वक़्त भी मौजूद थे और परवरदिगार ने उन्हें इसी हालत में छोड़ रखा था न रसूले न रसूले अकरम (स0) उन्हें भूले थे और न उनका वजूद आपसे पोशीदा था, लेहाज़ा आप उन्हें इसी हालत पर रहने दें जिस हालत पर ख़ुदा और रसूल ने रखा है, यह सुनना था के उमर ने कहा आज अगर आप न होते तो मैं रूसवा हो गया होता और यह कहकर ज़ेवरात को उनकी जगह छोड़ दिया।

270-कहा जाता है के आपके सामने दो आदमियों को पेश किया गया जिन्होंने बैतुलमाल से माल चुराया था। एक उनमें से ग़ुलाम और बैतुलमाल की मिल्कियत था और दूसरा लोगों में से किसी की मिल्कियत था। आपने फ़रमाया के जो बैतुलमाल की मिल्कियत है उस पर कोई हद नहीं है के माले ख़ुदा के एक हिस्से ने दूसरे हिस्से को खा लिया है लेकिन दूसरे पर शदीद हद जारी की जाएगी जिसके बाद उसके हाथ काट दिये गए।

271-अगर इन फिसलने वाली जगहों पर मेरे क़दम जम गए तो मैं बहुत सी चीज़ों को बदल दूंगा (जिन्हें पेशरौ ख़ोलफ़ा ने ईजाद किया है और जिनका सुन्नते पैग़म्बर (स0) से कोई ताल्लुक़ नहीं है।)

272- यह बात यक़ीन के साथ जान लो के परवरदिगार ने किसी बन्दे के लिये इससे ज़्यादा नहीं क़रार दिया है जितना किताबे हकीम में बयान कर दिया गया है चाहे उसकी तदबीर कितनी ही अज़ीम, उसकी जुस्तजु कितनी ही शदीद और उसकी तरकीबें कितनी ही ताक़तवर क्यों न हों और इसी तरह वह बन्दे तक उसका मक़सूम पहुंचने की राह में कभी हाएल नहीं होता है चाहे वह कितना ही कमज़ोर और बेचारा क्यों न हो। जो इस हक़ीक़त को जानता है और उसके मुताबिक़ अमल करता है वही सबसे ज़्यादा राहत और फ़ायदे में रहता है और जो इस हक़ीक़त को नज़रअन्दाज़ कर देता है और इसमें शक करता है वही सबसे ज़्यादा नुक़सान में मुब्तिला होता है, कितने ही अफ़राद हैं जिन्हें नेमतें दी जाती हैं और उन्हीं के ज़रिये अज़ाब की लपेट में ले लिया जाता है और कितने ही अफ़राद हैं जो मुब्तिलाए मुसलबत होते हैं लेकिन यही इब्तिला उनके हक़ में बाएसे बरकत बन जाता है। लेहाज़ा ऐ फ़ायदे के तलबगारों! शुक्र में इज़ाफ़ा करो और अपनी जल्दी कम कर दो और अपने रिज़्क़ की हदों पर ठहर जाओ।

(((यह सूरतेहाल बज़ाहिर ख़ानए काबा के साथ मख़सूस नहीं है बल्कि तमाम मुक़द्दस मुक़ामात का यही हाल है के उनके ज़ीनत व आराइश के असबाब अगर ज़रूरी है, लेकिन अगर उनकी कोई अफ़ादियत नहीं है तो उनके बारे में ज़िम्मेदार इन शरीअत से रूजू करके सही मसरफ़ में लगा देना चाहिये। बक़ौल शख़्से बिजली के दौर में मोमबत्ती और ख़ुशबू के दौर में अगरबत्ती के तहफ़्फ़ुज़ की कोई ज़रूरत नहीं है, यही पैसा इसी मुक़द्दस मक़ाम के दीगर ज़ुरूरियात पर सर्फ़ किया जा सकता है।)))

273- ख़बरदार अपने इल्म को जेहल न बनाओ और अपने यक़ीन को ‘ाक न क़रार दो। जब जान लो तो अमल करो और जब यक़ीन हो जाए तो क़दम आगे बढ़ाओ।

(((इमाम अलैहिस्सलाम की नज़र में इल्म और यक़ीन के एक मख़सूस मानी हैं जिनका इज़हार इन्सान के किरदार से होता है। आपकी निगाह में इल्म सिर्फ़ जानने का नाम नहीं है और न यक़ीन सिर्फ़ इत्मीनाने क़ल्ब का नाम है बल्कि दोनों के वजूद का एक फ़ितरी तक़ाज़ा है जिससे उनकी वाक़ईयत और असालत का अन्दाज़ा हाोता है के इन्सान वाक़ेअन साहेबे इल्म है तो बाअमल भी होगा और वाक़ेअन साहेबे यक़ीन है तो क़दम भी आगे बढ़ाएगा। ऐसा न हो तो इल्म जेहल कहे जाने के क़ाबिल है और यक़ीन ‘ाक से बालातर कोई ‘ौ नहीं है।)))

274- लालच जहां वारिद कर देती है वहां से निकलने नहीं देती है और यह एक ऐसी ज़मानतदार है जो वफ़ादार नहीं है के कभी कभी तो पानी पीने वाले को सेराबी से पहले ही उच्छू लग जाता है और जिस क़द्र किसी मरग़ूब की क़द्र व मन्ज़िलत ज़्यादा होती है उसके खो जाने का रन्ज ज़्यादा होता है। आरज़ूएं दीदाए बसीरत को अन्धा बना देती हैं और जो कुछ नसीब में होता है वह बग़ैर कोशिश के भी मिल जाता है।

(((लालच इन्सान को हज़ारों चीज़ों का यक़ीन दिला देती है और उससे वादा भी कर लेती है लेकिन वक़्त पर वफ़ा नहीं करती है और बसावक़ात ऐसा होता है के सेराब होने से पहले ही उच्छू लग जाता है और सेराब होने की नौबत ही नहीं आती है। लेहाज़ा तक़ाज़ाए अक़्ल व मवानिश यही है के इन्सान लालच से इज्तेनाब करे और बक़द्रे ज़रूरत पर इक्तिफ़ा करे जो बहरहाल उसे हासिल होने वाला है।)))

275- ख़ुदाया मैं इस बात से पनाह चाहता हूँ के लोगों की ज़ाहेरी निगाह में मेरा ज़ाहिर हसीन हो और जो बातिन तेरे लिये छिपाए हुए हूँ वह क़बीह हो, मैं लोगों के दिखावे के लिये उन चीज़ों की निगेहदाश्त करूं जिन पर तू इत्तेलाअ रखता है। के लोगों पर हुस्ने ज़ाहिर का मुज़ाहेरा करूं और तेरी बारगाह में बदतरीन अमल के साथ हाज़ेरी दूँ। तेरे बन्दों से क़ुरबत इख़्तेयार करूं और तेरी मर्ज़ी से दूर हो जाऊं।
(((आम तौर से लोगों का हाल यह होता है के अवामुन्नास के सामने आने के लिये अपने ज़ाहिर को पाक व पाकीज़ा और हसीन व जीमल बना लेते हैं और यह ख़याल ही नहीं रह जाता है के एक दिन उसका भी सामना करना है जो ज़ाहिर को नहीं देखता है बल्कि बातिन पर निगाह रखता है और इसरार का भी हिसाब करने वाला है। मौलाए कायनात (अ0) ने आलमे इन्सानियत को इसी कमज़ोरी की तरफ़ मुतवज्जो करने के लिये इस दुआ का लहला इख़्तेयार किया है जहां दूसरों पर बराहे रास्त तन्क़ीद भी न हो और अपना पैग़ाम भी तमाम अफ़राद तक पहुंच जाए। ‘ाायद इन्सानों को यह एहसास पैदा हो जाए के अवामुन्नास का सामना करने से ज़्यादा अहमियत मालिक के सामने जाने की है और इसके लिये बातिन का पाक व साफ़ रखना बेहद ज़रूरी है।)))
276- उस ज़ात की क़सम जिसकी बदौलत हमनंे ‘ाबे तारीक के उस बाक़ी हिस्से को गुज़ार दिया है जिसके छंटते ही रोज़े दरख़्शां ज़ाहिर होगा ऐसा और ऐसा नहीं हुआ है।
277- थोड़ा अमल जिसे पाबन्दी से अन्जाम दिया जाए उस कसीर अमल से बेहतर है जिससे आदमी उकता जाए।
278- जब नवाफ़िल फ़राएज़ को नुक़सान पहुंचाने लगें तो उन्हें छोड़ दो।
((( तक़द्दुस मआब हज़रात के लिये यह बेहतरीन नुसख़ए हिदायत है जो इज्तेमाअ और अवामी फ़राएज़ से ग़ाफ़िल हांेकर मुस्तहबात पर जान दिये पड़े रहते हैं और अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास नहीं करते हैं और इसी तरह ये उन साहेबाने ईमान के लिये सामाने तम्बीह है जो मुस्तहबात पर इतना वक़्त और सरमाया सर्फ़ कर देते हैं के वाजेबात के लिये न वक़्त बचता है और न सरमाया। जबके क़ानूनी एतबार से ऐसे मुस्तहबाात की कोई हैसियत नहीं है जिनसे वाजेबात मुतास्सिर हो जाएं और इन्सान फ़राएजज़ की अदाएगी में कोताही का शिकार हो जाए।))))
279-जो दौरे सफ़र को याद रखता है वह तैयारी भी करता है।
280- आंखों का देखना हक़ीक़त में देखना ‘ाुमार नहीं होता है के कभी कभी आंखें अपने अश्ख़ास को धोका दे देती हैं लेकिन अक़्ल नसीहत हासिल करने वाले को फ़रेब नहीं देती है।
(((इन्सानी इल्म के तीन वसाएल हैं एक उसका ज़ाहेरी एहसास व इदराक है और एक उसकी अक़्ल है जिस पर तमाम ओक़लाए बशर का इत्तेफ़ाक़ है और तीसरा रास्ता वहीए इलाही है जिस पर साहेबाने ईमान का ईमान है और बेईमान उस वसीले इदराक से महरूम हैं। इन तीनों में अगरचे वही के बारे में ख़ता का कोई इमकान नहीं है और इस एतबार से इसका मरतबा सबसे अफ़ज़ल है लेकिन ख़ुद ववही का इदराक भी अक़्ल के बग़ैर मुमकिन नहीं है और इसस एतबार से अक़्ल का मरतबा एक बुनियादी हैसियत रखता है और यही वजह है के कुतुब अहादीस में किताबुल अक़्ल को सबसे पहले क़रार दिया गया है और इस तरह उसकी बुनियादे हैसियत का ऐलान किया गया है।)))
281- तुम्हारे और नसीहत के दरम्यान ग़फ़लत का एक परदा हाएल रहता है।
282-तुम्हारे जाहिलों को दौलते फ़रावां दे दी जाती है और आलिम को सिर्फ़ मुस्तक़बिल की उम्मीद दिलाई जाती है।
283- इल्म हमेशा बहाना बाज़ों के उज़्र को ख़त्म कर देता है।
(((अगर इन्सान वाक़ेअन आलिम है तो इल्म का तक़ाज़ा यह है के उसके मुताबिक़ अमल करे और किसी तरह की बहानाबाज़ी से काम न ले जिस तरह के दरबारी और सियासी ओलमा दीदा व दानिस्ता हक़ाएक़ से इन्हेराफ़ करते हैं और दुनियावी मफ़ादात की ख़ातिर अपने इल्म का ज़बीहा कर देते हैं, ऐसे लोग क़ातिल और रहज़न कहे जाने के क़ाबिल हैं, आलिम और फ़ाज़िल कहे जाने के लाएक़ नहीं है।)))
284- जिसकी मौत जल्दी आ जाती है वह मोहलत का मुतालबा करता है और जिसे मोहलत मिल जाती है वह टाल-मटोल करता है।
285- जब भी लोग किसी चीज़ पर वाह-वाह करते हैं तो ज़माना उसके वास्ते एक बुरा दिन छुपाकर रखता है।

Tuesday, May 31, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 256-259 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 256-259

256-ऐ कुमैल! अपने घरवालों को हुक्म दो के अच्छी ख़सलतों को तलाश करने के लिये दिन में निकलें और सो जाने वालों की हाजत रवाई के लिये रात में क़याम करें। क़सम है उस ज़ात की जात हर आवाज़ की सुनने वाली है के कोई शख़्स किसी दिल में सुरूर वारिद नहीं करता है मगर यह के परवरदिगार उसके लिये उस सुरूर से एक लुत्फ़ पैदा कर देता है के इसके बाद अगर इस पर कोई मुसीबत नाज़िल होती है तो वह नशेब में बहने वाले पानी की तरह तेज़ी से बढ़े और अजनबी ऊंटों को हंकाने की तरह उस मुसीबत को हंका कर दूर कर दे।

257-जब तंगदस्त हो जाओ तो सदक़े के ज़रिये अल्लाह से ब्योपार करो।
 
258-ग़द्दारों से वफ़ा करना अल्लाह के नज़दीक ग़द्दारी है, और ग़द्दारों के साथ ग़द्दारी करना अल्लााह के नज़दीक ऐने वफ़ा है।
 
259- कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें नेमतें देकर रफ़्ता रफ़्ता अज़ाब काा मुस्तहक़ बनाया जाता है और कितने ही लोग ऐसे हैं जो अल्लाह की परदापोशी से धोका खाए हुए हैं और अपने बारे में अच्छे अलफ़ाज़ सुनकर फ़रेब में पड़ गए और मोहलत देने से ज़्यादा अल्लाह की जानिब से कोई बड़ी आज़माइश नहीं।
 
सय्यद रज़ी- कहते हैं के यह कलाम पहले भी गुज़र चुका है मगर यहाँ इसमें कुछ उमदा और मुफ़ीद इज़ाफ़ा है।’’

फ़स्ल
इस फ़स्ल में हज़रत के उन कलेमात को नक़्ल किया गया है जो मोहताजे तफ़सीर थे और फिर उनकी तफ़सीर व तौज़ीह को भी नक़्ल किया गया है।
  • 1-जब वह वक़्त आएगा तो दीन का यासूब अपनी जगह पर क़रार पाएगा और लोग उसके पास इस तरह जमा होंगे जिस तरह मौसमे ख़रीफ़ के क़ज़अ
सय्यद रज़ी-यासूब उस मुरदार को कहा जाता है जो तमाम उमूर का ज़िम्मेदार होता है और कज़अ बादलों के उन टुकड़ों का नाम है जिनमें पानी न हो।
(((यासूब ‘ाहद की मक्खियों के सरबराह को कहते हैं और ‘‘यासूबुद्दीन’’ (हाकिमे दीन व ‘ारीअत) से मुराद हज़रत हुज्जत (अ0) हैं।
  • 2- यह खेा़तीब शहशह (सासा बिन सौहान अबदी)
‘ाहशह उस ख़तीब को कहते हैं जो खि़ताबत में माहिर होता है और ज़बानआवरी या रफ़्तार में तेज़ी से आगे बढ़ता है। इसके अलावा दूसरे मुक़ामात पर ‘ाहशह बख़ील और कन्जूस के मानी में इस्तेमाल होता है।
  • 3- लड़ाई झगड़े के नतीजे में क़ोहम होते हैं।
क़ोहम से मुराद तबाहियाँ हैं के यह लोगों को हलाकतों में गिरा देती हैं और उसी से लफ़्ज़े ‘‘कहमतुल अराब’’निकला है, जब ऐसा महत पड़ जाता है के जानवर सिर्फ़ हड्डियों का ढांचा रह जाते हैं और गोया यह उस बला में ढकेल दिये जाते हैं या दूसरे एतबार से क़हतसाली  इनको सहराओं से निकालकर ‘ाहरों की तरफ़ ढकेल देती है।
  • 4-जब लड़कियां नस्सुलहक़ाक़ (नस्स- आखि़री मन्ज़िल को कहा जाता है) तक पहुँच जाएँ तो उनके लिये दो हयाली रिश्तेदार ज़्यादा हक़ रखते हैं।
नस्सतुलरजल- यानी जहाँ तक मुमकिन था उससे सवाल कर लिया, सस्सुलहकाक़ से मुराद मन्ज़िले इदराक है जो बचपने की आखि़री हद है और यह इस सिलसिले का बेहतरीन कनाया है जिसका मक़सद यह है के जब लड़कियां हद्दे बलूग़ तक पहुंच जाएं तो दो हयाली रिश्तेदार जो महरम भी हों जैसे भाई और चचा वग़ैरह उसका रिश्ता करने के लिये माँ के मुक़ाबले में ज़्यादा हक़ (उलूवियत) रखते हैं और हक़ाक़ से माँ का इन रिश्तेदारों से झगड़ा करना और हर एक का अपने को ज़्यादा हक़दार साबित करना मुराद है जिसके लिये कहा जाता है ‘‘हाक़क़तह हकाक़न’’ - ‘‘जादेलतह जेदाला’’।
और बाज़ लोगों का कहना है के नस्सुल हक़ाक़ कमाले अक़्ल है जब लड़की इदराक की उस मन्ज़िल पर होती है जहां उसके ज़िम्मे फ़राएज़ व एहकाम साबित हो जाते हैं और जिन लोगों ने नस्सुल हक़ाएक़ नक़्ल किया है। इनके यहाँ हक़ाएक़ हक़ीक़त की जमा है यह सारी बातें अबू उबैदुल कासिम बिन सलाम ने बयान की हैं लेकिन मेरे नज़दीक औरत का क़ाबिले शादी और क़ाबिले तसर्रूफ़ हो जाना मुराद है के हक़ाएक़ हिक़्क़ा की जमा है और हिक़्क़ा वह ऊँटनी है जो चैथे साल में दाखि़ल हो जाए और उस वक़्त सवारी के क़ाबिल हो जाती है और हक़ाएक भी हिक़्क़ा ही के जमा के तौर पर इस्तेमाल होता है और यह मफ़हूम अरब के असलूबे कमाल से ज़्यादा हम आहंग है।
  • 5- ईमान एक लुम्ज़ा की शक्ल में ज़ाहिर होता है और फिर ईमान के साथ यह लुम्ज़ा भी बढ़ता रहता है। (लुम्ज़ा सफ़ेद नुक़्ता होता है जो घोड़े के होंट पर ज़ाहिर होता है)
  • 6- जब किसी शख़्स को दीने ज़नून मिल जाए तो जितने साल गुज़र गए हों उनकी ज़कात वाजिब है।
ज़नून उस क़र्ज़ का नाम है जिसके कर्ज़दार को यह न मालूम हो के वह वसूल भी हो सकेगा या नहीं और इस तरह तरह-तरह के ख़यालात पैदा होते रहते हैं और इसी बुनियाद पर हर ऐसे अम्र को ज़नून कहा जाता है जैसा के अश्या ने कहा हैः
‘‘वह जुद ((जुद- सहरा के पुराने कनवीं को कहा जाता है और ज़नून उसको कहा जाता है जिसके बारे में यह न मालूम हो के इसमें पानी है या नहीं)) ज़नून है जो गरज कर बरसने वाले अब्र की बारिश से भी महरूम हो, उसे दरियाए फ़ुरात के मानिन्द नहीं क़रार दिया जा सकता है जबके वह ठाठें मार रहा हो और किश्ती और तैराक दोनों को ढकेल कर बाहर फेंक रहा हो’’
  • 7- आपने एक लश्कर को मैदाने जंग में भेजते हुए फ़रमाया- जहां तक मुमकिन हो औरतों से आज़ब रहो ((यानी उनकी याद से दूर रहो)), उनमें दिल मत लगाओ और उनसे मुक़ारेबत मत करो के यह तरीक़ए कार बाज़ुए हमीयत में कमज़ोरी और अज़्म की पुख़्तगी में सुस्ती पैदा कर देता है और दुश्मन के मुक़ाबले में कमज़ोर बना देता है और जंग में कोशिशे वुसई से रूगर्दां कर देता है और जो उन तमाम चीज़ों से अलग रहता है उसे आज़ब कहा जाता है, आज़ब या उज़ू़ब खाने पीने से दूर रहने वाले को भी कहा जाता है।))

