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Friday, March 11, 2011

Nahjul Balagha Hindi Khutba 34-36 , नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 34-36

34-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ख़वारिज के क़िस्से के बाद लोगोंं को अहले “ााम से जेहाद के लिये आमादा किया गया है और उनके हालात पर अफ़सोस का इज़हार करते हुए इन्हें नसीहत की गई है)
हैफ़ है तुम्हारे हाल पर, मैं तुम्हें मलामत करते करते थक गया। क्या तुम लोग वाक़ेअन आख़ेरत के एवज़ ज़िन्दगानी दुनिया पर राज़ी हो गए हो और तुमने ज़िल्लत को इज़्ज़त का बदल समझ लिया है? के जब मैं तुम्हें दुष्मन से जेहाद की दावत देता हूँ तो तुम आँखें फिराने लगते हो जैसे मौत की बेहोषी तारी हो और ग़फ़लत के नषे में मुब्तिला हो। तुम पर जैसे मेरी गुफ़्तगू के दरवाज़े बन्द हो गए हैं के तुम गुमराह होते जा रहे हो और तुम्हारे दिलों पर दीवानगी का असर हो गया है के तुम्हारी समझ ही में कुछ नहीं आ रहा है। तुम कभी मेरे लिये क़ाबिले एतमाद नहीं हो सकते हो और न ऐसा सुतून हो जिस पर भरोसा किया जासके और न इज़्ज़त के वसाएल हो जिसकी ज़रूरत महसूस की जा सके तुम तो उन ऊंटों जैसे हो जिनके चरवाहे गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाते हैं तो दूसरी तरफ़ से भड़क जाते हैं। ख़ुदा की क़सम! तुम बदतरीन अफ़राद हो जिनके ज़रिये आतिषे जंग को भड़काया जा सके। तुम्हारे साथ मक्र किया जाता है और तुम कोई तद्बीर भी नहीं करते हो। तुम्हारे इलाक़े कम होते जा रहे हैं और तुम्हें ग़ुस्सा भी नहीं आता है। दुष्मन तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं है मगर तुम ग़फ़लत की नींद सो रहे हो। ख़ुदा की क़सम सुस्ती बरतने वाले हमेषा मग़लूब हो जाते हैं और ब-ख़ुदा मैं तुम्हारे बारे में यही ख़याल रखता हूँ के अगर जंग ने ज़ोर पकड़ लिया और मौत का बाज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से यूँही अलग हो जाओगे जिस तरह जिस्म से सर अलग हो जाता है।-1- ख़ुदा की क़सम अगर कोई “ाख़्स अपने दुष्मन को इतना क़ाबू दे देता है के वह इसका गोष्त उतार ले और हड्डी तोड़ डाले और खाल के टुकड़े- टुकड़े कर दे तो ऐसा “ाख़्स आजिज़ी की आखि़री सरहद पर है और इसका वह दिल इन्तेहाई कमज़ोर है जो इसके पहलूओं के दरम्यान है। -2- तुम चाहो तो ऐसे ही हो जाओ लेकिन मैं ख़ुदा गवाह है के इस नौबत के आने से पहले वह तलवार चलाऊंगा के खोपड़ियां टुकड़े- टुकड़े होकर उड़ती दिखाई देंगी और हाथ पैर कट कर गिरते नज़र आएंगे। इसके बाद ख़ुदा जो चाहेगा वह करेगा। अय्योहन्नास एक हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है और एक हक़ तुम्हारा मेरे ज़िम्मे है। तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे यह है के मैं तुम्हें नसीहत कर दूं और बैतुलमाल का माल तुम्हारे हवाले कर दूँ और तुम्हें तालीम दूँ ताके तुम जाहिल न रह जाओ और अदब सिखाऊं ताके बाअमल हो जाऊँ और मेरा हक़ तुम्हारे ऊपर यह है के बैयत का हक़ अदा करो और हाज़िर व ग़ाएब हर हाल में ख़ैर ख़्वाह रहो। जब पुकारूं तो लब्बैक कहो और जब हुक्म दूँ तो इताअत करो।
35- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब तहकीम के बाद इसके नतीजे की इत्तेला दी गई तो आपने हम्दो सनाए इलाही के बाद इस बलाए का सबब बयान फ़रमाया)
हर हाल में ख़ुदा का “ाुक्र है चाहिये ज़माना कोई बड़ी मुसीबत क्यों न ले आए और हादेसात कितने ही अज़ीम क्यों न हो जाएं। और मैं गवाही देता हूँ के वह ख़ुदा एक है, इसका कोई “ारीक नहीं है और इसके साथ कोई दूसरा माबूद नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) इसके बन्दे और रसूल हैं (ख़ुदा की रहमत इन पर और इनकी आल (अ0) पर)
(((-1- यह दयानतदारी और ईमानदारी की अज़ीमतरीन मिसाल है के कायनात का अमीर मुसलमानों का हाकिम, इस्लाम का ज़िम्मेदार क़ौम के सामने खड़े होकर इस हक़ीक़त का एलान कर रहा है के जिस तरह मेरा हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है इसी तरह तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे भी है। इस्लाम में हाकिम हुक़ूक़ुल इबाद से बलन्दतर नहीं होता है और न उसे क़ानूने इलाही के मुक़ाबले में मुतलक़ुलअनान क़रार दिया जा सकता है। इसके बाद दूसरी एहतियात यह है के पहले अवाम के हुक़ूक़ को अदा करने का ज़िक्र किया। इसके बाद अपने हुक़ूक़ का मुतालबा किया और हुक़ूक़ के बयान में भी अवाम के हुक़ूक़ को अपने हक़ के मुक़ाबले में ज़्यादा अहमियत दी। अपना हक़ सिर्फ़ यह है के क़ौम मुख़लिस रहे और बैयत का हक़ अदा करती रहे और एहकाम की इताअत करती रहे जबके यह किसी हाकिम के इम्तेयाज़ी हुक़ूक़ नहीं हैं बल्के मज़हब के बुनियादी फ़राएज़ हैं। इख़लास व नसीहत हर “ाख़्स का बुनियादी फ़रीज़ा है। बैअत की पाबन्दी मुआहेदा की पाबन्दी और तक़ाज़ाए इन्सानियत है। एहकाम की इताअत एहकामे इलाहिया की इताअत है और यही ऐन तक़ाज़ाए इस्लाम है। इसके बरखि़लाफ़ अपने ऊपर जिन हुक़ूक़ का ज़िक्र किया गया है वह इस्लाम के बुनियादी फ़राएज़ में “ाामिल नहीं हैं बल्कि एक हाकिम की ज़िम्मेदारी के “ाोबे हैं के वह लोगों को तालीम देकर इनकी जेहालत का इलाज करे और उन्हें महज़ब बनाकर अमल की दावत दे और फिर बराबर नसीहत करता रहे और किसी आन भी इनके मसालेह व मनाफ़ेअ से ग़ाफ़िल न होने पाए।)))
अम्माबाद! (याद रखो) के नासेह “ाफ़ीक़ और आलिमे तजुरबेकार की नाफ़रमानी हमेषा बाइसे हसरत और मोजब निदामत हुआ करती है। मैंने तुम्हें तहकीम के बारे में अपनी राय से बाख़बर कर दिया था और अपनी क़ीमती राय का निचोड़ बयान कर दिया था लेकिन ऐ काष ‘‘क़सीर’’ के हुक्म की इताअत की जाती। तुमने तो मेरी इस तरह मुख़ालफ़त की जिस तरह बदतरीन मुख़ालफ़त और अहदे षिकन नाफ़रमान किया करते हैं यहाँ तक के नसीहत करने वाला ख़ुद भी “ाुबहा में पड़ जाए के किसको नसीहत कर दी और चक़माक़ ने “ाोले भड़काना बन्द कर दिये। अब हमारा और तुम्हारा वही हाल हुआ है जो बनी हवाज़न के “ाायर ने कहा थाः ‘‘मैंने तुमको अपनी बात मक़ामे मनारेजुललेवा में बता दी थी, लेकिन तुमने इसकी हक़ीक़त को दूसरे दिन की सुबह ही को पहचाना’’
36- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(अहले नहरवान को अन्जामकार से डराने के सिलसिले में)
मैं तुम्हें बाख़बर किये देता हूँ के इस नहर के मोड़ों पर और इस नषेब की हमवार ज़मीनों पर पड़े दिखाई दोगे और तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई वाज़ेअ दलील और रौषन हुज्जत न होगी। तुम्हारे घरों ने तुम्हें निकाल बाहर कर दिया और क़ज़ा व क़द्र ने तुम्हें गिरफ़्तार कर लिया। मैं तुम्हें इस तहकीम से मना कर रहा था लेकिन तुमने अहदषिकन दुष्मनों की तरह मेरी मुख़ालेफ़त की यहाँतक के मैंने अपनी राय को छोड़कर मजबूरन तुम्हारी बात को तस्लीम कर लिया मगर तुम दिमाग़ के हल्के और अक़्ल के अहमक़ निकले। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे। मैंने तो तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डाला है और तुम्हारे लिये कोई नुक़सान नहीं चाहा है।
((( सूरते हाल यह है के जंगे सिफ़फ़ीन के इख़्तेताम के क़रीब जब अम्र व आस के मष्विरे से माविया ने नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिये और क़ौम ने जंग रोकने का इरादा कर लिया तो हज़रत ने मुतनब्बेह किया के सिर्फ़ मक्कारी है। इस क़ौम का क़ुरान से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लेकिन क़ौम ने इस हद तक इसरार किया के अगर आप क़ुरान के फ़ैसले को न मानेंगे तो हम आपको क़त्ल कर देंगे या गिरफ़्तार करके माविया के हवाले कर देंगे। ज़ाहिर है के इसके नताएज इन्तेहाई बदतर और संगीन थे लेहाज़ा आपने अपनी राय से क़ता नज़र करके इस बात को तसलीम कर लिया मगर “ार्त यही रखी के फ़ैसला किताब व सुन्नत ही के ज़रिये होगा। ममला रफ़ा दफ़ा हो गया लेकिन फ़ैसले के वक़्त माविया के नुमाइन्दे अम्र व आस ने हज़रत अली (अ0) की तरफ़ के नुमाइन्दे अबू मूसा अषअरी को धोका दे दिया और उसने हज़रत अली (अ0) के माज़ूल करने का एलान कर दिया जिसके बाद अम्र व आस ने माविया को नामज़द कर दिया और इसकी हुकूमत मुसल्लम हो गई। हज़रत अली (अ0) के नाम नेहाद असहाब को अपनी हिमाक़त का अन्दाज़ा हुआ और “ार्मिन्दगी को मिटाने के लिये उलटा इलज़ाम लगाना “ाुरू कर दिया के आपने इस तहकीम को क्यों मंज़ूर किया था और ख़ुदा के अलावा किसी को हुक्म क्यों तस्लीम किया था। आप काफ़िर हो गए हैं और आपसे जंग, वाजिब है और यह कहकर मक़ाम हरोरा पर लष्कर जमा करना “ाुरू कर दिया। उधर हज़रत “ााम के मुक़ाबले की तैयारी कर रहे थे लेकिन जब इन ज़ालिमों की “ारारत हद से आगे बढ़ गई तो आपने अबू अयूब अन्सारी को फ़हमाइष के लिये भेजा। इनकी तक़रीर का यह असर हुआ के बारा हज़ार में से अक्सरीयत कूफ़े चली गई, या ग़ैर जानिबदार हो गई या हज़रत के साथ आ गई और सिर्फ़ दो तीन हज़ार ख़वारिज रह गए जिनसे मुक़ाबला हुआ तो इस क़यामत का हुआ के सिर्फ़ नौ आदमी बचे। बाक़ी सब फ़िन्नार हो गए और हज़रत के लष्कर से सिर्फ़ आठ अफ़राद “ाहीद हुए वाक़ेया 9 सफ़र 538 हि0 को पेष आया।)))