  • 8-वह उस यासिर फ़ालिज के मानिन्द है जो जुए के तीरों का पांसा फेंककर पहले ही मरहले पर कामयाबी की उम्मीद लगा लेता है
‘‘यासिरून’’ वह लोग हैं जो नहर की हुई ऊंटनी पर जुए के तीरों का पांसा फेंकते हैं और फ़ालिज उनमें कामयाब हो जाने वाले को कहा जाता है। ‘‘फ़लज अलैहिम’’ या ‘‘फलजहुम’’ उस मौक़े पर इस्तेमाल होता है जब कोई ग़ालिब आ जाता है जैसा के रिज्ज़ ख़्वाँ शाएर ने कहा हैः
‘‘जब मैंने किसी फ़ालिज को देखा के वह कामयाब हो गया’’
  • 9- ‘‘जब अहमरअरबास होता था (दुश्मन का ख़तरा बढ़ जाता था)  तो लोग रसूले अकरम की पनाह में रहा करते थे और कोई शख़्स भी आपसे ज़्यादा दुश्मन से क़रीब नहीं होता था।’’
(((पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का कमाले एहतेराम है के हज़रत अली (अ0) जैसे अश्जअ अरब ने आपके बारे में यह बयान दिया है और आपकी अज़मत व हैबत व शुजाअत का एलान किया है, दूसरा कोई होता तो उसके बरअक्स बयान करता के मैदाने जंग में सरकार हमारी पनाह में रहा करते थे और हम न होते तो आपका ख़ात्मा हो जाता लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) जैसा साहबे किरदार इस अन्दाज़ का बयान नहीं दे सकता है और न यह सोच सकता है। आपकी नज़र में इन्सान कितना ही बलन्द किरदार और साहेबे ताक़त व हिम्मत क्यों न हो जाए, सरकारे दो आलम (अ0) का उम्मती ही शुमार होगा और उम्मती का मर्तबा पैग़म्बर (स0) से बलन्दतर नहीं हो सकता)))
इसका मतलब यह है के जब दुश्मन का ख़तरा बढ़ जाता था और जंग की काट शदीद हो जाती थी तो मुसलमान मैदान में रसूले अकरम (स0) की पनाह तलाश किया करते थे और आप पर नुसरते इलाही का नुज़ूल हो जाता था और मुसलमानों को अम्न व अमान हासिल हो जाता था।
अहमरअरबास दर हक़ीक़त सख़्ती का केनाया है जिसके बारे में मुख़्तलिफ़ अक़वाल पाए जाते हैं और सबसे बेहतर क़ौल यह है के जंग की तेज़ी और गर्मी को आगणन के तश्बीह दी गई है जिसमें गर्मी और सुखऱ्ी दोनों होती हैं और इसका मवीद सरकारे दो आलम (स0) का यह इरशाद है के आपने हुनैन के दिन क़बीलए बनी हवाज़न की जंग में लोगों को जंग करते देखा तो फ़रमाया के अब वतीस गर्म हो गया है यानी आपने मैदाने कारज़ार की गर्म बाज़ारी को आग के भड़कने और उसके शोले से तश्बीह दी है के वतीस उस जगह को कहते हैं जहाँ आग भड़काई जाती है।
  • यह फ़स्ल तमाम हो गई और फिर गुज़िश्ता बाब (अक़वाल 259 के आगे) का सिलसिला शुरू हो गया।
  

Monday, May 30, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 244-255 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 244-255

244-जब ताक़त ज़्यादा हो जाती है तो ख़्वाहिश कम हो जाती है।
(((जब फ़ितरत का यह निज़ाम है के कमज़ोर आदमी में ख़्वाहिश ज़्यादा होती है और ताक़तवर इस क़द्र ख़्वाहिशात का हामिल नहीं होता है तो सियासी दुनिया में भी इन्सान काा तर्ज़े अमल वैसा ही होना चाहिये के जिस क़द्र ताक़त व क़ूवत में इज़ाफ़ा होता जाए अपने को ख़्वाहिशाते दुनिया से बे नियाज़ बनाता जाए और अपने किरदार से साबित कर दे के उसकी ज़िन्दगी निज़ामे फ़ितरत से अलग और जुदागाना नहीं है)))
245- नेमतों के ज़वाल से डरते रहाो के हर बेक़ाबू होकर निकल जाने वाली चीज़ वापस नहीं आया करती है।
246- जज़्बए करम क़राबतदारी से ज़्यादा मेहरबानी का बाएस होता है।
247- जो तुम्हारे बारे में अच्छा ख़याल रखता हो उसके ख़याल को सच्चा करके दिखला दो।

(((ह|य इन्सानी ज़िन्दगी का इन्तेहाई हस्सास  नुक्ता है के इन्सान आम तौर से लोगों को हुस्ने ज़न में मुब्तिला कर उससे ग़लत फ़ायदा उठाने की कोशिश करता है और उसे यह ख़याल पैदा हो जाता है के जब लोग ‘ाराबख़ाने में देख कर भी यही तसव्वुर करेंगे के तबलीग़े मज़हब के लिये गए थे ताो ‘ाराब ख़ाने से फ़ायदा उठा लेना चाहिये हालांके तक़ाज़ाए अक़्ल व दानिश और मुक़तज़ाए ‘ाराफ़त व इन्सानियत यह है के लोग जिस क़द्र ‘ारीफ़ तसव्वुर करते हैं उतनी ‘ाराफ़त का इसाबात करे और उनके हुस्ने ज़न को सूए ज़न में तब्दील न होने  दें)))
248- बेहतरीन अमल वह है जिस पर तुम्हें अपने नफ़्स को मजबूर करना पड़े।
(((इन्सान तमाम आमाल को नफ़्स की ख़्वाहिश के मुताबिक़ अन्जाम देगा तो एक दिन नफ़्स का ग़ुलाम होकर रह जाएगा लेहाज़ा ज़रूरत है के ऐसे अमल अन्जाम देता रहे जहां नफ़्स पर जब्र करना पड़े और उसे इसकी औक़ात से आश्ना बनाता रहे तााके उसके हौसले इस क़द्र बलन्द न हाो जाएं के इन्सान को मुकम्मल तौर पर अपनी गिरफ़्त में ले ले और फिर निजात का कोई रास्ता न रह जाए।
249- मैंने परवरदिगार को इरादों के टूट जाने, नीयतों के बदल जाने और हिम्मताों के पस्तत हो जाने से पहचाना है।
250- दुनिया की तल्ख़ी आख़ेरत की ‘ाीरीनी है और दुनिया की ‘ाीरीनी आख़ेरत की तल्ख़ी है।
251- अल्लाह ने ईमान को लाज़िम क़रार दिया है शिर्क से पाकक करने के लिये, और नमाज़ को वाजिब किया है ग़ुरूर से बाज़ रखने के लिये, ज़कात को रिज़्क़ का वसीला क़रार दिया है और रोज़े को आज़माइशे इख़लास का वसीला, जेहाद को इस्लाम की इज़्ज़त के लिये रखा है और अम्रे बिलमारूफ़ को अवाम की मसलेहत के लिये, नहीं अनिल मुन्किर को बेवक़ूफ़ों को बुराइयों से रोकने के लिये वाजिब किया है और सिलए रहम अदद में इज़ाफ़ा करने के लिये, क़सास ख़ून के तहफ़्फ़ुज़ का वसीला है और हुदूद का क़याम मोहर्रमात की अहमियत के समझाने का ज़रिया, ‘ाराब ख़्वारी को अक़्ल की हिफ़ाज़त के लिये हराम क़रार दिया है और चोरी से इज्तेनाब को इफ़त की हिफ़ाज़त के लिये लाज़िम क़रार दिया है। तर्के ज़िना का लज़ूम नसब की हिफ़ाज़त के लिये और तर्के लवात की ज़रूरत नस्ल की  बक़ा के लिये है, गवाहियों को इन्कार के मुक़ाबले में सबूत का ज़रिया क़रार दिया गया है और तर्के कज़्ब को सिद्क़ की ‘ाराफ़त का वसीला ठहरा दिया गया है क़यामे अम्न को ख़तरों से तहफ़्फ़ुज़ के लिये रखा  गया है और इमामत को मिल्लत की तन्ज़ीम का वसीला क़रार दिया गया है और फ़िर इताअत को अज़मते इमामत की निशानी क़रार दिया गया है।
(((यह इस्लाम का आलमे इन्सानियत पर उमूमी एहसान है के उसने अपने क़वानीन के ज़रिये इन्सानी आबादी को बढ़ाने का इन्तेज़ाम किया है और फ़िर हराम ज़ादों की दर आमद को रोक दिया है। ताके आलमे इन्सानियत में ‘ारीफ़ अफ़राद पैदा हों और यह आलम हर क़िस्म की बरबादी और तबाहकारी से महफ़ूज़ रहे, इसके बाद इसका सिन्फ़े निसवां पर ख़ुसूसी एहसान यह है के इसने औरत के अलावा जिन्सी तस्कीन के हर रास्ते को बन्द कर दिया है, खुली हुई बात है के इन्सान में जब जिन्सी हैजान पैदा होता है तो उसे औरत की ज़रूरत का एहसास पैदा होता है और किसी भी तरीक़े से ज बवह हैजानी माद्दा निकल जाता है तो किसी मिक़दार में सुकून हासिल हो जाता है और जज़्बात का तूफ़ान रूक जाता है, अहले दुनिया ने इस माद्दे के एख़राज के मुख़्तलिफ़ तरीक़े ईजाद किये हैं अपनी जिन्स का कोई मिल जाता है तो हम जिन्सी से तस्कीन हासिल कर लेते हैं और अगर कोई नहीं मिलता है तो ख़ुदकारी का अमल अन्जाम दे लेते हैं और इस तरह औरत की ज़रूरत से बेनियाज़ हो जाते हैं और यही वजह है के आज आज़ाद मुआशरों में औरत अज़ो मोअतल होकर रह गई है और हज़ार वसाएल इख़्तेयार करने के बाद भी इसके तलबगारों की फ़ेहरिस्त कम से कमतर होती जा रही है। इस्लाम ने इस ख़तरनाक सूरतेहाल से मुक़ाबला करने के लिये मुजामेअत के अलावा हर वसीलए तस्कीन को हराम कर दिया है ताके मर्द औरत के वजूद से बेनियाज़ न होने पाए और औरत का वजूद मुआशरे में ग़़ैर ज़रूरी न क़रार पा जाए। अफ़सोस के इस आज़ादी और अय्याशी की मारी हुई दुनिया में इस पाकीज़ा तसव्वुर का क़द्रदान कोई नहीं है और सब इस्लाम पर औरत की नाक़द्री का इल्ज़ाम लगाते हैं, गोया उनकी नज़र में उसे खिलौना बना लेना और खेलने के बाद फेंक देना ही सबसे बड़ी क़द्रे ज़ाती है।)))
252- किसी ज़ालिम से क़सम लेना हो तो इस तरह क़सम लो के वह परवरदिगार की ताक़त और क़ूवत से बेज़ार है अगर इसका बयान सही न हो के अगर इस तह झूठी क़सम खाएगा तो फ़ौरन मुब्तिलाए अज़ाब हो जाएगा आर अगर ख़ुदाए वहदहू लाशरीक के नाम की क़सम खाई तो अज़ाब में उजलत न होगी के बहरहाल तौहीदे परवरदिगार का इक़रार कर लिया।
253- फ़रज़न्द्र आदम (अ0)! अपने माल में अपना वसी ख़ुद बन और वह काम ख़ुद अन्जाम दे जिसके बारे में उम्मीद रखता है के लोग तेरे बाद अन्जाम दे देंगं।
254- ग़ुस्सा जुनून की एक क़िस्म है के ग़ुस्सावर को बद में पशेमान होना पड़ता है और प्शेमान न हो तो वाक़ेअन उसका जुनून मुस्तहकम है।
255-बदन की सेहत का एक ज़रिया हसद की क़िल्लत भी है।

Saturday, May 28, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 203-243 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 203-243

203- ख़बरदार किसी शुक्रिया अदा न करने वाले की नालायक़ी तुम्हें कारे ख़ैर से बद्दिल न बना दे, हो सकता है के तुम्हारा शुक्रिया वह अदा कर दे जिसने इस नेमत से कोई फ़ायदा भी नहीं उठाया है और जिस क़द्र कुफ्ऱाने नेमत करने वाले ने तुम्हारा हक़ ज़ाया किया है उस शुक्रिया अदा करने वाले के शुक्रिया के बराबर हो जाए और वैसे भी अल्लाह नेक काम करने वालों को दोस्त रखता है।
(((अव्वलन तो कारे ख़ैर में शुक्रिया का इन्तेज़ार ही इन्सान के एख़लास को मजरूह बना देता है और उसके अमल का वह मरतबा नहीं रह जाता है जो फ़ीसबीलिल्लाह अमल करने वाले अफ़राद का होता है जिसकी तरफ़ क़ुराने मजीद ने सूराए मुबारका दहर में इशारा किया है इसके बाद अगर इन्सान फ़ितरत से मजबूर है और फ़ितरी तौर पर शुक्रिया का ख़्वाहिशमन्द है तो मौलाए कायनात ने इसका भी इशारा दे दिया के हो सकता है के यह कमी दूसरे अफ़राद की तरफ़ से पूरी हो जाए और वह तुम्हारे कारे ख़ैर की क़द्रदानी करके शुक्रिया की कमी का तदारूक कर दें।)))
204- हर ज़र्फ़ अपने सामान के लिये तंग हो सकता है, लेकिन इल्म का ज़र्फ़ इल्म के एतबार से वसीअतर होता जाता है।
((( इल्म का ज़र्फ़ अक़्ल है और अक़्ल ग़ैर माद्दी होने के एतबार से यूँ भी बेपनाह वुसअत की मालिक है, इसके बाद मालिक ने इसमें यह सलाहियत भी रखी है के जिस क़द्र इल्म में इज़ाफ़ा होता जाएगा उसकी वुसअत किसी मरहले पर तमाम होने वाली नहीं है।)))
205-सब्र करने वाले का उसकी क़ूवते बर्दाश्त पर पहला अज्र यह मिलता है के लोग जाहिल के मुक़ाबले में इसके मददगार हो जाते हैं।
206- अगर तुम वाक़ेअन बुर्दबार नहीं भी हो तो बुर्दबारी का इज़हार करो के बहुत कम ऐसा होता है के कोई किसी क़ौम की शबाहत इख़्तेयार करे और उनमें से न हो जाए।
207- जो अपने नफ़्स का हिसाब करता रहता है वहीं फ़ायदे में रहता है और जो ग़ाफ़िल हो जाता है वहीं ख़सारे में रहता है। ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वाला अज़ाब से महफ़ूज़ रहता है और इबरत हासिल करने वाला साहबे बसीरत होता है, बसीरत वाला फ़हीम होता है और फ़हीम ही आमिल हो जाता है।
208- यह दुनिया मुंहज़ोरी दिखाने के बाद एक दिन हमारी तरफ़ बहरहाल झुकेगी जिस तरह काटने वाली ऊंटनी को अपने बच्चे पर रहम आ जाता है इसके बाद आपने इस आयते करीमा की तिलावत फ़रमाई - ‘‘हम चाहते हैं के इन बन्दों पर एहसान करें जिन्हें रूए ज़मीन में कमज़ोर बना दिया है और उन्हें पेशवा क़रार दें और ज़मीन का वारिस बना दें।
(((यह एक हक़ीक़त है के किसी भी ज़ालिम में अगर अदना इन्सानियत पाई जाती है तो उसे एक दिन मज़लूम की मज़लूमियत का बहरहाल एहसास पैदा हो जाता है और उसके हाल पर मेहरबानी का इरादा करने लगता है चाहे हालात और मसालेह उसे इस मेहरबानी को मन्ज़िले अमल तक लाने से रोक दें, दुनिया कोई ऐसी जल्लाद व ज़ालिम नहीं है जिसे दूसरे को हटाकर अपनी जगह बनाने का ख़याल हो लेहाज़ा एक न एक दिन मज़लूम पर रहम करना है और ज़ालिमों को मन्ज़रे तारीख़ से हटाकर मज़लूमों को कुर्सीए रियासत पर बैठाना है यही मन्शाए इलाही है और यही वादाए क़ुरानी है जिसके खि़लाफ़ का कोई इमकान नहीं पाया जाता है)))
209- अल्लाह से डरो उस शख़्स की तरह जिसने दुनिया छोड़कर दामन समेट लिया हो और दामन समेट कर कोशिश में लग गया हो, अच्छाइयों के लिये वक़्फ़ए मोहलत में तेज़ी के साथ चल पड़ा हो और ख़तरों के पेशे नज़र तेज़ क़दम बढ़ा दिया हो और अपनी क़रारगाह, अपने आमाल के नतीजे और अपने अन्जामकार पर नज़र रखी हो।
(((यह उस अम्र की तरफ़ इशारा है के तक़वा किसी ज़बानी जमाख़र्च का नाम है और न लिबास व ग़िज़ा की सादगी से इबारत है, तक़वा एक इन्तेहाई मन्ज़िले दुश्वार है जहां इन्सान को मुख़्तलिफ़ मराहेल से गुज़रना पड़ता है, पहले दुनिया को ख़ैरबाद कहना होता है, इसके बाद दामने अमल को समेट कर शुरू करना होता है और अच्छाइयों की तरफ़ तेज़ क़दम बढ़ाना पड़ते हैं, अपने अन्जामकार और नतीजए अमल पर निगाह रखना होती है और ख़तरात के दिफ़ाअ का इन्तेज़ाम करना पड़ता है, यह सारे मराहेल तै हो जाएं तो इन्सान मुत्तक़ी और परहेज़गार कहे जाने के क़ाबिल होता है।)))
210-सख़ावत इज़्ज़त व आबरू की निगेहबान है और बुर्दबारी अहमक़ के मुंह का तस्मा है, माफ़ी कामयाबी की ज़कात है और भूल जाना ग़द्दारी करने वाले का बदल है और मशविरा करना ऐने हिदायत है, जिसने अपनी राय ही पर एतमाद कर लिया उसने अपने को ख़तरे में डाल दिया। सब्र हवादिस का मुक़ाबला करता है और बेक़रारी ज़माने की मददगार साबित होती है। बेहतरीन दौलतमन्दी तमन्नाओं का तर्क कर देना है। कितनी ही ग़ुलाम अक़्लें हैं जो रूसा की ख़्वाहिशात के नीचे दबी हुई हैं, तजुर्बात को महफ़ूज़ रखना तौफ़ीक़ की एक क़िस्म है और मोहब्बत एक इक्तेसाबी क़राबत है और ख़बरदार किसी रन्जीदा हो जाने वाले पर एतमाद न करना।
(((इस कलमए हिकमत में मौलाए कायनात (अ0) ने तेरह मुख़्तलिफ़ नसीहतों का ज़िक्र फ़रमाया है और इनमें हर नसीहत इन्सानी ज़िन्दगी का बेहतरीन जौहर है, काश इन्सान इसके एक-एक फ़िक़रे पर ग़ौर करे और ज़िन्दगी की तजुर्बागाह में इस्तेमाल करे तो उसे अन्दाज़ा होगा के एक मुकम्मल ज़िन्दगी गुज़ारने का ज़ाबेता क्या होता है और इन्सार किस तरह दुनिया व आख़ेरत के ख़ैर को हासिल कर लेता है।)))
211-इन्सान का ख़ुदपसन्दी में मुब्तिला हो जाना ख़ुद अपनी अक़्ल से हसद करना है।
212- आँखों के ख़स व ख़ाशाक और रन्जो अलम पर चश्मपोशी करो हमेशा ख़ुश रहोगे।
(((हक़ीक़ते अम्र यह है के दुनिया के हर ज़ुल्म का एक इलाज और दुनिया की हर मुसीबत का एक तोड़ है जिसका नाम है सब्र व तहम्मुल, इन्सान सिर्फ़ यह एक जौहर पैदा कर ले तो बड़ी से बड़ी मुसीबत का मुक़ाबला कर सकता है और किसी मरहले पर परेशान नहीं हो सकता है, रंजीदा व ग़मज़दा ही रहते हैं जिनके पास यह जौहर नहीं होता है और ख़ुशहाल व मुतमईन वही रहते हैं जिनके पास यह जौहर होता है और वह उसे इस्तेमाल करना भी जानते हैं)))
213- जिस दरख़्त की लकड़ी नर्म हो उसकी शाख़ें घनी होती हैं (लेहाज़ा इन्सान को नर्म दिल होना चाहिये)।
(((कितना हसीन तजुर्बए हयात है जिससे एक देहाती इन्सान भी इस्तेफ़ादा कर सकता है के अगर परवरदिगार ने दरख़्तों में यह कमाल रखा है के जिन दरख़्तों की शाख़ों को घना बनाया है उनकी लकड़ी को नर्म बना दिया है तो इन्सान को भी इस हक़ीक़त से इबरत हासिल करनी चाहिये के अगर अपने एतराफ़ मुख़लेसीन का मजमा देखना चाहता है और अपने को बेसाया दरख़्त नहीं बनाना चाहता है तो अपनी तबीयत को नर्म बना दे ताके इसके सहारे लोग इसके गिर्द जमा हो जाएं और इसकी शख़्िसयत एक घनेरे दरख़्त की हो जाए।)))
214-मुख़ालेफ़त सही राय को भी बरबाद कर देती है।
215- जो मन्सब पा लेता है वह दस्त दराज़ी करने लगता है।
((( किस क़द्र अफ़सोस की बात है के इन्सान परवरदिगार की नेमतों का शुक्रिया अदा करने के बजाए कुफ्ऱाने नेमत पर उतर आता है और उसके दिये हुए इक़्तेदार को दस्तदराज़ी में इस्तेमाल करने लगता है हालांके शराफ़त व इन्सानियत का तक़ाज़ा यही था के जिस तरह उसने साहबे क़ुदरत व क़ूवत होने के बाद इसके हाल पर रहम किया है इसी तरह इक़्तेदार पाने के बाद यह दूसरों के हाल पर रहम करे।)))
216-लोगों के जौहर हालात के इन्क़ेलाब में पहचाने जाते हैं।
217- दोस्त का हसद करना मोहब्बत की कमज़ोरी है।
218- अक़्लों की तबाही की बेश्तर मन्ज़िलें हिर्स व तमअ की बिजलियों के नीचे हैं।
((( हिर्स व तमअ की चमक-दमक बाज़ औक़ात अक़्ल की निगाहों को भी खै़रा कर देती है और इन्सान नेक व बद के इम्तियाज़ से महरूम हो जाता है, लेहाज़ा दानिशमन्दी का तक़ाज़ा यही है के अपने को हिर्स व तमअ से दूर रखे और ज़िन्दगी का हर क़दम अक़्ल के ज़ेरे साया उठाए ताके किसी मरहले पर तबाह व बरबाद न होने पाए।)))
219- यह कोई इन्साफ़ नहीं है के सिर्फ़ ज़न व गुमान के एतमाद पर फ़ैसला कर दिया जाए।
220- रोज़े क़यामत के लिये बदतरीन ज़ादे सफ़र बन्दगाने ख़ुदा पर ज़ुल्म है।
221- करीम के बेहतरीन आमाल में जानकर अन्जान बन जाना है।
222- जिसे हया ने अपना लिबास ओढ़ा दिया उसके ऐब को कोई नहीं देख सकता है।
223- ज़्यादा ख़ामोशी हैबत का सबब बनती है और इन्साफ़ से दोस्तों में इज़ाफ़ा होता है, फ़ज़्ल व करम से क़द्र व मन्ज़िलत बलन्द होती है और तवाज़ोअ से नेमत मुकम्मल होती है दूसरों का बोझ उठाने से सरदारी हासिल होती है और इन्साफ़ पसन्द किरदार से दुश्मन पर ग़लबा हासिल किया जाता है, अहमक़ के मुक़ाबले में बुर्दबारी के मुज़ाहेरे से अन्सार व आवान में इज़ाफ़ा होता है।
(((इस नसीहत में भी ज़िन्दगी के सात मसाएल की तरफ़ इशारा किया गया है और यह बताया गया है के इन्सान एक कामयाब ज़िन्दगी किस तरह गुज़ार सकता है और उसे इस दुनिया में बाइज़्ज़त ज़िन्दगी के लिये किन उसूल व क़वानीन को इख़्तेयार करना चाहिये।)))
224- हैरत की बात है के हसद करने वाले जिस्मों की सलामती पर हसद क्यों नहीं करते हैं (दौलतमन्द की दौलत से हसद होता है और मज़दूर की सेहत से हसद नहीं होता है हालांके यह उससे बड़ी नेमत है)।
225- लालची हमेशा ज़िल्लत की क़ैद में गिरफ़्तार रहता है।
(((लालच में दो तरह की ज़िल्लत का सामना करना पड़ता है, एक तरफ़ इन्सान नफ़सियाती ज़िल्लत का शिकार रहता है के अपने को हक़ीर व फ़क़ीर तसव्वुर करता है और अपनी किसी भी दौलत का एहसास नहीं करता है और दूसरी तरफ़ दूसरे अफ़राद के सामने हिक़ारत व ज़िल्लत का इज़हार करता रहता है के शायद इसी तरह किसी को उसके हाल पर रहम आ जाए और वह उसके मुद्दआ के हुसूल की राह हमवार कर दे।)))
226- आपसे ईमान के बारे में दरयाफ़्त किया गया तो फ़रमाया के ईमान दिल का अक़ीदा, ज़बान का इक़रार और आज़ा व जवारेह के अमल का नाम है।
(((अली (अ0) वालों को इस जुमले को बग़ौर देखना चाहिये के कुल्ले ईमान ने ईमान को अपनी ज़िन्दगी के सांचे में ढाल दिया है के जिस तरह आपकी ज़िन्दगी में इक़रार, तस्दीक़ और अमल के तीनों रूख़ पाए जाते थे वैसे ही आप हर साहेबे ईमान को इसी किरदार का हामिल देखना चाहते हैं और इसके बग़ैर किसी को साहेबे ईमान तस्लीम करने के लिये तैयार नहीं हैं और खुली हुई बात है के बेअमल अगर साहबे ईमान नहीं हो सकता है तो कुल्ले ईमान का शीया और उनका मुख़लिस कैसे हो सकता है।)))
227- जो दुनिया के बारे में रन्जीदा होकर सुबह करे वह दरहक़ीक़त क़ज़ाए इलाही से नाराज़ है और जो सुबह उठते ही किसी नाज़िल होने वाली मुसीबत का शिकवा शुरू कर दे उसने दरहक़ीक़त परवरदिगार की शिकायत की है, जो किसी दौलतमन्द के सामने दौलत की बिना पर झुक जाए उसका दो तिहाई दीन बरबाद हो गया, और जो शख़्स क़ुरान पढ़ने के बावजूद मरकर जहन्नम वासिल हो जाए गोया उसने आयाते इलाही का मज़ाक़ उड़ाया है, जिसका दिल मोहब्बते दुनिया में वारफ़ता हो जाए उसके दिल में यह तीन चीज़ें पेवस्त हो जाती हैं- वह ग़म जो उससे जुदा नहीं होता है, वह लालच जो उसका पीछा नहीं छोड़ती है और वह उम्मीद जिसे कभी हासिल नहीं कर सकता है।
((( इस मक़ाम पर अज़ीम नुकाते ज़िन्दगी की तरफ़ इशारा किया गया है लेहाज़ा इन्सान को उनकी तरफ़ मुतवज्जेह रहना चाहिये और सब्र व शुक्र के साथ ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिये, न शिकवा व फ़रयाद शुरू कर दे और न दौलत की ग़ुलामी पर आमादा हो जाए, क़ुरान पढ़े तो उस पर अमल भी करे और दुनिया में रहे तो उससे होशियार भी रहे)))
228- क़नाअत से बड़ी कोई सल्तनत और हुस्ने एख़लाक़ से बेहतर कोई नेमत नहीं है, आपसे दरयाफ़्त किया गया के ‘‘हम हयाते तय्यबा इनायत करेंगे।’’ इस आयत में हयाते तय्यबा से मुराद क्या है? फ़रमाया क़नाअत।
229- जिसकी तरफ़ रोज़ी का रूख़ हो उसके साथ शरीक हो जाओ के यह दौलतमन्दी पैदा करने का बेहतरीन ज़रिया और ख़ुश नसीबी का बेहतरीन क़रीना है।
230 आयते करीमा ‘‘इन्नल्लाहा या मोरो बिल अद्ल’’ में अद्ल इन्साफ़ है और एहसान फ़ज़्ल व करम।
(((हज़रत उस्मान बिन मज़ऊन का बयान है के मेरे इस्लाम में इस्तेहकाम उस दिन पैदा हुआ जब यह आयते करीमा नाज़िल हुई और मैंने जनाबे अबूतालिब से इस आयत का ज़िक्र किया और उन्होंने फ़रमाया के मेरा फ़रज़न्द मोहम्मद (स0) हमेशा बलन्दतरीन एख़लाक़ की बातें करता है लेहाज़ा इसका इत्तेबाअ और इससे हिदायत हासिल करना तमाम क़ुरैश का फ़रीज़ा है।)))
231- जो आजिज़ हाथ से देता है उसे साहेबे इक़तेराद हाथ से मिलता है।
सय्यद रज़ी- जो शख़्स किसी कारे ख़ैर में मुख़्तसर माल भी ख़र्च करता है परवरदिगार उसकी जज़ा को अज़ीम व कसीर बना देता है, यहाँ दोनों ‘‘यद’’ से मुराद दोनों नेमतें हैं, बन्दे की नेमत को यदे क़सीरा कहा गया है और ख़ुदाई नेमत को यदे तवीला, इसलिये के अल्लाह की नेमतें बन्दों के मुक़ाबले में हज़ारों गुना ज़्यादा होती हैं और वही तमाम नेमतों की असल और सबका मरजअ व मन्शा होती हैं।
232- अपने फ़रज़न्द इमाम हसन (अ0) से फ़रमाया- तुम किसी को जंग की दावत न देना लेकिन जब कोई ललकार दे तो फ़ौरन जवाब दे देना के जंग की दावत देने वाला बाग़ी होता है और बाग़ी बहरहाल हलाक होने वाला है।
(((इस्लाम का तवाज़ुन अमल यही है के जंग में पहल न की जाए और जहां तक मुमकिन हो उसको नज़रअन्दाज़ किया जाए लेकिन इसके बाद अगर दुश्मन जंग की दावत दे दे तो उसे नज़र अन्दाज़ भी न किया जाए के इस तरह उसे इस्लाम की कमज़ोरी का एहसास पैदा हो जाएगा और उसके हौसले बलन्द हो जाएंगे, ज़रूरत इस बात की है के उसे यह महसूस करा दिया जाए के इस्लाम कमज़ोर नहीं है लेकिन पहल करना इसके एख़लाक़ी उसूल व आईन के खि़लाफ़ है)))
233- औरतों की बेहतरीन ख़सलतें जो मर्दों की बदतरीन ख़सलतें शुमार होती हैं, उनमें ग़ुरूर, बुज़दिली और बुख़ल है के औरत अगर मग़रूर होगी तो कोई उस पर क़ाबू न पा सकेगा और अगर बख़ील होगी तो अपने और अपने शौहर के माल की हिफ़ाज़त करेगी और अगर बुज़दिल होगी तो हर पेश आने वाले ख़तरे से ख़ौफ़ज़दा रहेगी।
(((यह तफ़सील इस अम्र की तरफ़ इशारा है के यह तीनों सिफ़ात उन्हीं बलन्दतरीन मक़ासिद की राह में महबूब हैं वरना ज़ाती तौर पर न ग़ुरूर महबूब हो सकता है और न बुख़ल व बुज़दिली। हर सिफ़त अपने मसरफ़ के एतबार से ख़ूबी या ख़राबी पैदा करती है। और औरत के यह सिफ़ात इन्हीं मक़ासिद के एतबार से पसन्दीदा हैं मुतलक़ तौर पर यह सिफ़ात किसी के लिये भी पसन्दीदा नहीं हो सकते हैं)))
234- आपसे गुज़ारिश की गई के मर्दे आक़िल की तौसीफ़ फ़रमाएं तो फ़रमाया के आक़िल वह है जो हर शै को उसकी जगह पर रखता है, अर्ज़ किया गया फिर जाहिल की तारीफ़ क्या है- फ़रमाया यह तो मैं बयान कर चुका।
सय्यद रज़ी - मक़सद यह है के जाहिल वह है जो हर शै को बेमहल रखता है और इसका बयान न करना ही एक तरह का बयान है के वह आक़िल की ज़द है।
235-ख़ुदा की क़सम यह तुम्हारी दुनिया मेंरी नज़र में कोढ़ी के हाथ में सुअर की हड्डी से भी बदतर है।
(((एक तो सुअर जैसे नजिसुलऐन जानवर की हड्डी और वह भी कोढ़ी इन्सान के हाथ में। इससे ज़्यादा नफ़रत अंगेज़ शै दुनिया में क्या हो सकती है। अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इस ताबीर से इस्लाम और अक़्ल दोनों के तालीमात की तरफ़ मुतवज्जो किया है के इस्लाम नजिसुल ऐन से इज्तेनाब की दावत देता है और अक़्ल मोतादी इमराज़ के मरीज़ों से बचने की दावत देती है। ऐसे हालात में अगर कोई शख़्स दुनिया पर टूट पड़े तो न मुसलमान कहे जाने के क़ाबिल है और न साहेबे अक़्ल।)))
236-एक क़ौम सवाब की लालच में इबादत करती है तो यह ताजिरों की इबादत है और एक क़ौम अज़ाब के ख़ौफ़ से इबादत करती है तो यह ग़ुलामों की इबादत है, अस्ल वह क़ौम है जो शुक्रे ख़ुदा के उनवान से उबादत करती है और यही आज़ाद लोगों की इबादत है।
237- औरत सरापा शर है और इसकी सबसे बड़ी बुराई यह है के इसके बग़ैर काम भी नहीं चल सकता है।
(((बाज़ हज़रात का ख़याल है के हज़रत का यह इशारा किसी ‘‘ख़ास औरत’’ की तरफ़ है वरना यह बात क़रीने क़यास नहीं है के औरत की सिन्फ़ को शर क़रार दिया जाए और उसे इस हिक़ारत की नज़र से देखा जाए ‘‘ला बदमिनहा’’ इस रिश्ते की तरफ़ इशारा हो सकता है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता है और उनके बग़ैर ज़िन्दगी को अधूरा और नामुकम्मल क़रार दिया गया है।
और अगर बात उमूमी है तो औरत का शर होना उसकी ज़ात या उसके किरदार के नुक़्स की बुनियाद पर नहीं है बल्कि उसकी बुनियाद सिर्फ़ उसकी ज़रूरत और उसके सरापा का इन्सानी जिन्दगी पर तसल्लत है के मर्द किसी वक़्त भी उससे बेनियाज़ नहीं हो सकता है और इस तरह अकसर औक़ात उसके सामने सरे तस्लीम ख़म करने के लिये तैयार हो जाता है। ज़रूरत इस बात की है के मर्द उसके अन्दर पाए जाने वाले जज़्बात और एहसासात की संगीनी की तरफ़ मुतवज्जो रहे और यह ख़याल रखे के इसके जज़्बात व ख़्वाहिशात के आगे सिपरअन्दाख़्ता हो जाना पूरे समाज और मुआशरे की तबाही का बाएस हो सकता है। इसके शर होने में एक हिस्सा उसके जज़्बात व ख़्वाहिशात का है और एक हिस्सा उसके वजूद की ज़रूरत का है जिससे कोई इन्सान बेनियाज़ नहीं हो सकता है और किसी वक़्त भी इसके सामने सिपरअन्दाख़्ता हो सकता है।)))
238- जो शख़्स काहेली और सुस्ती से काम लेता है वह अपने हुक़ूक़ को भी बरबाद कर देता है और जो चुग़लख़ोर की बात मान लेता है वह दोस्तों को भी खो बैठता है।
239- घर में एक पत्भर भी ग़स्बी लगा हो तो वह उसकी बरबादी की ज़मानत है।
सय्यद रज़ी - इस कलाम को रसूले अकरम (स0) से भी नक़्ल किया गया है और यह कोई हैरत अंगेज़ बात नहीं है के दोनों का सरचश्माए इल्म एक ही है।
240- मज़लूम का दिन (क़यामत) ज़ालिम के लिये उस दिन से सख़्ततर होता है जो ज़ालिम का मज़लूम के लिये होता है।
241- अल्लाह से डरते रहो चाहे मुख़्तसर ही क्यों न हो और अपने और उसके दरम्यान पर्दा रखो चाहे बारीक ही क्यों न हो।
242- जब जवाबात की कसरत हो जाती है तो अस्ल बात गुम हो जाती है।
243- अल्लाह का हर नेमत में एक हक़ है जो उसे अदा कर देगा अल्लाह उसकी नेमत को बढ़ा देगा और जो कोताही करेगा वह मौजूदा नेमत को भी ख़तरे में डाल देगा।

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 115-202 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 115-202

115- कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें नेकियां देकर गिरफ़्त में लिया जाता है और वह पर्दापोशी ही से धोके में रहते हैं और अपने बारे में अच्छी बात सुनकर धोका खा जाते हैं और देखो अल्लाह ने मोहलत से बेहतर कोई आज़माइश का ज़रिया नहीं क़रार दिया है।

116- मेरे बारे में दो तरह के लोग हलाक हो गए हैं- वह दोस्त जो दोस्ती में ग़ुलू से काम लेते हैं और वह दुश्मन जो दुश्मनी में मुबालेग़ा करते हैं।

 
117- फ़ुरसत का सानेअ कर देन रन्ज व अन्दोह का बाएस होता है।

((((((इन्सानी ज़िन्दगी में ऐसे मक़ामात बहुत कम आते हैं जब किसी काम का मुनासिब मौक़ा हाथ आ जाता है लेहाज़ा इन्सान का फ़र्ज़ है के इस मौक़े से फ़ायदा उठा ले और उसे ज़ाया न होने दे के फ़ुर्सत का निकल जाना इन्तेहाई रन्ज व अन्दोह का बाएस हो जाता है)))
118- दुनिया की मिसाल सांप जैसी है जो छूने में इन्तेहाई नर्म होता है और इसके अन्दर ज़हरे क़ातिल होता है। फ़रेब ख़ोरदा जाहिल इसकी तरफ़ माएल हो जाता है और साहेबे अक़्ल व होश इससे होशियार रहता है।

(((अक़्ल का काम यह है के वह अशया के बातिन पर निगाह रखे और सिर्फ़ ज़ाहिर के फ़रेब में न आए वरना सांप का ज़ाहिर भी इन्तेहाई नर्म व नाज़ुक होता है जबके उसके अन्दर का ज़हर इन्तेहाई क़ातिल और तबाहकुन होता है)))
119- आपसे क़ुरैश के बारे में दरयाफ़्त किया गया तो आपने फ़रमाया के बनी मख़ज़ूम क़ुरैश का महकता हुआ फ़ूल हैं, उनसे गुफ़्तगू भी अच्छी लगती है और उनकी औरतों से रिश्तेदारी भी महबूब है और बनी अब्द शम्स बहुत दूर तक सोचने वाले और अपने पीछे की बातों की रोक थाम करने वाले हैं। लेकिन हम बनी हाशिम अपने हाथ की दौलत के लुटाने और मौत के मैदान में जान देने वाले हैं, वह लोग अदद में ज़्यादा मक्रो फ़रेब में आगे और बदसूरत हैं और हम लोग फ़सीह व बलीग़, मुख़लिस और रौशन चेहरा हैं।

120-इन दो तरह के आमाल में किस क़द्र फ़ासला पाया जाता है, वह अमल जिसकी लज़्ज़त ख़त्म हो जाए और उसका वबाल बाक़ी रह जाए और वह अमल जिसकी ज़हमत ख़त्म हो जाए और अज्र बाक़ी रह जाए।
(((दुनिया व आखि़रत के आमाल का बुनियादी फ़र्क़ यही है के दुनिया के आमाल की लज़्ज़त ख़त्म हो जाती है और आखि़रत में इसका हिसाब बाक़ी रह जाता है और आख़ेरत के आमाल की ज़हमत ख़त्म हो जाती है और इसका अज्र व सवाब बाक़ी रह जाता है)))
121-आपने एक जनाज़े में शिरकत फ़रमाई और एक शख़्स को हंसते हुए देख लिया तो फ़रमाया ‘‘ऐसा मालूम होता है के मौत किसी और के लिये लिखी गई है और यह हक़ किसी दूसरे पर लाज़िम क़रार दिया गया है और गोया के जिन मरने वालों को हम देख रहे हैं वह ऐसे मुसाफ़िर हैं जो अनक़रीब वापस आने वाले हैं के इधर हम उन्हें ठिकाने लगाते हैं और उधर उनका तरका खाने लगते हैं जैसे हम हमेशा रहने वाले हैं, इसके बाद हमने हर नसीहत करने वाले मर्द और औरत को भुला दिया है और हर आफ़त व मुसीबत का निशाना बन गए हैं।’’

(((इन्सान की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है के वह किसी मरहले पर इबरत हासिल करने के लिये तैयार नहीं होता है और हर मन्ज़िल पर इस क़द्र ग़ाफ़िल हो जाता है जैसे न इसके पास देखने वाली आंख है और न समझने वाली अक़्ल, वरना इसके मानी क्या हैं के आगे-आगे जनाज़ा जा रहा है और पीछे लोग हंसी मज़ाक़ कर रहे हैं या सामने मय्यत को क़ब्र में उतारा जा रहा है और हाज़िरीने कराम दुनिया के सियासी मसाएल हल कर रहे हैं, यह सूरते हाल इस बात की अलामत है के इन्सान बिल्कुल ग़ाफ़िल हो चुका है और उसे किसी तरह का होश नहीं रह गया है।)))
122-ख़ुशाबहाल उसका जिसने अपने अन्दर तवाज़ोह की अदा पैदा की, अपने कस्ब को पाकीज़ा बना लिया, अपने बातिन को नेक कर लिया, अपने एख़लाक़ को हसीन बना लिया, अपने माल के ज़्यादा हिस्से को राहे ख़ुदा में ख़र्च कर दिया और अपनी ज़बानदराज़ी पर क़ाबू पा लिया। अपने शर को लोगों से दूर रखा और सुन्नत को अपनी ज़िन्दगी में जगह दी और बिदअत से कोई निस्बत नहीं रखी।
सय्यद रज़ी- बाज़ लोगों ने इस कलाम को रसूले अकरम (स0) के हवाले से भी बयान किया है जिस तरह के इससे पहले वाला कलामे हिकमत है।

123- औरत का ग़ैरत करना कुफ्ऱ है और मर्द का ग़ुयूर होना ऐने ईमान है।
(((इस्लाम ने अपने मख़सूस मसालेह के तहत मर्द को चार शादियों की इजाज़त दी है और इसी को आलमी मसाएल का हल क़रार दिया है लेहाज़ा किसी औरत को यह हक़ नहीं है के वह मर्द की दूसरी शादी पर एतराज़ करे या दूसरी औरत से हसद और बेज़ारी का इज़हार करे के यह बेज़ारी दरहक़ीक़त उस दूसरी औरत से नहीं है इस्लाम के क़ानूने अज़वाज से है और क़ानूने इलाही से बेज़ारी और नफ़रत का एकसास करना कुफ्ऱ है इस्लाम नहीं है।
इसके बरखि़लाफ़ औरत को दूसरी शादी की इजाज़त नहीं दी गई है लेहाज़ा शौहर का हक़ है के अपने होते हुए दूसरे शौहर के तसव्वुर से बेज़ारी का इज़हार करे और यही उसके कमाले हया व ग़ैरत और कमाले इस्लाम व ईमान के मुरादिफ़ है।)))

124-मैं इस्लाम की वह तारीफ़ कर रहा हूँ जो मुझसे पहले कोई नहीं कर सका है, इस्लाम सुपुर्दगी है और सुपुर्दगी यक़ीन, यक़ीन तस्दीक़ है और तस्दीक़ इक़रार, इक़रार अदाए फ़र्ज़ है और अदाए फ़र्ज़ अमल।
125- मुझे बख़ील के हाल पर ताज्जुब होता है के उसी फ़क्ऱ में मुब्तिला हो जाता है जिससे भाग रहा है और फिर उस दौलतमन्दी से महरूम हो जाता है जिसको हासिल करना चाहता है, दुनिया में फ़क़ीरों जैसी ज़िन्दगी गुज़ारता है और आख़ेरत में मालदारों जैसा हिसाब देना पड़ता है, इसी तरह मुझे मग़रूर आदमी पर ताज्जुब होता है के जो कल नुत्फ़ा था और कल मुरदार हो जाएगा और फ़िर अकड़ रहा है, मुझे उस शख़्स के बारे में भी हैरत होती है जो वजूदे ख़ुदा में शक करता है हालांके मख़लूक़ाते ख़ुदा को देख रहा है और उसका हाल भी हैरतअंगेज़ है जो मौत को भूला हुआ है हालोके मरने वालों को बराबर देख रहा है, मुझे उसके हाल पर भी ताज्जुब होता है जो आख़ेरत के इमकान का इन्कार कर देता है हालांके पहले वजूद का मुशाहेदा कर रहा है, और उसके हाल पर भी हैरत है जो फ़ना हो जाने वाले घर को आबाद कर रहा है और बाक़ी रह जाने वाले घर को छोड़े हुए है।

126- जिसने अमल में कोताही की वह रंज व अन्दोह में बहरहाल मुब्तिला होगा और अल्लाह को अपने बन्दे की कोई परवाह नहीं है जिसके जान व माल में अल्लाह का कोई हिस्सा न हो।
(((बुख़ल और बुज़दिली इस बात की अलामत है के इन्सान अपने जान व माल में से कोई हिस्सा अपने परवरदिगार को नहीं देना चाहता है और खुली हुई बात है के जब बन्दा मोहताज होकर मालिक से बेनियाज़ होना चाहता है तो मालिक को उसकी क्या ग़र्ज़ है, वह भी क़तअ ताल्लुक़ कर लेता है।)))

127- सर्दी के मौसम से इब्तिदा में एहतियात करो और आखि़र में इसका ख़ैर मक़दम करो के इसका असर बदन पर दरख़्तों के पत्तों जैसा होता है के यह मौसम इब्तिदा में पत्तों को झुलसा देता है और आखि़र में शादाब बना देता है।
128- अगर ख़़ालिक़ की अज़मत का एहसास पैदा हो जाएगा तो मख़लूक़ात ख़ुद ब ख़ुद निगाहों से गिर जाएगी।

129- सिफ़्फ़ीन से वापसी पर कूफ़े से बाहर क़ब्रिस्तान पर नज़र पड़ गई तो फ़रमाया, ऐ वहशतनाक घरों के रहने वालों! ऐ वीरान मकानात के बाशिन्दों! और तारीक क़ब्रों में बसने वालों, ऐ ख़ाक नशीनों, ऐ ग़ुरबत, वहदत और वहशत वालों! तुम हमसे आगे चले गए हो और हम तुम्हारे नक़्शे क़दम पर चलकर तुमसे मुलहक़ होने वाले हैं, देखो तुम्हारे मकानात आबाद हो चुके हैं, तुम्हारी बीवियों का दूसरा अक़्द हो चुका है और तुम्हारे अमवाल तक़सीम हो चुके हैं। यह तो हमारे यहाँ की ख़बर है, अब तुम बताओ के तुम्हारे यहाँ की ख़बर क्या है?
इसके बाद असहाब की तरफ़ रूख़ करके फ़रमाया के ‘‘अगर इन्हें बोलने की इजाज़त मिल जाती तो तुम्हें सिर्फ़ यह पैग़ाम देते के बेहतरीन ज़ादे राह तक़वाए इलाही है।’’
(((इन्सानी ज़िन्दगी के दो जुज़ हैं एक का नाम है जिस्म और एक का नाम है रूह और इन्हीं दोनों के इत्तेहाद व इत्तेसाल का नाम है ज़िन्दगी और इन्हीं दोनों की जुदाई का नाम है मौत। अब चूंकि जिस्म की बक़ा रूह के वसीले से है लेहाज़ा रूह के जुदा हो जाने के बाद वह मुर्दा भी हो जाता है और सड़ गल भी जाता है और इसके अज्ज़ा मुन्तशिर होकर ख़ाक में मिल जाते हैं, लेकिन रूह ग़ैर माद्दी होने की बुनियाद पर अपने आलिम से मुलहक़ हो जाती है और ज़िन्दा रहती है यह और बात है के इसके तसर्रूफ़ात इज़्ने इलाही के पाबन्द होते हैं और उसकी इजाज़त के बग़ैर कोई तसर्रूफ़ नहीं कर सकती है, और यही वजह है के मुर्दा ज़िन्दों की आवाज़ सुन लेता है लेकिन जवाब देने की सलाहियत नहीं रखता है। अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इसी राज़े ज़िन्दगी की नक़ाब कुशाई फ़रमाई है के यह मरने वाले जवाब देने के लाएक़ नहीं हैं लेकिन परवरदिगार ने मुझे वह इल्म इनायत फ़रमाया है जिसके ज़रिये मैं यह एहसास कर सकता हूँ के इन मरनेवालों के ला शऊर में क्या है और यह जवाब देने के क़ाबिल होते तो क्या जवाब देते और तुम भी इनकी सूरते हाल को महसूस कर लो तो इस अम्र का अन्दाज़ा कर सकते हो के इनके पास इसके अलावा कोई जवाब और कोई पैग़ाम नहीं है के बेहतरीन ज़ादे राह तक़वा है।)))

130- एक शख़्स को दुनिया की मज़म्मत करते हुए सुना तो फ़रमाया - ऐ दुनिया की मज़म्मत करने वाले और इसके फ़रेब में मुब्तिला होकर इसके महमिलात से धोका खा जाने वाले! तू इसी से धोका भी खाता है और इसी की मज़म्मत भी करता है, यह बता के तुझे इस पर इल्ज़ाम लगाने का हक़ है या इसे तुझ पर इल्ज़ाम लगाने का हक़ है, आखि़र इसने कब तुझसे तेरी अक़्ल को छीन लिया था और कब तुझको धोका दिया था? क्या तेरे आबा-व-अजदाद की कहन्गी की बिना पर गिरने से धोका दिया है या तुम्हारी माओं की ज़ेरे ख़ाक ख़्वाबगाह से धोका दिया है? कितने बीमार हैं जिनकी तुमने तीमारदारी की है और अपने हाथों से उनका इलाज किया है और चाहा है के वह शिफ़ायाब हो जाएं और अतबा (तिब) से रुजू भी किया है। उस सुबह के हंगाम जब न कोई दवा काम आ रही थी और न रोना धोना फ़ायदा पहुंचा रहा था, न तुम्हारी हमदर्दी किसी को फ़ायदा पहुंचा सकी और न तुम्हारा मक़सद हासिल हो सका और न तुम मौत को दफ़ा कर सके। इस सूरते हाल में दुनिया ने तुमको अपनी हक़ीक़त दिखला दी थी और तुम्हें तुम्हारी हलाकत से आगाह कर दिया था (लेकिन तुम्हें होश न आया)। याद रखो के दुनिया बावर करने वाले के लिये सच्चाई का घर है और समझदार के लिये अम्न व आफ़ियत की मन्ज़िल है और नसीहत हासिल करने वाले के लिये नसीहत का मक़ाम है, यह दोस्ताने ख़ुदा के सुजूद की मन्ज़िल और मलाएका-ए आसमान का मसला है। यहीं वहीए इलाही का नुज़ूल होता है और यहीं औलियाए ख़ुदा आखि़रत का सौदा करते हैं जिसके ज़रिये रहमत को हासिल कर लेते हैं और जन्नत को फ़ायदे में ले लेते हैं, किसे हक़ है के इसकी मज़म्मत करे जबके उसने अपनी जुदाई का एलान कर दिया है और अपने फ़िराक़ की आवाज़ लगा दी है और अपने रहने वालों की सनाफी सुना दी है। अपनी बला से इनके इब्तिला का नक़्शा पेश किया है और अपने सुरूर से आखि़रत के सुरूर की दावत दी है, इसकी शाम आफ़ियत में होती है तो सुबह मुसीबत में होती है ताके इन्सान में रग़बत भी पैदा हो और ख़ौफ़ भी। उसे आगाह भी कर दे और होशियार भी बना दे, कुछ लोग निदामत की सुबह इसकी मज़म्मत करते हैं और कुछ लोग क़यामत के रोज़ इसकी तारीफ़ करेंगे, जिन्हें दुनिया ने नसीहत की तो उन्होंने उसे क़ुबूल कर लिया, इसने हक़ाएक़ बयान किये तो उसकी तस्दीक़ कर दी और मोएज़ा किया तो इसके मोएज़ा से असर लिया।
131-परवरदिगार की तरफ़ से एक मलक मुअय्यन है जो हर रोज़ आवाज़ देता है के अय्योहन्नास! पैदा करो तो मरने के लिये, जमा करो तो फ़ना होने के लिये और तामीर करो तो ख़राब होने के लिये (यानी आखि़री अन्जाम को निगाह में रखो)

(((भला उस सरज़मीन को कौन बुरा कह सकता है जिस पर मलाएका का नुज़ूल होता है, औलियाए ख़ुदा सजदा करते हैं, ख़ासाने ख़ुदा ज़िन्दगी गुज़ारते हैं और नेक बन्दे अपनी आक़ेबत बनाने का सामान करते हैं, यह सरज़मीन बेहतरीन सरज़मीन है और यह इलाक़ा मुफ़ीदतरीन इलाक़ा है मगर सिर्फ़ उन लोगों के लिये जो इसका वही मसरफ़ क़रार दें जो ख़ासाने ख़ुदा क़रार देते हैं और इससे इसी तरह आक़ेबत संवारने का काम लें जिस तरह औलियाए ख़ुदा काम लेते हैं, वरना इसके बग़ैर यह दुनिया बला है बला, और इसका अन्जाम तबाही और बरबादी के अलावा कुछ नहीं है।)))
132-दुनिया एक गुज़रगाह है मन्ज़िल नहीं है, इसमें लोग दो तरह के हैं, एक वह शख़्स है जिसने अपने नफ़्स को बेच डाला और हलाक कर दिया और एक वह है जिसने ख़रीद लिया और आज़ाद कर दिया।

133-दोस्त उस वक़्त तक दोस्त नहीं हो सकता जब तक अपने दोस्त के तीन मवाक़े पर काम न आए मुसीबत के मौक़े पर, उसकी ग़ैबत में, और मरने के बाद।
134- जिसे चार चीज़ें दे दी गईं वह चार से महरूम नहीं रह सकता है, जिसे दुआ की तौफ़ीक़ मिल गई वह क़ुबूलियत से महरूम न होगा और जिसे तौबा की तौफ़ीक़ हासिल हो गई वह क़ुबूलियत से महरूम न होगा, अस्तग़फ़ार हासिल करने वाला मग़फ़ेरत से महरूम न होगा और शुक्र करने वाला इज़ाफ़े से महरूम न होगा।

सय्यद रज़ी इस इरशादे गिरामी की तस्दीक़ आयाते क़ुरआनी से होती है के परवरदिगार ने दुआ के बारे में फ़रमाया है ‘‘मुझसे दुआ करो मैं क़ुबूल करूंगा, और अस्तग़फ़ार के बारे में फ़रमाया है ‘‘जो बुराई करने के बाद या अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने के बाद ख़ुदा से तौबा करेगा वह उसे ग़फ़ूरूर्रहीम पाएगा’’
शुक्र के बारे में इरशाद होता है ‘‘अगर तुम शुक्रिया अदा करोगे तो हम नेमतों में इज़ाफ़ा कर देंगे’’ और तौबा के बारे में इरशाद होता है ‘‘तौबा उन लोगों के लिये है जो जेहालत की बिना पर गुनाह करते हैं और फ़िर फ़ौरन तौबा कर लेते हैं, यही वह लोग हैं जिनकी तौबा अल्लाह क़ुबूल कर लेता है और वह हर एक की नीयत से बाख़बर भी है और साहेबे हिकमत भी है।’’

(((इस बेहतरीन बरताव में इताअत, उफ़्फत, तदबीरे मन्ज़िल, क़नाअत, अदम मुतालेबात, ग़ैरत व हया और तलबे रिज़ा जैसी तमाम चीज़ें शामिल हैं जिनके बग़ैर अज़द्वाजी ज़िन्दगी ख़ुशगवार नहीं हो सकती है और दिन भर ज़हमत बरदाश्त करके नफ़्क़ा फ़राहम करने वाला शौहर आसूदा व मुतमईन नहीं हो सकता है)))
135-नमाज़ हर मुत्तक़ी के लिये वसीलए तक़र्रूब है और हज हर कमज़ोर के लिये जेहाद है, हर शै की एक ज़कात होती है और बदन की ज़कात रोज़ा है, औरत का जेहाद शौहर के साथ बेहतरीन बरताव है।

136-रोज़ी के नूज़ूल का इन्तेज़ाम सदक़े के ज़रिये से करो।
137- जिसे मुआवज़े का यक़ीन होता है वह अता में दरियादिली से काम लेता है।

138- ख़ुदाई इमदाद का नुज़ूल बक़द्रे ख़र्च होता है (ज़ख़ीराअन्दोज़ी और फ़िज़ूल ख़र्ची के लिये नहीं)
139- जो मयानारवी से काम लेगा वह मोहताज न होगा।

140- मुताल्लेक़ीन की कमी भी एक तरह की आसूदगी है।
(((इसमें कोई शक नहीं है के तन्ज़ीमे हयात एक अक़्ली फ़रीज़ा है और हर मसले को सिर्फ़ तवक्कल बख़ुदा के हवाले नहीं किया जा सकता है, इस्लाम ने अज़्दवाजी कसरते नस्ल पर ज़ोर दिया है, लेकिन दामन देख कर पैर फैलाने का शऊर भी दिया है लेहाज़ा इन्सान की ज़िम्मेदारी है के इन दोनों के दरम्यान से रास्ता निकाले और इस अम्र के लिये आमादा रहे के कसरते मुताल्लिक़ीन से परेशानी ज़रूर पैदा होगी और फिर परेशानी की शिकायत और फ़रयाद न करे।)))

141-मेल मोहब्बत पैदा करना अक़्ल का निस्फ़ हिस्सा है।
142- हम व ग़म ख़ुद भी आधा बुढ़ापा है।

143- सब्र बक़द्रे मुसीबत नाज़िल होता है और जिसने मुसीबत के मौक़े पर रान पर हाथ मारा, गोया के अपने अमल और अज्र को बरबाद कर दिया। (हम्ज़ सब्र है हंगामा नहीं है, लेकिन यह सब अपनी ज़ाती मुसीबत के लिये है)
144- कितने रोज़ेदार हैं जिन्हें रोज़े से भूक और प्यास के अलावा कुछ नहीं हासिल होता है और कितने आबिद शब ज़िन्दावार हैं जिन्हें अपने क़याम से शब बेदारी और मशक़्क़त के अलावा कुछ हासिल नहीं होता है, होशमन्द इन्सान का सोना और खाना भी क़ाबिले तारीफ़ होता है।

(((मक़सद यह है के इन्सान इबादत को बतौरे रस्म व आदत अन्जाम न दे बल्कि जज़्बाए इताअत व बन्दगी के तहत अन्जाम दे ताके वाक़ेअन बन्दाए परवरदिगार कहे जाने के क़ाबिल हो जाए वरना शऊरे बन्दगी से अलग हो जाने के बाद बन्दगी बे अर्ज़िश होकर रह जाती है।)))
145- अपने ईमान की निगेहदाश्त सदक़े से करो और अपने अमवाल की हिफ़ाज़त ज़कात से करो, बलाओं के तलातुम को दुआओं से टाल दो।

(((सदक़ा इस बात की अलामत है के इन्सान को वादाए इलाही पर एतबार है और वह यह यक़ीन रखता है के जो कुछ उसकी राह में दे दिया है वह ज़ाया होने वाला नहीं है बल्कि दस गुना, सौ गुना, हज़ार गुना होकर वापस आने वाला है और यही कमाले ईमान की अलामत है)))
146- आपका इरशादे गिरामी जनाबे कुमैल बिन ज़ियाद नख़ई से
कुमैल कहते हैं के अमीरूल मोमेनीन (अ0) मेरा हाथ पकड़कर क़ब्रिस्तान की तरफ़ ले गए और जब आबादी से बाहर निकल गए तो एक लम्बी आह खींचकर फ़रमायाः ऐ कुमैल बिन ज़ियाद! देखो यह दिल एक तरह के ज़र्फ़ हैं लेहाज़ा सबसे बेहतरीन वह दिल है जो सबसे ज़्यादा हिकमतों को महफ़ूज़ कर सके। अब तुम मुझसे उन बातों को महफ़ूज़ कर लो, लोग तीन तरह के होते हैं ख़ुदा रसीदा आलिम, राहे निजात पर चलने वाला तालिबे इल्म और अवामुन्नास का वह गिरोह जो हर आवाज़ के पीछे चल पड़ता है और हर हवा के साथ लहराने लगता है, इसने न नूर की रोशनी हासिल की है और न किसी मुस्तहकम सुतून का सहारा लिया है।

(((इल्म व माल के मरातब के बारे में यह नुक्ता भी क़ाबिले तवज्जो है के माल की पैदावार भी इल्म का नतीजा होती है वरना रेगिस्तानी इलाक़ों में हज़ारों साल से पेट्रोल के ख़ज़ाने मौजूद थे और इन्सान इनसे बिलकुल बेख़बर था, इसके बाद जैसे ही इल्म ने मैदाने इन्केशाफ़ात में क़दम रखा, बरसों के फ़क़ीर अमीर हो गए और सदियों के फ़ाक़ाकश साहेबे माल व दौलत शुमार होने लगे)))
ऐ कुमैल! देखो इल्म माल से बहरहाल बेहतर होता है के इल्म ख़ुद तुम्हारी हिफ़ाज़त करता है और माल की हिफ़ाज़त तुम्हें करना पड़ती है। माल ख़र्च करने से कम हो जाता है और इल्म ख़र्च करने से बढ़ जाता है, फ़िर माल के नताएज व असरात भी इसके फ़ना होने के साथ ही फ़ना हो जाते हैं।
ऐ कुमैल बिन ज़ियाद! इल्म की मारेफ़त एक दीन है जिसकी इक़्तेदा की जाती है और उसी के ज़रिये इन्सान ज़िन्दगी में इताअत हासिल करता है और मरने के बाद ज़िक्रे जीमल फ़राहम करता है, इल्म हाकिम होता है और माल महकूम होता है।

कुमैल! देखो माल का ज़ख़ीरा करने वाले जीतेजी हलाक हो गए और साहेबाने इल्म ज़माने की बक़ा के साथ रहने वाले हैं, इनके अजसाम नज़रों से ओझल हो गए हैं लेकिन इनकी सूरतें दिलों पर नक़्श हैं, देखो इस सीने में इल्म का एक ख़ज़ाना है, काश मुझे इसके ठिकाने वाले मिल जाते। हाँ मिले भी तो बाज़ ऐसे ज़हीन जो क़ाबिले एतबार नहीं हैं और दीन को दुनिया का आलाएकार बनाकर इस्तेमाल करने वाले हैं और अल्लाह की नेमतों के ज़रिये उसके बन्दों और उसकी मोहब्बतों के ज़रिये उसके औलिया पर बरतरी जतलाने वाले हैं या हामेलाने हक़ के इताअत गुज़ार तो हैं लेकिन इनके पहलुओं में बसीरत नहीं है और अदना शुबह में भी शक का शिकार हो जाते हैं। याद रखो के न यह काम आने वाले हैं या सिर्फ़ माल जमा करने और ज़ख़ीरा अन्दोज़ी करने के दिलदादा हैं, यह दोनों भी दीन के क़तअन मुहाफ़िज़ नहीं हैं और इनसे क़रीबतरीन शबाहत रखने वाले चरने वाले जानवर होते हैं और इस तरह इल्म हामेलाने इल्म के साथ मर जाता है। लेकिन इसके बाद भी ज़मीन ऐसे शख़्स से ख़ाली नहीं होती है जो हुज्जते ख़ुदा के साथ क़याम करता है चाहे वह ज़ाहिर और मशहूर हो या ख़ाएफ़ और पोशीदा, ताके परवरदिगार की दलीलें और उसकी निशानियां मिटने न पाएं। लेकिन यह हैं ही कितने और कहाँ हैं? वल्लाह इनके अदद बहुत कम हैं लेकिन इनकी क़द्र व मन्ज़िलत बहुत अज़ीम है। अल्लाह उन्हीं के ज़रिये अपने दलाएल व बय्येनात की हिफ़ाज़त करता है ताके यह अपने ही जैसे अफ़राद के हवाले कर दें अैर अपने इमसाल के दिलों में बो दें। उन्हें इल्म ने बसीरत की हक़ीक़त तक पहुंचा दिया है और यह यक़ीन की रूह के साथ घुल मिल गए हैं, उन्होंने इन चीज़ों को आसान बना लिया है जिन्हें राहत पसन्दों ने मुश्किल बना रखा था और उन चीज़ों से उन्स हासिल किया है जिनसे जाहिल वहशत ज़दा थे और इस दुनिया में इन अजसाम के साथ रहे हैं जिनकी रूहें मलाएआला से वाबस्ता हैं, यही रूए ज़मीन पर अल्लाह के ख़लीफ़ा और उसके दीन के दाई हैं। हाए मुझे उनके दीदार का किस क़द्र इश्तियाक़ है!
कुमैल! (मेरी बात तमाम हो चुकी) अब तुम जा सकते हो।
(((यह सही है के हर सिफ़त उसके हामिल के फ़ौत हो जाने से ख़त्म हो जाती है और इल्म भी हामिलाने इल्म की मौत से मर जाता है लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है के इस दुनिया में कोई दौर ऐसा भी आता है जब तमाम अहले इल्म मर जाएं और इल्म का फ़िक़दान हो जाए, इसलिये के ऐसा हो गया तो एतमामे हुज्जत का कोई रास्ता न रह जाएगा और एतमामे हुज्जत बहरहाल एक अहम और ज़रूरी मसला है लेहाज़ा हर दौर में एक हुज्जते ख़ुदा का रहना ज़रूरी है चाहे ज़ाहिर बज़ाहिर मन्ज़रे आम पर हो या ग़ैबत में हो के एतमामे हुज्जत के लिये इसका वजूद ही काफ़ी है, इसके ज़हूर की शर्त नहीं है।)))

147-इन्सान अपनी ज़बान के नीचे छुपा रहता है।
148- जिस शख़्स ने अपनी क़द्र व मन्ज़िलत को नहीं पहचाना वह हलाक हो गया।
149- एक शख़्स ने आपसे मोअज़ का तक़ाज़ा किया तो फ़रमाया ‘‘उन लोगों में न हो जाना जो अमल के बग़ैर आख़ेरत की उम्मीद रखते हैं और तूलानी उम्मीदों की बना पर तौबा को टाल देते हैं, दुनिया में बातें ज़ाहिदों जैसी करते हैं और काम राग़िबों जैसा अन्जाम देते हैं, कुछ मिल जाता है तो सेर नहीं होते हैं और नहीं मिलता है तो क़नाअत नहीं करते हैं, जो दे दिया गया है उसके शुक्रिया से आजिज़ हैं लेकिन मुस्तक़बिल में ज़्यादा के तलबगार ज़रूर हैं, लोगों को मना करते हैं लेकिन ख़ुद नहीं रूकते हैं, और उन चीज़ों का हुक्म देते हैं जो ख़ुद नहीं करते हैं। नेक किरदारों से मोहब्बत करते हैं लेकिन इनका जैसा अमल नहीं करते हैं और गुनहगारों से बेज़ार रहते हैं लेकिन ख़ुद भी उन्हीं में से होते हैं, गुनाहों की कसरत की बिना पर मौत को नापसन्द करते हैं और फिर ऐसे ही आमाल पर क़ाएम भी रहते हैं जिनसे मौत नागवार हो जाती है, बीमार होते हैं तो गुनाहों पर पशेमान हो जाते हैं और सेहतमन्द होते हैं तो फिर लहू व लोआब में मुब्तिला हो जाते हैं। बीमारियों से निजात मिल जाती है तो अकड़ने लगते हैं और आज़माइश में पड़ जाते हैं तो मायूस हो जाते हैं, कोई बला नाज़िल हो जाती है तो बशक्ले मुज़तर दुआ करते हैं और सहूलत व आसानी फ़राहम हो जाती है तो फ़रेब ख़ोरदा होकर मुंह फेर लेते हैं। इनका ऩस उन्हें ख़याली बातों पर आमादा कर लेता है लेकिन वह यक़ीनी बातों में इस पर क़ाबू नहीं पा सकते हैं दूसरों के बारे में अपने से छोटे गुनाह से भी ख़ौफ़ज़दा रहते हैं और अपने लिये आमाल से ज़्यादा जज़ा के उम्मीदवार रहते हैं, मालदार हो जाते हैं तो मग़रूर व मुब्तिलाए फ़ित्ना हो जाते हैं और ग़ुरबतज़दा होते हैं तो मायूस और सुस्त हो जाते हैं। अमल में कोताही करते हैं और सवाल में मुबालेग़ा करते हैं ख़्वाहिशे नफ़्स सामने आ जाती है तो मासियत फ़ौरन कर लेते हैं और तौबा को टाल देते हैं, कोई मुसीबत लाहक़ हो जाती है तो इस्लामी जमाअत से अलग हो जाते हैं। इबरतनाक वाक़ेआत बयान करते हैं लेकिन ख़ुद इबरत हासिल नहीं करते हैं, मौअज़ में मुबालेग़ा से काम लेते हैं लेकिन ख़ुद नसीहत नहीं हासिल करते हैं। क़ौल में हमेशा ऊंचे रहते हैं और अमल में हमेशा कमज़ोर रहते हैं, फ़ना होने वाली चीज़ों में मुक़ाबला करते हैं और बाक़ी रह जाने वाली चीज़ों में सहलअंगारी से काम लेते हैं। वाक़ेई फ़ायदे को नुक़सान समझते हैं और हक़ीक़ी नुक़सान को फ़ायदा तसव्वुर करते हैं।

(((मौलाए कायनात (अ0) के इस इरशादे गिरामी का बग़ौर मुतालेआ करने के बाद अगर दौरे हाज़िर के मोमेनीने कराम, वाएज़ीने मोहतरम, ख़ोतबाए शोला नवा, शोअराए तूफ़ान अफ़ज़ा, सरबराहाने मिल्लत, क़ायदीने क़ौम के हालात का जाएज़ा लिया जाए तो ऐसा मालूम होता है के आप हमारे दौर के हालात का नक़्शा खींच रहे हैं और हमारे सामने किरदार का एक आईना रख रहे हैं जिसमें हर शख़्स अपनी शक्ल देख सकता है और अपने हाले ज़ार से इबरत हासिल कर सकता है।)))
मौत से डरते हैं लेकिन वक़्त निकल जाने से पहले अमल की तरफ़ सबक़त नहीं करते हैं, दूसरों की इस मासियत को भी अज़ीम तसव्वुर करते हैं जिससे बड़ी मासियत को अपने लिये मामूली तसव्वुर करते हैं और अपनी मामूली इताअत को भी कसीर शुमार करते हैं जबके दूसरे की कसीर इताअत को भी हक़ीर ही समझते हैं, लोगों पर तानाज़न रहते हैं और अपने मामले में नर्म व नाज़ुक रहते हैं, मालदारों के साथ लहू व लोआब को फ़क़ीरों के साथ बैठ कर ज़िक्रे ख़ुदा से ज़्यादा दोस्त रखते हों, अपने हक़ में दूसरों के खि़लाफ़ फ़ैसला कर देते हैं और दूसरों के हक़ में अपने खि़लाफ़ फ़ैसला नहीं कर सकते हैं। दूसरों को हिदायत देते हैं और अपने नफ़्स को गुमराह करते हैं, ख़ुद इनकी इताअत की जाती है और ख़ुद मासीयत करते रहते हैं अपने हक़ को पूरा-पूरा ले लेते हैं और दूसरों के हक़ को अदा नहीं करते हैं। परवरदिगार को छोड़कर मख़लूक़ात से ख़ौफ़ खाते हैं और मख़लूक़ात के बारे में परवरदिगार से ख़ौफ़ज़दा नहीं होते हैं।

सय्यद रज़ी- अगर इस किताब में इस कलाम के अलावा कोई दूसरी नसीहत न भी होती तो ही कलाम कामयाब मोअज़त, बलीग़ हिकमत और साहेबाने बसीरत की बसीरत और साहेबाने फिक्रो नज़र की इबरत के लिये काफ़ी था।
(((दौरे हाज़िर का अज़ीमतरीन मेयारे ज़िन्दगी यही है और हर शख़्स ऐसी ही ज़िन्दगी के लिये बेचैन नज़र आता है, काफ़ी हाउस, नाइट क्लब और दीगर लग़्िवयात के मक़ामात पर सरमायादारों की मसाहेबत के लिये हर मतूसत तबक़े का आदमी मरा जा रहा है और किसी को यह शौक़ नहीं पैदा होता है के चन्द लम्हे ख़ानाए ख़ुदा में बैठ कर फ़क़ीरों के साथ मालिक की बारगाह में मुनाजात करे और यह एहसास करे के उसकी बारगाह में सब फ़क़ीर हैं और यह दौलत व इमारत सिर्फ़ चन्द रोज़ा तमाशा है वरना इन्सान ख़ाली हाथ आया है और ख़ाली हाथ ही जाने वाला है, दौलत आक़बत बनाने का ज़रिया थी अगर उसे भी आक़बत की बरबादी की राह पर लगा दिया तो आख़ेरत में हसरत व अफ़सोस के अलावा कुछ हाथ आने वाला नहीं है।)))

150- हर शख़्स का एक अन्जाम बहरहाल होने वाला है चाहे शीरीं हो या तल्ख़।
151- हर आने वाला पलटने वाला है और जो पलट जाता है वह ऐसा हो जाता है जैसे था ही नहीं।

152- सब्र करने वाला कामयाबी से महरूम नहीं हो सकता है चाहे कितना ही ज़माना क्यों न लग जाए।

153- किसी क़ौम के अमल से राज़ी हो जाने वाला भी उसी के साथ शुमार किया जाएगा और जो किसी बातिल में दाखि़ल हो जाएगा उस पर दोहरा गुनाह होगा, अमल का भी गुनाह और राज़ी होने का भी गुनाह।

 
154- अहद व पैमान की ज़िम्मेदारी उनके हवाले करो जो मीख़ों की तरह मुस्तहकम और मज़बूत हों।

155- उसकी इताअत ज़रूर करो जिससे नावाक़फ़ीयत क़ाबिले माफ़ी नहीं है, (यानी ख़ुदाई मन्सबदार)।

 
156- अगर तुम बसीरत रखते हो तो तुम्हें हक़ाएक़ दिखलाए जा चुके हैं और अगर हिदायत हासिल करना चाहते हो तो तुम्हें हिदायत दी जा चुकी है और अगर सुनना चाहते हो तो तुम्हें पैग़ाम सुनाया जा चुका है।

157- अपने भाई को तम्बीह करो तो एहसान करने के बाद और उसके शर का जवाब दो तो लुत्फ़ व करम के ज़रिये।

(((खुली हुई बात है के इन्सान अगर सिर्फ़ तम्बीह करता है और काम नहीं करता है तो उसकी तम्बीह का कोई असर नहीं होता है के दूसरा शख़्स पहले ही बदज़न हो जाता है तो कोई बात सुनने के लिये तैयार नहीं होता है और नसीहत बेकार चली जाती है, इसके बरखि़लाफ़ अगर पहले एहसान करके दिल में जगह बना ले और उसके बाद मासियत करे तो यक़ीनन नसीहत का असर होगा और बात ज़ाया व बरबाद न होगी।)))
158- जिसने अपने नफ़्स को तोहमत के मवाक़े पर रख दिया उसे किसी बदज़नी करने वाले को मलामत करने का हक़ नहीं है।

(((अजीब व ग़रीब बात है के इन्सान उन लोगों से फ़ौरन बेज़ार हो जाता है जो उससे बदगुमानी रखते हैं लेकिन इन हालात से बेज़ारी का इज़हार नहीं करता है उसकी बिना पर बदगुमानी पैदा होती है जबके इन्साफ़ का तक़ाज़ा यह है के पहले बदज़नी के मक़ामात से इज्तेनाब करे और उसके बाद उन लोगों से नाराज़गी का इज़हार करे जो बिला सबब बदज़नी का शिकार हो जाते हैं।)))
159- जो इक़्तेदार हासिल कर लेता है वह जानिबदारी करने लगता है।

160- जो ख़ुदराई से काम लेगा वह हलाक हो जाएगा और जो लोगों से मशविरा करेगा वह उनकी अक़्लों में शरीक हो जाएगा।
161- जो अपने राज़ को पोशीदा रखेगा उसका इख़्तेयार उसके हाथ में रहेगा।

162- फ़क़ीरी सबसे बड़ी मौत है।
163- जो किसी ऐसे शख़्स का हक़ अदा कर दे जो इसका हक़ अदा न करता हो तो गोया उसने उसकी परस्तिश कर ली है।
(((मक़सद यह है के इन्सान के अमल की कोई बुनियाद होनी चाहिये और मीज़ान और मेयार के बग़ैर किसी अमल को अन्जाम नहीं देना चाहिये अब अगर कोई शख़्स किसी के हुक़ूक़ की परवाह नहीं करता है और वह इसके हुक़ूक़ को अदा किये जा रहा है तो इसका मतलब यह है के अपने को इसका बन्दाए बेदाम तसव्वुर करता है और इसकी परस्तिश किये चला जा रहा है।)))

164- ख़ालिक़ की मासियत के ज़रिये मख़लूक़ की इताअत नहीं की जा सकती है।
165- अपना हक़ लेने में ताख़ीर कर देना ऐब नहीं है, दूसरे के हक़ पर क़ब्ज़ा कर लेना ऐब है।
((( इन्सान की ज़िम्मेदारी है के ज़िन्दगी में हुक़ूक़ हासिल करने से ज़्यादा हुक़ूक़ की अदायगी पर तवज्जो दे के अपने हुक़ूक़ को नज़रअन्दाज़ कर देना न दुनिया में बाएसे मलामत है और न आख़ेरत में वजहे अज़ाब है लेकिन दूसरों के हुक़ूक़ पर क़ब्ज़ा कर लेना यक़ीनन बाएसे मज़म्मत भी है और वज्हे अज़ाब व अक़ाब भी है।)))

166- ख़ुद पसन्दी ज़्यादा अमल से रोक देती है।
(((खुली हुई बात है के जब तक मरीज़ को मर्ज़ का एहसास रहता है वह इलाज की फ़िक्र भी करता है लेकिन जिस दिन वरम को सेहत तसव्वुर कर लेता है उस दिन से इलाज छोड़ देता है, यही हाल ख़ुद पसन्दी का है के ख़ुदपसन्दी किरदार का वरम है जिसके बाद इन्सान अपनी कमज़ोरियों से ग़ाफ़िल हो जाता है और उसके शुबह में अमल ख़त्म कर देता है या रफ़्तारे अमल को सुस्त बना देता है और यही चीज़ इसके किरदार की कमज़ोरी के लिये काफ़ी है।)))

167- आखि़रत क़रीब है और दुनिया की सोहबत बहुत मुख़्तसर है।
168- आंखों वालों के लिये सुबह रौशन हो चुकी है।
169- गुनाह का न करना बाद में मदद मांगने से आसानतर है।

((( मसल मशहुर है के परहेज़ करना इलाज करने से बेहतर है के परहेज़ इन्सान को बीमारियों से बचा सकता है और इस तरह उसकी फ़ितरी ताक़त महफ़ूज़ रहती है लेकिन परहेज़ न करने की बिना पर अगर मर्ज़ ने हमला कर दिया तो ताक़त ख़ुद ब ख़ुद कमज़ोर हो जाती है और फिर इलाज के बाद भी वह फ़ितरी हालत वापस नहीं आती है लेहाज़ा इन्सान का फ़र्ज़ है के गुनाहों के ज़रिये नफ़्स के आलूदा होने और तौबा के ज़रिये इसकी ततहीर करने से पहले उसकी सेहत का ख़याल रखे और उसे आलूदा न होने दे ताके इलाज की ज़हमत से महफ़ूज़ रहे।)))
170-अक्सर औक़ात एक खाना कई खानों से रोक देता है।

171- लोग उन चीज़ों के दुश्मन होते हैं जिनसे बेख़बर होते हैं।
172- जो मुख़तलिफ़ आराए का सामना करता है वह ग़लती के मक़ामात को पहचान लेता है।
(((इसका एक मतलब यह भी है के मशविरा करने वाला ग़लतियों से महफ़ूज़ रहता है के उसे किसी तरह के उफ़कार हासिल हो जाते हैं और हर शख़्स के ज़रिये दूसरे की फ़िक्र की कमज़ोरी का भी अन्दाज़ा हो जाता है और इस तरह सही राय इख़्तेयार करने में कोई ज़हमत नहीं रह जाती है।)))

173- जो अल्लाह के लिये ग़ज़ब के सिनान को तेज़ कर लेता है वह बातिल के सूरमाओं के क़त्ल पर भी क़ादिर हो जाता है।
174- जब किसी अम्र से दहशत महसूस करो तो उसमें फान्द पड़ो के ज़्यादा ख़ौफ़ व एहतियात ख़तरे से ज़्यादा ख़तरनाक होती है।

175- रियासत का वसीला वुसअते सद्र है।
176- बद अमल की सरज़न्श के लिये नेक अमल वाले को अज्र व इनआम दो।
(((हमारे मुआशरे की कमज़ोरियों में से एक अहम कमज़ोरी यह है के यहाँ बदकिरदारों पर तन्क़ीद तो की जाती है लेकिन नेक किरदार की ताईद व तौसीफ़ नहीं की जाती है, आप एक दिन ग़लत काम करें तो सारे शहर में हंगामा हो जाएगा लेकिन एक साल तक बेहतरीन काम करें तो कोई बयान करने वाला भी न पैदा होगा, हालांके उसूली बात यह है के नेकी के फैलाने का तरीक़ा सिर्फ़ बुराई पर तन्क़ीद करना नहीं है बल्कि उससे बेहतर तरीक़ा ख़ुद नेकी की हौसला अफ़ज़ाई करना है जिसके बाद हर शख़्स में नेकी करने का शऊर बेदार हो जाएगा और बुराइयों का क़ला क़मा हो जाएगा)))

177-दूसरे के दिल से शर को काट देना है तो पहले अपने दिल से उखाड़कर फेंक दो।
178- हटधर्मी सही राय को भी दूर कर देती है।
179- लालच हमेशा हमेशा की ग़ुलामी है।

(((यह इन्सानी ज़िन्दगी की अज़ीमतरीन हक़ीक़त है के हिर्स व तमअ रखने वाला इन्सान नफ़्स का ग़ुलाम और ख़्वाहिशात का बन्दा हो जाता है और जो शख़्स ख़्वाहिशात की बन्दगी में मुब्तिला हो गया वह किसी क़ीमत पर इस ग़ुलामी से आज़ाद नहीं हो सकता है, इन्सानी ज़िन्दगी की दानिशमन्दी का तक़ाज़ा यह है के इन्सान अपने को ख़्वाहिशाते दुनिया और हिर्स व तमअ से दूर रखे ताके किसी ग़ुलामी में मुब्तिला न होने पाए के यहाँ ‘‘शौक़ हर रंग रक़ीब सरो सामान’’ हुआ करता है और यहाँ की ग़ुलामी से निजात मुमकिन नहीं है।)))
180-कोताही का नतीजा शर्मिन्दगी है और होशियारी का समरह सलामती।

181- हिकमत से ख़ामोशी में कोई ख़ैर नहीं है जिस तरह के जेहालत से बोलने में कोई भलाई नहीं है।
(((इन्सान को हफेऱ् हिकमत का एलान करना चाहिये ताके दूसरे लोग उससे इस्तेफ़ादा करें और हर्फ़े जेहालत से परहेज़ करना चाहिये के जेहालत की बात करने से ख़ामोशी ही बेहतर होती है, इन्सान की इज़्ज़त भी सलामत रहती है और दूसरों की गुमराही का भी कोई अन्देशा नहीं होता है)))
182- जब दो मुख़्तलिफ़ दावतें दी जाएं तो दो में से एक यक़ीनन गुमराही होगी।

183- मुझे जब से हक़ दिखला दिया गया है मैं कभी शक का शिकार नहीं हुआ हूँ।
184- मैंने न ग़लत बयानी की है और न मुझे झूट ख़बर दी गई है, न मैं गुमराह हुआ हूँ और न
मुझे गुमराह किया जा सका है।

185- ज़ुल्म की इब्तिदा करने वाले को कल निदामत से अपना हाथ काटना पड़ेगा।
(((अगर यह दुनिया में हर ज़ुल्म करने वाले का अन्जाम है तो उसके बारे में क्या कहा जाएगा जिसने आलमे इस्लाम में ज़ुल्म की इब्तिदा की है और जिसके मज़ालिम का सिलसिला आज तक जारी है और औलादे रसूले अकरम (स0) किसी आन भी मज़ालिम से महफ़ूज़ नहीं है)))

186-कूच का वक़्त क़रीब आ गया है।
187-जिसने हक़ से मुंह मोड़ लिया वह हलाक हो गया।

188- जिसे सब्र निजात नहीं दिला सकता है उसे बेक़रारी मार डालती है।
((( दुनिया में काम आने वाला सिर्फ़ सब्र है के इससे इन्सान का हौसला भी बढ़ता है और उसे अज्र व सवाब भी मिलता है, बेक़रारी में उनमें से कोई सिफ़त नहीं है और न उससे कोई मसला हल होने वाला है, लेहाज़ा अगर किसी शख़्स ने सब्र को छोड़कर बेक़रारी का रास्ता इख़्तेयार कर लिया तो गोया अपनी तबाही का आप इन्तेज़ाम कर लिया और परवरदिगार की मईत से भी महरूम हो गया के वह सब्र करने वालों के साथ रहता है, जज़अ व फ़ज़अ करेन वालों के साथ नहीं रहता है।)))

189-वाजेबाह! खि़लाफ़त सिर्फ़ सहाबियत की बिना पर मिल सकती है लेकिन अगर सहाबियत और क़राबत दोनों जमा हो जाएं तो नहीं मिल सकती है।
सय्यद रज़ी - इस मानी में हज़रत का यह शेर भी हैः
‘‘अगर तुमने शूरा से इक़्तेदार हासिल किया तो यह शूरा कैसा है जिसमें मुशीर ही सब ग़ायब थे।
और अगर तुमने क़राबत से अपनी ख़ुसूसियत का इज़हार किया है तो तुम्हारा ग़ैर तुमसे ज़्यादा रसूले अकरम (स0) के लिये औला और अक़रब है।’’

190-इन्सान इस दुनिया में वह निशाना है जिस पर मौत अपने तीर चलाती रहती है और वह मसाएब की ग़ारतगरी की जूला निगाह बना रहता है, यहाँ के हर घूंट पर उच्छू है और हर लुक़्मे पर गले में एक फन्दा है इन्सान एक नेमत को हासिल नहीं करता है मगर यह के दूसरी हाथ से निकल जाती है और ज़िन्दगी के एक दिन का इस्तेक़बाल नहीं करता है मगर यह के दूसरा दिन हाथ से निकल जाता है। हम मौत के मददगार हैं और हमारे नफ़्स हलाकत का निशाना हैं, हम कहां से बक़ा की उम्मीद करें जबके शब व रोज़ किसी इमारत को ऊंचा नहीं करते हैं मगर यह के हमले करके उसे मुनहदिम कर देते हैं और जिसे भी यकजा करते हैं उसे बिखेर देते हैं।
(((किसी तरह का कोई इज़ाफ़ा नहीं है बल्कि एक दिन ने जाकर दूसरे दिन के लिये जगह ख़ाली है और इसकी आमद की ज़मीन हमवार की है तो इस तरह इन्सान का हिसाब बराबर ही रह गया, एक दिन जेब में दाखि़ल हुआ और एक दिन जेब से निकल गया और इसी तरह एक दिन ज़िन्दगी का ख़ात्मा हो जाएगा)))

191- फ़रज़न्दे आदम! अगर तूने अपनी ग़िज़ा से ज़्यादा कमाया है तो गोया इस माल में दूसरों का ख़ज़ान्ची है।

(((यह बात तै शुदा है के मालिक का निज़ामे तक़सीम ग़लत नहीं है और उसने हर शख़्स की ताक़त एक जैसी नहीं रखी है तो इसका मतलब यह है के उसने ज़ख़ाएर कायनात में हिस्सा सबका रखा है लेकिन सबमें उन्हें हासिल करने की यकसां ताक़त नहीं है बल्कि एक को दूसरे के लिये वसीला और ज़रिया बना दिया है तो अगर तुम्हारे पास तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा माल आ जाए तो इसका मतलब यह है के मालिक ने तुम्हें दूसरों के हुक़ूक़ का ख़ाज़िन बना दिया है और अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी यह है के इसमें किसी तरह की ख़यानत न करो और हर एक को उसका हिस्सा पहुंचा दो।)))

192- दिलों के लिये रग़बत व ख़्वाहिश, आगे बढ़ना और पीछे हटना सभी कुछ है लेहाज़ा जब मीलान और तवज्जो का वक़्त हो तो उससे काम ले लो के दिल को मजबूर करके काम लिया जाता है तो वह अन्धा हो जाता है।
193-मुझे ग़ुस्सा आ जाए तो मैं उससे तस्कीन किस तरह हासिल करूँ? इन्तेक़ाम से आजिज़ हो जाऊँगा तो कहा जाएगा के सब्र करो और इन्तेक़ाम की ताक़त पैदा कर लूँगा तो कहा जाएगा के काश माफ़ कर देते (ऐसी हालत में ग़ुस्से का कोई फ़ायदा नहीं है।

(((आप इस इरशादेगिरामी के ज़रिये लोगों को सब्र व तहम्मुल की तलक़ीन करना चाहते हैं के इन्तेक़ाम आम तौर से क़ाबिले तारीफ़ नहीं होता है, इन्सान मक़ाम इन्तेक़ाम में कमज़ोर पड़ जाता है तो लोग मलामत करते हैं के जब ताक़त नहीं थी तो इन्तेक़ामक लेने की ज़रूरत ही क्या थी और ताक़तवर साबित होता है तो कहते हैं के कमज़ोर आदमी से क्या इन्तेक़ाम लेना है, मुक़ाबला किसी बराबर वाले से करना चाहिये था, ऐसी सूरत में तक़ाज़ाए अक़्ल व मन्तक़ यही है के इन्सान सब्र व तहम्मुल से काम ले और जब तक इन्तेक़ाम फ़र्ज़े शरई न बन जाए उस वक़्त तक इसका इरादा भी न करे और फिर जब मालिके कायनात इन्तेक़ाम लेने वाला मौजूद है तो इन्सान को इस क़द्र ज़हमत बरदाश्त करने की क्या ज़रूरत है)))
194- एक मज़बला से गुज़रते हुए फ़रमाया - ‘‘यही वह चीज़ है जिसके बारे में बुख़ल करने वालों ने बुख़ल किया था’’ या दूसरी रिवायत की बिना पर ‘‘जिसके बारे में कल एक दूसरे से रश्क कर रहे थे, (यह है अन्जामे दुनिया और अन्जामे लज़्ज़ाते दुनिया)

195- जो माल नसीहत का सामान फ़राहम कर दे वह बरबाद नहीं हुआ है।
196- यह दिल इसी तरह उकता जाते हैं जिस तरह बदन, लेहाज़ा इनके लिये लतीफ़ तरीन हिकमतें फ़राहम करो।

197-जब आपने ख़वारिज का यह नारा सुना के ‘‘ख़ुदा के अलावा किसी के लिये हुक्म नहीं है’’ तो फ़रमाया के ‘‘यह कलमए हक़ है’’ लेकिन इससे बातिल मानी मुराद लिये गए हैं।
198- बाज़ारी लोगों की भीड़ भाड़ के बारे में फ़रमाया के - यही वह लोग हैं जो मुजतमा हो जाते हैं तो ग़ालिब आ जाते हैं और मुन्तशिर हो जाते हैं तो पहचाने भी नहीं जाते हैं।
और बाज़ लोगों का कहना है के हज़रत ने इस तरह फ़रमाया था के - जब मुज्तमा हो जाते हैं तो नुक़सानदेह होते हैं और जब मुन्तशिर हो जाते हैं तभी फ़ायदामन्द होते हैं। तो लोगों ने अर्ज़ की के इज्तेमाअ में नुक़सान तो समझ में आ गया लेकिन इन्तेशार में फ़ायदे के क्या मानी हैं? तो फ़रमाया के सारे कारोबार वाले अपने कारोबार की तरफ़ पलट जाते हैं और लोग उनसे फ़ायदा उठा लेते हैं जिस तरह मेमार अपनी इमारत की तरफ़ चला जाता है, कपड़ा बुनने वाला कारख़ाने की तरफ़ चला जाता है और रोटी पकाने वाला तनूर की तरफ़ पलट जाता है।

(((इसमें कोई ‘ाक नहीं है के अवामी ताक़त बहुत बड़ी ताक़त होती है और दुनिया का कोई निज़ाम इस ताक़त के बग़ैर कामयाब नहीं हो सकता है और इसीलिये मौलाए कायनात ने भी मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर इनकी अहमियत की तरफ़ इशारा किया है और इन पर ख़ास तवज्जो देने की हिदायत की है, लेकिन अवामुन्नास की एक बड़ी कमज़ोरी यह है के इनकी अकसरीयत अक़्ल व मन्तक़ से महरूम और जज़्बात व अवातिफ़ से मामूर होती है और इनके अकसर काम सिर्फ़ जज़्बात व एहसासात की बिना पर अन्जाम पाते हैं और इस तरह जो निज़ाम भी इनके जज़्बात व ख़्वाहिशात की ज़मानत दे देता है वह फ़ौरन कामयाब हो जाता है और अक़्ल व मन्तक़ का निज़ाम पीछे रह जाता है लेहाज़ा हज़रत ने चाहा के इस कमज़ोरी की तरफ़ भी मुतवज्जो कर दिया जाए ताके अरबाबे हल व ओक़द हमेशा उनके जज़्बाती और हंगामी वजूद पर एतमाद न करें बल्कि इसकी कमज़ोरियों पर भी निगाह रखें।)))
199-आपके पास एक मुजरिम को लाया गया जिसके साथ तमाशाइयों का हुजूम था तो फ़रमाया के ‘‘उन चेहरों पर फिटकार हो जो सिर्फ़ बुराई और रूसवाई के मौक़े पर नज़र आते हैं।
(((आम तौर से इन्सानों का मिज़ाज यही होता है के जहां किसी बुराई का मन्ज़र आता है फ़ौरन उसके गिर्द जमा हो जाते हैं, मस्जिद के नमाज़ियों का देखने वाला कोई नहीं होता है लेकिन क़ैदी का तमाशा देखने वाले हज़ारों निकल आते हैं और इस तरह इस इज्तेमाअ का कोई मक़सद भी नहीं होता, आापका मक़सद यह है के यह इज्तेमाअ इबरत हासिल करने के लिये होता तो कोई बात नहीं थी मगर अफ़सोस के यह सिर्फ तमाशा देखने के लिये होता है और इन्सान के वक़्त का इससे कहीं ज़्यादा अहम मसरफ़ मौजूद है लेहाज़ा उसे इससी मसरफ़ में सर्फ़ करना चाहिये।)))
200- हर इन्सान के साथ दो मुहाफ़िज़ फ़रिश्ते रहते हैं लेकिन जब मौत का वक़्त आा जाता है तो दोनों साथ छोड़ कर चले जाते हैं गोया के मौत ही बेहतरीन सिपर हैं।
201-जब तल्हा व ज़ुबैर ने यह तक़ाज़ा किया के हम बैअत कर सकते हैं लेकिन हमें ‘ारीके कार बनाना पड़ेगा? तो फ़रमाया के हरगिज़ नहीं, तुम सिर्फ़ क़ूवत पहुंचाने और हाथ बटाने में ‘ारीक हो सकते हो और आजिज़ी और सख़्ती के मौक़े पर मददगार बन सकते हो।
202- लोगों! उस ख़ुदा से डरो जो तुम्हारी हर बात को सुनता है और हर राज़े दिल का जानने वाला है और इसस मौत की तरफ़ सबक़त करो जिससे भागना भी चाहो तो वह तुम्हें पा लेगी और ठहर जाओगे तो तुम्हारी गिरफ्त में ले लेगी और तुम उसे भूल भी जाओगे तो वह तुम्हें याद रखेगी।

Thursday, May 26, 2011

Nahjul Balagha Hindi Aqwal 93-114 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 93-114

93-आपसे ख़ैर के बारे में सवाल किया गया? तो फ़रमाया के ख़ैर, माल और औलाद की कसरत नहीं है, ख़ैर इल्म की कसरत और हिल्म की अज़मत है और यह है के लोगों पर इबादते परवरदिगार से नाज़ करो, लेहाज़ा अगर नेक काम करो तो अल्लाह का शुक्र बजा लाओ और बुरा काम करो तो अस्तग़फ़ार करो, और याद रखो के दुनिया में ख़ैर सिर्फ़ दो तरह के लोगों के लिये है, वह इन्सान जो गुनाह करे तो तौबा से उसकी तलाफ़ी कर ले और वह इन्सान जो नेकियों में आगे बढ़ता जाए।

94- तक़वा के साथ कोई अमल क़लील नहीं कहा जा सकता है, के जो अमल भी क़ुबूल हो जाए उसे क़लील किस तरह कहा जा सकता है।
(((यह उस आयते करीमा की तरफ़ इशारा है के परवरदिगार सिर्फ़ मुत्तक़ीन के आमाल को क़ुबूल करता है, और इसका मक़सद यह है के अगर इन्सान तक़वा के बग़ैर आमाल अन्जाम दे तो यह आमाल देखने में बहुत नज़र आएंगे लेकिन वाक़ेअन कसीर कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं, और इसके बरखि़लाफ़ अगर तक़वा के साथ अमल अन्जाम दे तो देखने में शायद वह अमल क़लील दिखाई दे लेकिन वाक़ेअन क़लील न होगा के दरजए क़ुबूलियत पर फ़ाएज़ हो जाने वाला अमल किसी क़ीमत पर क़लील नहीं कहा जा सकता है।)))


95- लोगों में अम्बिया से सबसे ज़्यादा क़रीब वह लोग होते हैं जो सबसे ज़्यादा उनके तालीमात से बाख़बर हों, यह कहकर आपने आयत शरीफ़ की तिलावत फ़रमाई ‘‘इब्राहीम (अ0) से क़रीबतर वह लोग हैं जो उनकी पैरवी करें, और यह पैग़म्बर (स0) है और साहेबाने ईमान हैं।’’ इसके बाद फ़रमाया के पैग़म्बर (स0) का दोस्त वही है जो उनकी इताअत करे, चाहे नसब के एतबार से किसी क़द्र दूर क्यों न हो और आपका दुश्मन वही है जो आपकी नाफ़रमानी करे चाहे क़राबत के ऐतबार से कितना ही क़रीब क्यों न हो।’’
96- आपने सुना के ख़ारेजी शख़्स नमाज़े शब पढ़ रहा है और तिलावते क़ुरान कर रहा है तो फ़रमाया के यक़ीन के साथ सो जाना शक के साथ नमाज़ पढ़ने से बेहतर है।
(((यह इस्लाहे अक़ीदा की तरफ़ इशारा है के जिस शख़्स को हक़ाएक़ का यक़ीन नहीं है और वह शक की ज़िन्दगी गुज़ार रहा है उसके आमाल की क़द्र व क़ीमत ही क्या है, आमाल की क़द्र व क़ीमत का ताअय्युन इन्सान के इल्म व यक़ीन और उसकी मारेफ़त से होता है, लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है के जितने अहले यक़ीन हैं सबको सो जाना चाहिये और नमाज़े शब का पाबन्द नहीं होना चाहिये के यक़ीन की नीन्द शक के अमल से बेहतर है।
ऐसा मुमकिन होता तो सबसे पहले मासूमीन (अ0) इन आमाल को नज़रअन्दाज़ कर देते जिनके यक़ीन की शान यह थी के अगर परदे उठा दिये जाते जब भी यक़ीन में इज़ाफ़े की गुन्जाइश नहीं थी।)))


97- जब किसी ख़बर को सुनो तो अक़्ल के मेयार पर परख लो और सिर्फ़ नक़्ल पर भरोसा न करो के इल्म के नक़्ल करने वाले बहुत होते हैं और समझने वाले बहुत कम होते हैं।
(((आलमे इस्लाम की एक कमज़ोरी यह भी है के मुसलमान रिवायात के मज़ामीन से यकसर ग़ाफ़िल है और सिर्फ़ रावियों के एतमाद पर रिवायात पर अमल कर रहा है जबके बेशुमार रिवायात के मज़ामीन खि़लाफ़े अक़्ल व मन्तिक़ और मुख़ालिफ़े उसूल व अक़ाएद हैं औश्र मुसलमान को इस गुमराही का एहसास भी नहीं है।)))
98- आपने एक शख़्स को कलमा इन्ना लिल्लाह ज़बान पर जारी करते हुए सुना तो फ़रमाया के इन्नालिल्लाह इक़रार है के हम किसी की मिल्कियत हैं और इन्नल्लाहा राजेऊन एतराफ़ है के एक दिन फ़ना हो जाने वाले हैं।


99- एक क़ौम ने आपके सामने आपकी तारीफ़ कर दी तो आपने दुआ के लिये हाथ उठा दिये, ख़ुदाया तू मुझे मुझसे बेहतर जानता है और मैं अपने को इनसे बेहतर पहचानता हूँ लेहाज़ा मुझे इनके ख़याल से बेहतर क़रार दे देना और यह जिन कोताहियों को नहीं जानते हैं उन्हें माफ़ कर देना।
(((ऐ काश हर इन्सान इस किरदार को अपना लेता और तारीफ़ों से धोका खाने के बजाए अपने उमूर की इस्लाह की फ़िक्र करता और मालिक की बारगाह में इसी तरह अर्ज़ मुद्दआ करता जिस तरह मौलाए कायनात ने सिखाया है मगर अफ़सोस के ऐसा कुछ नहीं है और जेहालत इस मन्ज़िल पर आ गई है के साहेबाने इल्म अवामुन्नास की तारीफ़ से धोका खा जाते हैं और अपने को बाकमाल तसव्वुर करने लगते हैं जिसका मुशाहेदा ख़ोतबा की ज़िन्दगी में भी हो सकता है और शोअरा की महफ़िलों में भी जहां इज़हारे इल्म करने वाले बाकमाल होते हैं और तारीफ़ करने वालों की अकसरीयत उनके मुक़ाबले में बेकमाल, मगर इसके बाद भी इन्सान तारीफ़ से ख़ुश होता है और मग़रूर हो जाता है।)))


100- हाजत रवाई तीन चीज़ों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होती है ः 1. अमल को छोटा समझे ताके वह बड़ा क़रार पा जाए 2. उसे पोशीदा तौर पर अन्जाम दे ताके वह ख़ुद अपना इज़हार करे 3. उसे जल्दी पूरा कर दे ताके ख़ुशगवार मालूम हो।
(((ज़ाहिर है के हाजत बरआरी का अमल जल्द हो जाता है तो इन्सान को बेपनाह मसर्रत होती है वरना इसके बाद काम तो हो जाता है लेकिन मसर्रत का फ़िक़दान रहता है और वह रूहानी इम्बेसात हासिल नहीं होता है जो मुद्दआ पेश करने के फ़ौरन बाद पूरा हो जाने में हासिल होता है)))

101- लोगों पर एक ज़माना आने वाला है जब सिर्फ़ लोगों के उयूब बयान करने वाला मुक़र्रबे बारगाह हुआ करेगा और सिर्फ़ फ़ाजिर को ख़ुश मिज़ाज समझा जाएगा और सिर्फ़ मुन्सिफ़ को कमज़ोर क़रार दिया जाएगा, लोग सदक़े को ख़सारा, सिलए रहम को एहसान और इबादत को लोगों पर बरतरी का ज़रिया क़रारे देंगे, ऐसे वक़्त में हुकूमत औरतों के मशविरे, बच्चों के इक़्तेदार और ख़्वाजा सराओं की तदबीर के सहारे रह जाएगी।

(((अफ़सोस के अहले दुनिया ने इस इबादत को भी अपनी बरतरी का ज़रिया बना लिया है जिसकी तशरीह इन्सान के ख़ुज़ूअ व ख़ुशूअ और जज़्बए बन्दगी के इज़हार के लिये हुई थी और जिसका मक़सद यह था के इन्सान की ज़िन्दगी से ग़ुरूर और शैतनत निकल जाए और तवाज़ोअ व इन्केसार उस पर मुसल्लत हो जाए।)))
(((बज़ाहिर किसी दौर में भी ख़्वाजा सराओं को मुशीरे ममलेकत की हैसियत हासिल नहीं रही है और न उनके किसी मख़सूस तदब्बुर की निशानदेही की गई है, इसलिये बहुत मुमकिन है के इस लफ़्ज़ से मुराद वह तमाम अफ़राद हों जिनमें इन लोगों की ख़सलतें पाई जाती हैं और जो हुक्काम की हर हाँ में हाँ मिला देते हैं और उनकी हर रग़बत व ख़्वाहिश के सामने सरे तस्लीम ख़म कर देते हैं और उन्हें ज़िन्दगी के अन्दर व बाहर हर शोबे में बराबर का दख़ल रहता है।)))


102-लोगों ने आपकी चादर को बोसीदा देखकर गुज़ारिश कर दी तो आपने फ़रमाया के इससे दिल में ख़ुशू और नफ़्स में एहसासे कमतरी पैदा होता है और मोमेनीन इसकी इक़्तेदा भी कर सकते हैं, याद रखो दुनिया और आख़ेरत आपस में दो नासाज़गार दुश्मन हैं और दो मुख़्तलिफ़ रास्ते, लेहाज़ा जो दुनिया से मोहब्बत और ताल्लुक़ ख़ातिर रखता है वह आख़ेरत का दुश्मन हो जाता है और जो राहेरौ एक से क़रीबतर होता है वह दूसरे से दूरतर हो जाता है, फिर यह दोनों आपस में एक-दूसरे की सौत जैसी हैं।

103- नौफ़ बकाली कहते हैं के मैंने एक शब अमीरूल मोमेनीन (अ0) को देखा के आपने बिस्तर से उठकर सितारों पर निगाह की और फ़रमाया के नौफ़! सो रहे हो या बेदार हो? मैंने अर्ज़ की के हुज़ूर जाग रहा हूँ, फ़रमाया के नौफ़! ख़ुशाबहाल इनके जो दुनिया से किनाराकश हों तो आख़ेरत की तरफ़ रग़बत रखते हों, यही वह लोग हैं जिन्होंने ज़मीन को बिस्तर बनाया है और ख़ाक को फ़र्श, पानी को शर्बत क़रार दिया है और क़ुरान व दुआ को अपने ज़ाहिर व बातिन का मुहाफ़िज़, इसके बाद दुनिया से यूँ अलग हो गए जिस तरह हज़रत मसीह (अ0)।
((( इस मक़ाम पर लफ़्जे़ क़र्ज़ इशारा है के निहायत मुख़्तसर हिस्सा हासिल किया है जिस तरह दांत से रोटी काट ली जाती है और सारी रोटी को मुंह में नहीं भर लिया जाता है के इस कैफ़ियत को ख़ज़म कहते हैं, क़र्ज़ नहीं कहते हैं)))
नौफ़! देखो दाऊद (अ0) रात के वक़्त ऐसे ही मौक़े पर क़याम किया करते थे और फ़रमाते थे के यह वह साअत है जिसमें जो बन्दा भी दुआ करता है परवरदिगार उसकी दुआ को क़ुबूल कर लेता है, मगर यह के सरकारी टैक्स वसूल करने वाला, लोगों की बुराई करने वाला, ज़ालिम हुकूमत की पोलिस वाला या सारंगी और ढोल ताशे वाला हो।

सय्यद रज़ी - इरतेबत ः सारंगी को कहते हैं और कोबत के मानी ढोल के हैं और बाज़ हज़रात के नज़दीक इरतबा ढोल है और कोबा सारंगी।

((( अफ़सोस की बात है के बाज़ अलातों में बाज़ मोमिन अक़वाम की पहचान ही ढोल ताशा और सारंगी बन गई है जबके मौलाए कायनात (अ) ने इस कारोबार को इस क़द्र मज़मूम क़रार दिया है के इस अमल के अन्जाम देने वालों की दुआ भी क़ुबूल नहीं होती है। इस हिकमत में दीगर अफ़राद का तज़किरा ज़ालिमों के ज़ैल में किया गया है और खुली हुई बात है के ज़ालिम हुकूमत के लिये किसी तरह का काम करने वाला पेशे परवरदिगार मुस्तजाबुद् दावात नहीं हो सकता है, जब वह अपने ज़रूरियाते हयात को ज़ालिमों की अआनत से वाबस्ता कर देता है तो परवरदिगार अपना करम उठा लेता है।)))

104-परवरदिगार ने तुम्हारे ज़िम्मे कुछ फ़राएज़ क़रार दिये हैं लेहाज़ा ख़बरदार उन्हें ज़ाया न करना और उसने कुछ हुदूद भी मुक़र्रर कर दिये हैं लेहाज़ा उनसे तजावुज़ न करना। उसने जिन चीज़ों से मना किया है उनकी खि़लाफ़वर्ज़ी न करना और जिन चीज़ों से सुकूत इख़्तेयार फ़रमाया है ज़बरदस्ती उन्हें जानने की कोशिश न करना के वह भूला नहीं है।

105-जब भी लोग दुनिया संवारने के लिये दीन की किसी बात को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं तो परवरदिगार उससे ज़्यादा नुक़सानदेह रास्ते खोल देता है।

106- बहुत से आलिम हैं जिन्हें दीन से नावाक़फ़ीयत ने मार डाला है और फ़िर उनके इल्म ने भी कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाया है।

(((यह दानिश्वराने मिल्लत हैं जिनके पास डिग्रियों का ग़ुरूर तो है लेकिन दीन की बसीरत नहीं है, ज़ाहिर है के ऐसे अफ़राद का इल्म तबाह कर सकता है आबाद नहीं कर सकता है)))

107- इस इन्सान के वजूद में सबसे ज़्यादा ताज्जुबख़ेज़ वह गोश्त का टुकड़ा है जो एक रग से आवेज़ां कर दिया गया है और जिसका नाम क़ल्ब है के इसमें हिकमत के सरचश्मे भी हैं और इसकी ज़िदें भी हैं के जब उसे उम्मीद की झलक नज़र आती है तो तमअ ज़लील बना देती है और जब तमअ में हैजान पैदा होता है तो हिरस बरबाद कर देती है
(((इन्सानी क़ल्ब को दो तरह की सलाहियतों से नवाज़ा गया है, इसमें एक पहलू अक़्ल व मन्तिक़ का है और दूसरा जज़्बात व अवातिफ़ का, इस इरशादे गिरामी में दो पहलू की तरफ़ इशारा किया गया है और इसके मुतज़ाद ख़ुसूसियात की तफ़सील बयान की गई है।)))
और जब मायूसी का क़ब्ज़ा हो जाता है तो हसरत मार डालती है और जब ग़ज़ब तारी होता है तो ग़म व ग़ुस्सा शिद्दत इख़्तेयार कर लेता है और जब ख़ुशहाल हो जाता है तो हिफ़्ज़ मा तक़द्दुम को भूल जाता है और जब ख़ौफ़ तारी होता है तो एहतियात दूसरी चीज़ों से ग़ाफ़िल कर देती है और जब हालात में वुसअत पैदा होती है तो ग़फ़लत क़ब्ज़ा कर लेती है, और जब माल हासिल कर लेता है तो बेनियाज़ी सरकश बना देती है और जब कोई मुसीबत नाज़िल हो जाती है तो फ़रयाद रूसवा कर देती है और जब फ़ाक़ा काट खाता है तो बलाए गिरफ़्तार कर लेती है और जब भूक थका देती है तो कमज़ोरी बिठा देती है और जब ज़रूरत से ज़्यादा पेट भर जाता है तो शिकमपुरी की अज़ीयत में मुब्तिला हो जाता है, मुख़्तसर यह है के हर कोताही नुक़सानदेह होती है और हर ज़्यादती तबाहकुन।

108-हम अहलेबैत (अ0) वह नुक़्तए एतदाल हैं जिनसे पीछे रह जाने वाला आगे बढ़कर उनसे मिल जाता है और आगे बढ़ जाने वाला पलट कर मुलहक़ हो जाता है।
(((शेख़ मोहम्मद अब्दहू ने इस फ़िक़रे की यह तशरीह की है के अहलेबैत अलै0 इस मसनद से मुशाबेहत रखते हैं जिसके सहारे इन्सान की पुश्त मज़बूत होती है और उसे सुकूने ज़िन्दगी हासिल होता है, वसता के लफ़्ज़ से इस अम्र की तरफ़ इशारा किया गया है के तमाम मसनदें इसी से इत्तेसाल रखती हैं और सबका सहारा वही है, अहलेबैत (अ0) उस सिराते मुस्तक़ीम पर हैं जिनसे आगे बढ़ जाने वालों को भी उनसे मिलना पड़ता है और पीछे रह जाने वालों को भी। )))


109- हुक्मे इलाही का निफ़ाज़ वही कर सकता है जो हक़ के मामले में मुरव्वत न करता हो और आजिज़ी व कमज़ोरी का इज़हार न करता हो और लालच के पीछे न दौड़ता हो।

110-जब सिफ़्फ़ीन से वापसी पर सहल बिन हनीफ़ अन्सारी का कूफ़े में इन्तेक़ाल हो गया जो हज़रत के महबूब सहाबी थे तो आपने फ़रमाया के ‘‘मुझसे कोई पहाड़ भी मोहब्बत करेगा तो टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। मक़सद यह है के मेरी मोहब्बत की आज़माइश सख़्त है और इसमें मसाएब की यूरिश हो जाती है जो ‘ारफ़ सिर्फ़ मुत्तक़ी और नेक किरदार लोगों को हासिल होता है जैसा के आपने दूसरे मौक़े पर इरशाद फ़रमाया है।


111-हो हम अहलेबैत (अ0) से मोहब्बत करे उसे जामाए फ़क्ऱ पहनने के लिये तैयार हो जाना चाहिये।
सय्यद रज़ी- ‘‘बाज़ हज़रात ने इस इरशाद की एक दूसरी तफ़सीर की है जिसके बयान का यह मौक़ा नहीं है’’

(((मक़सद यह है के अहलेबैत (अ0) का कुल सरमायाए हयात दीन व मज़हब और हक़ व हक़्क़ानियत है और उसके बरदाश्त करने वाले हमेशा कम होते हैं लेहाज़ा इस राह पर चलने वालों को हमेशा मसाएब का सामना करना पड़ता है और इसके लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये।)))

112- अक़्ल से ज़्यादा फ़ायदेमन्द कोई दौलत नहीं है और ख़ुदपसन्दी से ज़्यादा वहशतनाक कोई तन्हाई नहीं है, तदबीर जैसी कोई अक़्ल नहीं है और तक़वा जैसी कोई बुज़ुर्गी नहीं है हुस्ने एख़लाक़ जैसा कोई साथी नहीं है और अदब जैसी कोई मीरास नहीं है, तौफ़ीक़ जैसा कोई पेशरौ नहीं है और अमले स्वालेह जैसी कोइ तिजारत नहीं है, सवाब जैसा कोई फ़ायदा नहीं है और ‘ाहादत में एहतियात जैसी कोई परहेज़गारी नहीं है, हराम की तरफ़ से बेरग़बती जैसा कोई ज़ोहद नहीं है और तफ़क्कुर जैसा कोई इल्म नहीं है और अदाए फ़राएज़ जैसी कोई इबादत नहीं है और हया व सब्र जैसा कोई ईमान नहीं है, तवाज़ोह जैसा कोई हसब नहीं है और इल्म जैसा कोई ‘ारफ़ नहीं है, हिल्म जैसी कोई इज्ज़त नहीं है और मशविरे से ज़्यादा मज़बूत कोई पुश्त पनाह नहीं है।


113- जब ज़माना और अहले ज़माना पर नेकियों का ग़लबा हो और कोई ‘ाख़्स किसी ‘ाख़्स से कोई बुराई देखे बग़ैर बदज़नी पैदा करे तो उसने उस ‘ाख़्स पर ज़ुल्म किया है और जब ज़माना और अहले ज़माना पर फ़साद का ग़लबा हो और कोई ‘ाख़्स किसी से हुस्ने ज़न क़ायम करे तो गोया उसने अपने ही को धोका दिया है।

114-एक ‘ाख़्स ने आपसे मिज़ाजपुरसी कर ली तो फ़रमाया के इसका हाल क्या होगा जिसकी बक़ा ही फ़ना की तरफ़ ले जा रही है और सेहत ही बीमारी का पेशख़ेमा है और वह अपनी पनाहगाह से एक दिन गिरफ़्त में ले लिया जाएगा।